भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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३८६ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

शरीर-लताके घुनरूप मानसिक चिन्ताओंसे और आशाओंसे रहित है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। राग-द्वेषरूपी विषसे परिपूर्ण अपने मनरूपी बिलमें रहनेवाला लोभरूपी सर्प जिसको नहीं डँसता, उसे मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। शरीररूपी समुद्रका वडवानलरूप अतएव समस्त विवेकरूपी जलको पी जानेवाला क्रोध जिसको दग्ध नहीं करता, उसे मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। तिलोंकी बड़ी राशिको पेर देनेवाले कठिन कोल्हू-की तरह उग्रतापूर्वक कामदेव जिसे पीड़ा नहीं पहुँचाता, उसे मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। जिसका चित्त एक निर्मल परम पवित्र सच्चिदानन्दघन ब्रह्मरूप परमपदमें स्थित है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। शरीररूपी पुष्पित वनमें प्रवेशकर उछल-कूद मचानेवाला जिसका बलवान् मन वानरकी तरह चञ्चल नहीं है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। ब्रह्मन् ! ये पूर्वोक्त महान् दोष संसाररूपी व्याधिके कारण हैं। ये दोष विक्षेपरहित चित्तको तनिक भी नहीं झकझोरते। अज्ञानके कारण शारीरिक एवं मानसिक पीड़ाओसे उत्पन्न नाना प्रकारके दुःख विक्षेपरहित चित्तको छिन्न-भिन्न नहीं कर पाते।

जिसका चित्त परमात्माके स्वरूपमें सम्यक् प्रकारसे स्थित है, वह पुरुष शास्त्रानुसार व्यवहार करता हुआ भी वास्तवमें न कुछ देता है न लेता है, न कुछ त्याग करता है और न कुछ माँगता ही है। जिस महापुरुषका चित्त परमात्मामें स्थित है, उसे उपार्जन करनेके अयोग्य दुष्ट धनादि, बुरे आरम्भ, राग-द्वेष आदि दुर्गुण, कठोर वचन, दुराचार—ये सब विचलित नहीं कर सकते अर्थात् उसके निकट भी नहीं जा सकते। जिसका चित्त परमात्मामें स्थित है, उसके न चाहनेपर भी न्याय आदि गुणोंसे युक्त अनेक सम्पत्तियाँ उसके पीछे-पीछे दौड़ती हैं। इसलिये कल्याण-कामी मनुष्यको चाहिये कि जो परिणाममें हितकर, सत्य, अविनाशी, संशयरहित एवं विषयामित्रपरूपी दृष्टिसे रहित है, उसी एक परमात्म-तत्त्वमें मनको स्थिर करे। जो सदा ही परम ग्राह्य है एवं जो आदि, मध्य और अन्तमें सुन्दर, मधुर तथा हितकारक है, उस परमात्म-तत्त्वमें मनको स्थिर करना चाहिये। जो अविनाशी है, मनके लिये सदा हितकर है, वास्तविक ध्रुव सत्य है, आदि, मध्य एवं अन्तमें सदा-सर्वदा परिपूर्ण है तथा जिसकी सभी संतलोग प्रीतिपूर्वक उपासना करते हैं, उस परमात्म-तत्त्वमें मनको स्थिर करना चाहिये। जो बुद्धिसे परे है, ज्ञानस्वरूप है, सबका आदिकारण है, निरतिशय परम अमृतस्वरूप है तथा जिससे अधिक मङ्गलमय दूसरा कोई नहीं है, उस परमतत्त्व परमात्मामें मनको स्थिर करना चाहिये; क्योंकि देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, विद्याधरों, किंनरों तथा देवाङ्गनाओसे युक्त स्वर्गमें कुछ भी सुस्थिर एवं उत्तम तत्त्व नहीं है।

तात ! वृक्षोंसे, राजा-महाराजाओंसे, पर्वत, नगर एवं ग्वालोंकी आवास-भूमिसे तथा समुद्रसे युक्त भूमण्डलमें कुछ भी स्थायी और शोभन तत्त्व नहीं है। नागों, असुरों तथा असुरोंकी स्त्रियोंसे युक्त समस्त पाताल-लोकमें भी कोई स्थिर एवं मङ्गलदायक पदार्थ नहीं है। जिसमें स्वर्ग, देवलोक, पृथ्वीसहित पाताल एवं दसों दिशाएँ हैं, ऐसे इस सम्पूर्ण जगत्में कोई भी स्थिर और मङ्गलदायक पदार्थ नहीं है। तात्पर्य यह कि त्रिलोकमय सम्पूर्ण संसारमें आधि, व्याधि, चिन्ता, शोक ही भरे हैं; वास्तविक सुख-शान्तिका नामोनिशान भी नहीं है। इसलिये नाशवान् क्षणभङ्गुर संसारसे तीव्र वैराग्य करना चाहिये। अतएव सम्पूर्ण भूमण्डलका एकच्छत्र सम्राट् होना श्रेष्ठ नहीं, सबसे बड़े अभिन्द्र इन्द्र, बृहस्पति आदि देवता होना यानी स्वर्गका अधिपति होना भी श्रेष्ठ नहीं तथा पातालमें सम्पूर्ण पृथ्वीको

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