संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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केवल मेरे संकल्पसे ही मेरुगिरिके इसी शिखरपर इस प्रकार यह कल्पवृक्ष बारंबार उत्पन्न होता है।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—कल्याणस्वरूप वायसराज ! तुम्हारी आयु अत्यन्त लंबी है। तुम भूतकालीन पदार्थोंका निर्देश करनेवालोंमें अग्रगण्य, ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न और धीर हो। तुम्हारी मनोगति योगसाधनके योग्य है। तुमने अनेक प्रकारकी असंख्य सृष्टियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय भी देखा है। अतः अब यह बताओ कि इस सृष्टि-क्रममें तुम्हें किस-किस आश्चर्यजनक सृष्टिका स्मरण है ?
भुशुण्डने कहा—'मुनिश्रेष्ठ ! मुझे इस पृथ्वीके विषयमें ऐसा स्मरण है कि किसी समय यह शिला और वृक्षोंसे रहित थी। इसपर तृण और लता आदि भी नहीं थे; पर्वत, वन और भाँति-भाँतिके वृक्ष—ये कुछ भी नहीं थे और यह मेरुके नीचे स्थित थी। वहाँ यह ग्यारह हजार वर्षोंतक भस्मसे परिपूर्ण रही—ऐसा मुझे सम्यक् रूपसे स्मरण है। मुझे यह भी खूब याद है कि जब बल और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हुए असुरोंका घोर संग्राम चल रहा था, उस समय इस पृथ्वीका भीतरी भाग क्षीण हो गया था और यह युद्धसे भागे हुए जनोंसे परिपूर्ण हो गयी थी। फिर एक चतुर्युगीतक यह उन मतवाले असुरोंके अधिकारमें रही, इसका भी मुझे पूर्ण स्मरण है। अन्य चतुर्युगीके दो युगोंतक यह भूमि वनैले वृक्षोंसे खचाखच भरी रही। उस समय उन वृक्षोंके अतिरिक्त और किसी पदार्थका निर्माण नहीं हुआ था—इसका भी मुझे ठीक-ठीक स्मरण है। एक समय यह वसुधा चारों युगोंसे भी अधिक कालतक घने पर्वतोंसे आच्छादित रही। उसपर मनुष्य चल-फिर भी नहीं सकते थे—यह भी मुझे स्मरण है। मुझे वह समय भी याद आता है, जब अन्तरिक्ष आदि लोकोंमें समस्त विमानचारी देवता भयके कारण अन्तर्धान हो गये थे और यह पृथ्वी वृक्षशून्य होकर अन्धकारसे आच्छादित हो गयी थी। इनका तथा इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-सी बातोंका मुझे स्मरण है; परंतु इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ। जो सार वस्तु है, उसे मैं संक्षेपसे कहता हूँ, सुनिये। ब्रह्मन् ! मुझे तो यहाँतक स्मरण है कि मेरे सामने सैकड़ों चतुर्युगियाँ बीत गयीं और ऐसे असंख्य मनु समाप्त हो गये, जो सब-के-सब प्रभावाधिक्यसे परिपूर्ण थे। मुझे एक ऐसी सृष्टिका स्मरण है, जिसमें पर्वत और भूमिका नाम-निशान भी नहीं था। चन्द्रमा और सूर्यके बिना ही पूर्ण प्रकाश छाया रहता था और देवता तथा सिद्ध मानव आकाशमें ही रहते थे। मुझे ऐसी ही एक और सृष्टिका स्मरण है, जिसमें न कोई इन्द्र था न भूपाल तथा उत्तम, मध्यम और अधमका भेद भी नहीं था। सब एकरूप था और दिशामण्डल अन्धकारसे व्याप्त था।
मुनिराज ! पहले सृष्टि-रचनाका संकल्प हुआ, फिर तीनों लोकोंका निर्माण हुआ। उस त्रिलोकीमें अवान्तर प्रदेशोंका विभाग होनेके बाद उनमें सात कुलपर्वतोंकी स्थापना हुई। उन्हीं प्रदेशोंमें जम्बूद्वीपकी पृथक् स्थापना हुई। ब्रह्माजीने उस जम्बूद्वीपमें ब्राह्मण आदि वर्ण, उनके धर्म और उन वर्णोंके लिये योग्य विधानविशेषोंकी सृष्टि की। तत्पश्चात् अवनिमण्डल एवं नक्षत्र-चक्रकी स्थिति और ध्रुवमण्डलका निर्माण किया। तात ! तदनन्तर चन्द्रमा और सूर्यकी उत्पत्ति, इन्द्र और उपेन्द्रकी व्यवस्था, हिरण्याक्षद्वारा पृथ्वीका अपहरण, वराहरूपधारी भगवान्-द्वारा उसका उद्धार, भूपालोंकी रचना, मत्स्यरूपधारी भगवान्द्वारा वेदोंका लाया जाना, मन्दराचलका उन्मूलन, अमृतके लिये क्षीरसागरका मन्थन, गरुड़का शैशव, जब कि उनके पंख नहीं जमे थे, और सागरोंकी उत्पत्ति आदि जो निकटतम सृष्टिकी स्मृतियाँ हैं, उन्हें तो मेरी अपेक्षा अल्प आयुवाले योगी भी स्मरण करते हैं; अतः उनमें मेरी क्या आदर-बुद्धि हो सकती है।
मुनिश्रेष्ठ ! हयग्रीव, हिरण्याक्ष, कालनेमि, बल, हिरण्यकशिपु, क्राथ, बलि और प्रह्लाद आदि असुरोंमें,