संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * जिसे मृत्यु नहीं मार सकती, उस निर्दोष महात्माकी स्थिति * ३८५
शिबि, न्यङ्कु, पृथु, उलाघ्य, बैन्य, नाभाग, केलि, नल, मान्धाता, सगर, दिलीप और नहुष आदि नरेशोंमें तथा आत्रेय, व्यास, वाल्मीकि, शुक, वात्स्यायन, उपमन्यु, मणीमङ्गि और भगीरथ आदि महर्षियोंमें कुछ तो सुदूर भूतकालमें, कुछ निकटतम अतीतमें और कुछ इसी वर्तमान सृष्टिमें उत्पन्न हुए हैं; अतः इनके स्मरणकी तो बात ही क्या है। मुनिवर ! आप तो ब्रह्माके पुत्र हैं। आपके भी आठ जन्म हो चुके हैं। इस आठवें जन्ममें मेरा आपके साथ समागम होगा—यह मुझे पहलेसे ही ज्ञात था। यह वर्तमान सृष्टि जैसी है, इसके जैसे आचरण हैं और जैसा इसका अवयव-संस्थान एवं दिशागण है, ठीक इसी तरहकी तीन सृष्टियाँ पहले भी हो चुकी हैं, जिनका मुझे भलीभाँति स्मरण है। अमृतके लिये, जिसमें मन्दराचलके आकर्षण-के प्रयाससे देवता और दैत्य व्याकुल हो गये थे—ऐसा यह बारहवाँ समुद्र-मन्थन है, यह भी मुझे स्मरण है। मुने ! प्रत्येक युगमें अध्येता पुरुषोंकी बुद्धियोंके न्यूनाधिक होनेके कारण ब्रह्मचर्य आदि क्रियाओ, शिक्षा-कल्प आदि अङ्गों और स्वर आदिके उच्चारणपूर्वक पाठकी विचित्रतासे युक्त वेद भी मेरे स्मृतिपथमें वर्तमान हैं। निष्पाप महर्षे ! युग-युगमें जो एकार्थक, विस्तारयुक्त तथा बहुत-से पाठभेदवाले पुराण प्रवृत्त होते हैं, उन सबका भी मुझे स्मरण है। पुनः प्रत्येक युगमें वेद आदि शास्त्रोंके ज्ञाता व्यास आदि महर्षियोंद्वारा विरचित महाभारत आदि इतिहास भी मुझे याद हैं। इनके अतिरिक्त रामायण नामसे प्रसिद्ध जो दूसरा महान् आश्चर्यजनक इतिहास है; जिसकी श्लोक-संख्या एक लाख है, उस ज्ञान-शास्त्रका भी मुझे स्मरण है। उस शास्त्रमें बुद्धिमानोंके लिये हाथपर रखे हुए फलकी तरह 'श्रीरामकी तरह व्यवहार करना चाहिये, परंतु रावणके विलासी जीवनका अनुकरण नहीं करना चाहिये' ऐसा ज्ञान बतलाया गया है। उसके निर्माता महर्षि वाल्मीकि हैं। अब उनके द्वारा जगत्में जो (वसिष्ठ-राम-संवादरूप) दूसरे ज्ञानशास्त्रकी रचना की जायगी, उसका भी मुझे ज्ञान है और समयानुसार वह आपको भी ज्ञात हो जायगा। यह जगत्स्वरूप भ्रान्ति जलमें बुलबुलेके समान कभी स्थित-सी दीख पड़ती है, किंतु वास्तवमें इसका किसी भी कालमें अस्तित्व नहीं है। मेरे पिता चण्डके जीवनकालमें इस कल्पतरुकी जैसी शोभा और जैसा संगठन था, वह आज भी वैसा ही है; इसीलिये इस समय मैं यहाँ स्थित हूँ। (सर्ग २०-२१)
जिसे मृत्यु नहीं मार सकती, उस निर्दोष महात्माकी स्थितिका, परमतत्त्वकी उपासनाका तथा तीनों लोकोंके पदार्थोंमें सुख-शान्तिके अभावका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! तदनन्तर कल्पवृक्षके अग्रभागमें आसीन इस वायसराज भुशुण्डसे मैने जाननेके लिये यह पूछा—'पक्षियोंके श्रेष्ठ राजा ! जगत्में विचरण करनेवाले तथा व्यवहारमें लगे हुए प्राणियोंकी देहको मृत्यु कैसे बाधा नहीं पहुँचाती ?'
भुशुण्डने कहा—सर्वज्ञ ब्रह्मन् ! आप यद्यपि सब कुछ जानते हैं, फिर भी जो मुझसे जिज्ञासुकी तरह पूछते हैं, वह ठीक ही है; क्योंकि स्वामी प्रश्नोंद्वारा अपने सेवकोंकी वाक्पटुता प्रसिद्ध कराया करते हैं। फिर भी आप जो मुझसे पूछते हैं, उसका मैं उत्तर आपको देता हूँ; क्योंकि आज्ञाका पालन ही सज्जनोंकी सबसे बड़ी सेवा है, ऐसा मुनिलोग कहते है। महाराज ! पापरूप मोती जिसमें पिरोये गये हैं, ऐसी वासनारूपी तन्तुसंतति जिसके हृदय-कमलमें ग्रथित नहीं रहती अर्थात् जो वासना और पापसे रहित है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। जो