संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * वसिष्ठजीद्वारा पूछे हुए प्रश्नोंका भुशुण्डद्वारा समाधान * ३८३
है न जाता है; अतः इस विषयमें हमलोगोंको भय कैसा। क्योंकि प्राणि-समुदायरूपी तरङ्गोंसे युक्त तथा कालसागरमें प्रवेश करनेवाली संसार-सरिताके तटपर स्थित होते हुए भी हमलोग उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। जिनके शोक, भय और आयास नष्ट हो चुके हैं तथा जो आत्मलाभसे संतुष्ट हैं—ऐसे आप-सरीखे उत्तम पुरुष हमलोगोंपर अनुग्रह करते रहते हैं; इसलिये हमलोग सारे दुःखोंसे मुक्त हो गये हैं। भगवन् ! हमलोगोंका मन यद्यपि व्यवहारार्थ इधर-उधर कार्योंमें व्यस्त रहता है, तथापि न तो वह राग आदि वृत्तियोंमें फँसता है और न तत्त्व-विचारसे शून्य ही होता है। क्योंकि हमारा आत्मा निर्विकार, क्षोभरहित और शान्त हो गया है, इसलिये चिद्रूप तरङ्गवाले हमलोग पूर्णिमाके पर्वकालमें बढ़नेवाले महासागरकी भाँति प्रबुद्ध हो गये हैं। ब्रह्मन् ! इस समय आपके आगमनसे हमलोगोंका अन्तःकरण हर्षसे प्रफुल्लित हो उठा है। समस्त एषणाओंका परित्याग कर चुकनेवाले संत-महात्मा अपने शुभागमनद्वारा जो हमपर अनुग्रह करते हैं, इससे बढ़कर कल्याणकारक मैं अपने लिये और कुछ नहीं समझता। भला, आपातरमणीय भोगोंसे कौन-सा लाभ मिल सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं। किंतु सत्सङ्गरूपी चिन्तामणिसे तो सबके सारभूत यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। सज्जन-शिरोमणे ! आपकी वाणी स्नेहपूर्ण, गम्भीर, कोमल, मधुर, उदार और धीरतायुक्त है; मैंने परमात्माको जान लिया है और आपके दर्शनसे मैं पवित्र हो चुका हूँ। इसलिये मेरी तो ऐसी धारणा है कि आज मेरा जन्म सफल हो गया; क्योंकि साधु पुरुषोंका सङ्ग समस्त भयोंका अपहरण करनेवाला होता है।
मुनीश्वर ! युगान्तकालमें जब भीषण उपद्रव होने लगते हैं और प्रचण्ड वायु बहने लगती है, उस समय भी यह कल्पवृक्ष सुस्थिर रहता है। यह कभी भी कम्पित नहीं होता। अन्य लोकोंमें विचरण करनेवाले समस्त प्राणियोंके लिये यह अगम्य है, इसीलिये हमलोग यहाँ सुखपूर्वक निवास करते हैं। ऐसे उत्तम वृक्षपर निवास करनेवाले हमलोगोंके निकट भला, आपत्तियों कैसे फटक सकती हैं।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—महाबुद्धिमान् भुशुण्ड ! प्रलय-कालमें जब सूर्य और चन्द्रमाको भी गिरा देनेवाली उत्पातवायु बहने लगती है, उस समय तुम संतापरहित कैसे रह पाते हो ?
भुशुण्डने कहा—मुनिश्रेष्ठ ! कल्पान्तके समय जब सांसारिक व्यवहारका विनाश हो जाता है, उस समय जैसे कृतघ्न आपत्तिकालमें सन्मित्रको त्याग देता है, उसी तरह मैं इस घोंसलेको छोड़ देता हूँ और आकाशमें ही स्थित रहता हूँ। उस अवसरपर वासनाशून्य मनकी तरह मैं सारी कल्पनाओंसे रहित रहता हूँ और मेरा सारा शरीर निश्चल हो जाता है। फिर मैं ब्रह्माण्डके उस पार पहुँचकर समस्त तत्त्वोंके अन्तर्भूत एवं विशुद्ध परमात्मामें अचल सुषुप्तावस्थाके सदृश निर्विकल्पसमाधिमें तबतक स्थित रहता हूँ, जबतक कमलयोनि ब्रह्मा पुनः सृष्टिकर्ममें प्रवृत्त नहीं होते। सृष्टिरचना हो जानेके पश्चात् मैं ब्रह्माण्डमें प्रवेश करके पुनः अपने इस घोंसलेमें आ जाता हूँ।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—विहगराज ! कल्पान्तके अवसरोंपर जैसे तुम धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा अखण्डरूपसे स्थित रहते हो, वैसे अन्य योगी क्यों नहीं रहते ?
भुशुण्डने कहा—ब्रह्मन् ! यह तो परमेश्वरकी नियामिका शक्ति है, जो सबको नियमबद्ध रखती है। उसका उल्लङ्घन करना कठिन है। इसी कारण मुझे ऐसे रहना पड़ता है और दूसरे योगी दूसरी प्रकारसे रहते हैं। जो अवश्यम्भावी है, उसकी इदमित्थरूपसे अवधारणा नहीं की जा सकती; क्योंकि परमेश्वरकी नियामिका शक्तिरूप स्वभावका ऐसा निश्चय है कि जैसा होनहार होता है, वैसा ही होता है। इसीलिये प्रत्येक कल्पमें