भारतकोश
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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

३८६ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

शरीर-लताके घुनरूप मानसिक चिन्ताओंसे और आशाओंसे रहित है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। राग-द्वेषरूपी विषसे परिपूर्ण अपने मनरूपी बिलमें रहनेवाला लोभरूपी सर्प जिसको नहीं डँसता, उसे मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। शरीररूपी समुद्रका वडवानलरूप अतएव समस्त विवेकरूपी जलको पी जानेवाला क्रोध जिसको दग्ध नहीं करता, उसे मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। तिलोंकी बड़ी राशिको पेर देनेवाले कठिन कोल्हू-की तरह उग्रतापूर्वक कामदेव जिसे पीड़ा नहीं पहुँचाता, उसे मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। जिसका चित्त एक निर्मल परम पवित्र सच्चिदानन्दघन ब्रह्मरूप परमपदमें स्थित है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। शरीररूपी पुष्पित वनमें प्रवेशकर उछल-कूद मचानेवाला जिसका बलवान् मन वानरकी तरह चञ्चल नहीं है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। ब्रह्मन् ! ये पूर्वोक्त महान् दोष संसाररूपी व्याधिके कारण हैं। ये दोष विक्षेपरहित चित्तको तनिक भी नहीं झकझोरते। अज्ञानके कारण शारीरिक एवं मानसिक पीड़ाओसे उत्पन्न नाना प्रकारके दुःख विक्षेपरहित चित्तको छिन्न-भिन्न नहीं कर पाते।

जिसका चित्त परमात्माके स्वरूपमें सम्यक् प्रकारसे स्थित है, वह पुरुष शास्त्रानुसार व्यवहार करता हुआ भी वास्तवमें न कुछ देता है न लेता है, न कुछ त्याग करता है और न कुछ माँगता ही है। जिस महापुरुषका चित्त परमात्मामें स्थित है, उसे उपार्जन करनेके अयोग्य दुष्ट धनादि, बुरे आरम्भ, राग-द्वेष आदि दुर्गुण, कठोर वचन, दुराचार—ये सब विचलित नहीं कर सकते अर्थात् उसके निकट भी नहीं जा सकते। जिसका चित्त परमात्मामें स्थित है, उसके न चाहनेपर भी न्याय आदि गुणोंसे युक्त अनेक सम्पत्तियाँ उसके पीछे-पीछे दौड़ती हैं। इसलिये कल्याण-कामी मनुष्यको चाहिये कि जो परिणाममें हितकर, सत्य, अविनाशी, संशयरहित एवं विषयामित्रपरूपी दृष्टिसे रहित है, उसी एक परमात्म-तत्त्वमें मनको स्थिर करे। जो सदा ही परम ग्राह्य है एवं जो आदि, मध्य और अन्तमें सुन्दर, मधुर तथा हितकारक है, उस परमात्म-तत्त्वमें मनको स्थिर करना चाहिये। जो अविनाशी है, मनके लिये सदा हितकर है, वास्तविक ध्रुव सत्य है, आदि, मध्य एवं अन्तमें सदा-सर्वदा परिपूर्ण है तथा जिसकी सभी संतलोग प्रीतिपूर्वक उपासना करते हैं, उस परमात्म-तत्त्वमें मनको स्थिर करना चाहिये। जो बुद्धिसे परे है, ज्ञानस्वरूप है, सबका आदिकारण है, निरतिशय परम अमृतस्वरूप है तथा जिससे अधिक मङ्गलमय दूसरा कोई नहीं है, उस परमतत्त्व परमात्मामें मनको स्थिर करना चाहिये; क्योंकि देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, विद्याधरों, किंनरों तथा देवाङ्गनाओसे युक्त स्वर्गमें कुछ भी सुस्थिर एवं उत्तम तत्त्व नहीं है।

तात ! वृक्षोंसे, राजा-महाराजाओंसे, पर्वत, नगर एवं ग्वालोंकी आवास-भूमिसे तथा समुद्रसे युक्त भूमण्डलमें कुछ भी स्थायी और शोभन तत्त्व नहीं है। नागों, असुरों तथा असुरोंकी स्त्रियोंसे युक्त समस्त पाताल-लोकमें भी कोई स्थिर एवं मङ्गलदायक पदार्थ नहीं है। जिसमें स्वर्ग, देवलोक, पृथ्वीसहित पाताल एवं दसों दिशाएँ हैं, ऐसे इस सम्पूर्ण जगत्में कोई भी स्थिर और मङ्गलदायक पदार्थ नहीं है। तात्पर्य यह कि त्रिलोकमय सम्पूर्ण संसारमें आधि, व्याधि, चिन्ता, शोक ही भरे हैं; वास्तविक सुख-शान्तिका नामोनिशान भी नहीं है। इसलिये नाशवान् क्षणभङ्गुर संसारसे तीव्र वैराग्य करना चाहिये। अतएव सम्पूर्ण भूमण्डलका एकच्छत्र सम्राट् होना श्रेष्ठ नहीं, सबसे बड़े अभिन्द्र इन्द्र, बृहस्पति आदि देवता होना यानी स्वर्गका अधिपति होना भी श्रेष्ठ नहीं तथा पातालमें सम्पूर्ण पृथ्वीको

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * प्राण-अपानकी गतिको तत्त्वतः जाननेसे मुक्ति * ३८७


धारण करनेमें समर्थ शेषनाग होना यानी पातालका अधिपति होना भी श्रेष्ठ नहीं; क्योंकि ये सब क्षणभङ्गुर—नाशवान् हैं। जहाँ विवेकी पुरुषोंका मन पूर्णकाम होकर सुख-शान्ति पाता है, वैसी वास्तविक सुख-शान्ति वहाँ लेशमात्र भी नहीं है। आधि-व्याधियोंसे प्रचुर चिरजीविता भी श्रेष्ठ नहीं, समस्त व्याधियोंका विनाशरूप मरण भी अखिल दुःखोंकी निदान दृढ़ अज्ञतारूप होनेसे श्रेष्ठ नहीं है, नरक तथा स्वर्ग भी श्रेष्ठ नहीं; क्योंकि जहाँ विवेकी पुरुषोंका मन पूर्णकाम होता है, वैसा वहाँ कुछ भी नहीं है। उस प्रकारके सम्पूर्ण विविध सृष्टियोंके क्रम अज्ञानी मनुष्यकी बुद्धिकी मूढ़ताके कारण ही रमणीय प्रतीत होते हैं। इसलिये जो महान् संत हैं, वे अनित्य, क्षणभङ्गुर, नाशवान् मायिक पदार्थोंमें चिरविश्राम कैसे कर सकते हैं? क्योंकि उनमें वास्तविक सुख-शान्ति और विश्रामका अत्यन्त अभाव है। इसलिये विवेकी पुरुषोंको उनमें अत्यन्त वैराग्य करके उनसे उपरत हो जाना चाहिये। (सर्ग २३)


प्राण-अपानकी गतिको तत्त्वतः जाननेसे मुक्ति

भुशुण्डने कहा— महाराज! कभी नष्ट न होनेवाली, संशयोंसे रहित एक परमात्मदृष्टि ही समस्त ज्ञानोंमें सबसे उन्नत और सबसे श्रेष्ठ है। ब्रह्मन्! परमात्मविषयक विचार समस्त दुःखोंका अन्त कर देनेवाला तथा अनादि-कालसे चले आते हुए अज्ञानसे परिपूर्ण, दुःस्वप्न-तुल्य संसाररूपी भ्रमका विनाश करनेवाला है। भगवन्! समस्त संकल्पोंसे रहित परमात्मविषयक भावनासे अज्ञानरूपी अन्धकारका, उसके कार्योंके साथ, भली प्रकार विनाश हो जाता है। किंतु सामान्य बुद्धिवाले प्राणी समस्त कल्पनाओंसे अतीत इस परमपदको कैसे प्राप्त कर सकते हैं? अर्थात् साधारण पुरुषोंके लिये वह पद प्राप्त होना कठिन है। इस परमात्मविषयक भावनाके अनेक भेद हैं। उनमेंसे सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाली प्राणभावनाका मैंने आश्रय लिया है, वही यहाँ मेरे जीवनका आधार है।

श्रीवसिष्ठजी बोले— श्रीराम! जब मननशील भुशुण्ड इस प्रकार कह रहे थे, तब जानते हुए भी मैंने शान्त भावसे उनसे फिर कौतुकवश पूछा—'समस्त संदेहोंको काटनेवाले अत्यन्त दीर्घजीवी सज्जनस्वभाव भुशुण्ड! तुम मुझसे ठीक-ठीक कहो कि प्राणकी भावना किसे कहते हैं?'

भुशुण्डने कहा— मुने! आप समस्त वेदान्तके ज्ञाता हैं, समस्त संशयोंका विनाश करनेवाले हैं, तथापि केवल विनोदके लिये ही मुझ-जैसे कौएसे इस विषयका प्रश्न कर रहे हैं—ऐसा मैं मानता हूँ। महाराज! भुशुण्डको जिसने चिरजीवी बनाया है तथा जिसने भुशुण्डको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति करायी है, उस प्राण-समाधिका निरूपण मैं कहता हूँ, सुनिये। मुनिराज! इड़ा और पिङ्गला नामकी दो अत्यन्त सूक्ष्म नाड़ियों इस देहरूपी घरके बीच दाहिने और बायें भागमें स्थित कोष्ठमें यानी कुक्षिमें रहती हैं। उनका किसीको भान नहीं होता, वे केवल नासापुटमें प्राणसंचारद्वारा प्रतीत होती हैं। उक्त देहमें यन्त्रके सदृश तीन कमलके जोड़े हैं। वे अस्थि-मांसमय एवं अत्यन्त मृदु हैं। उनमें ऊपर और नीचे दोनों ओरसे नालदण्ड लगे हुए हैं और वे सम्पुटित होकर एक दूसरेसे मिले हुए कोमल सुन्दर दलोंसे सुशोभित हैं। उन तीन हृदय-कमलयन्त्रोंमें प्राणकी समस्त शक्तियाँ ऊपर और नीचेकी ओर उसी प्रकार फैली हुई हैं, जिस प्रकार चन्द्र-बिम्बसे किरणें फैलती हैं। इन प्राणशक्तियोंसे ही शीघ्रगति, आगति, चिरनिर्णय, हरण, विहरण, उत्पतन एवं निपतनकी क्रियाएँ निष्पन्न होती हैं। मुने! हृदय-कमलमें स्थित यही वायु पण्डितों-द्वारा प्राणके नामसे कही जाती है। इसीकी कोई एक शक्ति नेत्रोंको स्पन्दित करती है यानी नेत्रोंमें निमेष-


सं० यो० व० अं० १४—

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उन्मेषकी क्रिया करती है। उसीकी कोई एक शक्ति स्पर्शका ग्रहण करती है, दूसरी कोई शक्ति नासिकाद्वारा श्वास-उच्छ्वासका निर्वाह करती है, कोई एक दूसरी शक्ति अन्नका परिपाक करती है तो कोई अन्य शक्ति वाक्योंका उच्चारण करती है। महाराज ! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ । शरीरमें जो कुछ क्रिया या व्यापार होता है, वह सब शक्तिसम्पन्न वायु ही कराती है, जिस प्रकार यन्त्रचालक कठपुतलीसे नृत्यादि चेष्टा कराता है। उसमें ऊर्ध्वगमन और अधोगमन—ये दो प्रकारके संकेतवाले जो दो वायु प्रसूत होते हैं, वे दोनों श्रेष्ठ वायु प्राण एवं अपान नामसे प्रसिद्ध एवं प्रकट हैं। मुने ! मैं उनकी गतिका सदा अनुसरण करता हुआ स्थित रहता हूँ। उनका स्वरूप सदा शीतल और उष्ण रहता है एवं वे दोनों निरन्तर शरीरके भीतर आकाश-मार्गकी यात्रा करते रहते हैं। उन प्राण और अपान नामक वायुओंकी—जो शरीरमें सदा संचरण करते हैं तथा जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्तिमें सदा समानरूप हैं—गतिका अनुसरण करते हुए मेरे दिन सुषुप्ति-अवस्थामें स्थित मनुष्यकी भाँति व्यतीत हो रहे हैं। एक हजार अंशोंमें विभक्त कमलतन्तुके लेशमात्रकी अपेक्षा भी अत्यन्त दुर्लक्ष्य ये नाड़ियाँ हैं, अतः उनमें विद्यमान इन प्राण और अपान दोनों वायुओंकी भी गति दुर्बोध है। महात्मन् ! हृदय आदि स्थानोंमें निरन्तर विचरण करनेवाले प्राण और अपान वायुओंकी गतिके तत्त्वको जानकर उसका अनुसरण करनेवाला प्रसन्नचित्त पुरुष जन्म-मरणरूपी फाँसीसे छूटकर सदाके लिये मुक्त हो जाता है। वह फिर इस संसारमें लौटकर नहीं आता। ('सर्ग २४)


पूरक, रेचक, कुम्भक प्राणायामका तत्त्व जानकर अभ्यास करनेसे मुक्ति और सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासनाकी महिमा

भुशुण्डने कहा—ब्रह्मन् ! इस प्राणमें स्पन्दन-शक्ति तथा निरन्तर गतिक्रिया रहती है। यह प्राण बाह्य एवं आन्तर सर्वाङ्गोंसे परिपूर्ण देहमें ऊपरके स्थानमें—हृदय-देशमें स्थित रहता है। अपानवायुमें भी निरन्तर स्पन्द-शक्ति तथा सततगति रहती है। यह अपानवायु भी बाह्य एवं आन्तर समस्त अङ्गोंसे परिपूर्ण शरीरमें नीचेके स्थानमें—नाभिदेशमें स्थित रहता है। मुनिवर ! किसी प्रकारके यत्नके बिना प्राणोंकी हृदय-कमलके कोशसे होने-वाली जो स्वाभाविक बहिर्मुखता है, विद्वान्लोग उसे 'रेचक' कहते हैं। बारह अंगुलपर्यन्त बाह्य प्रदेशकी ओर नीचे गये हुए प्राणोंका लौटकर भीतर प्रवेश करते समय जो शरीरके अङ्गोंके साथ स्पर्श होता है, उसे 'पूरक' कहते हैं। अपानवायुके शान्त हो जाननेपर जबतक हृदयमें प्राणवायुका अभ्युदय नहीं होता, तबतक वह वायुकी कुम्भकावस्था (निश्चल स्थिति) रहती है, जिसका योगीलोग अनुभव करते हैं। इसीको आभ्यन्तर कुम्भक कहते हैं। ब्रह्मन् ! मृत्तिकाके अंदर असिद्ध घटकी स्थितिके सदृश बाहर नासिकाके अग्रभागसे लेकर बराबर सामने बारह अंगुलपर्यन्त आकाशमें जो अपानवायुकी निरन्तर स्थिति है, उसे पण्डितलोग 'बाह्य कुम्भक' कहते हैं। अतः बाहर प्राण-वायुके अस्तंगत होनेपर जबतक अपान-वायुका उद्गम नहीं होता, तबतक एकरूपसे स्थित पूर्ण (दूसरा) बाह्य कुम्भक रहता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। प्राण और अपानवायुके स्वभावभूत ये जो बाह्य और आभ्यन्तर कुम्भकादि प्राणायाम हैं, उनका भली प्रकार तत्त्व-रहस्य जानकर निरन्तर उपासना करनेवाला पुरुष पुनः इस संसारमें उत्पन्न नहीं होता। प्राणायामके तत्त्व-रहस्यको जाननेवाले योगीके स्वभावतः अत्यन्त चञ्चल ये वायु चलते, बैठते, जागते या सोते—सभी अवस्थाओंमें उसके इच्छानुसार निरुद्ध हो जाते हैं। मनुष्य अपने भीतर बुद्धिपूर्वक सम्यक् प्रकारसे इन कुम्भक आदि प्राणायामोंका स्मरण करता हुआ जो कुछ करता है या

निर्वाण-प्रकरण पू०] * पूरक, रेचक, कुम्भक प्राणायामका तत्त्व जानकर अभ्यास करनेसे मुक्ति * ३८९


खाता है, उनमें वह कर्तृत्व आदिके अभिमानसे तनिक भी ग्रस्त नहीं होता।

महर्षे ! इस प्रकार प्राणायामका अभ्यास करनेवाले पुरुषका मन विषयाकार वृत्तियोंके होनेपर भी बाह्य विषयोंमें रमण नहीं करता। जो शुद्ध और तीक्ष्ण बुद्धि-वाले महात्मा इस प्राणविषयक दृष्टिका अवलम्बन करके स्थित हैं, उन्होंने प्रापणीय पूर्ण ब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लिया और वे ही समस्त खेदोंसे रहित हैं। बैठते, चलते, सोते और जागते—सदा-सर्वदा पुरुष यदि तत्त्व-रहस्य समझकर प्राणायामका अभ्यास करें तो वे कभी बन्धनको प्राप्त ही न हों। प्राण और अपानकी उपासना-द्वारा प्राप्त यथार्थ ज्ञानसे युक्त पुरुषोंका मन, जो मलरूप मोहसे रहित एवं स्वस्थ है, इस अन्तःस्थित परमात्मामें ही सदा-सर्वदा लगा रहता है। शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको सदा करता हुआ भी शुद्धान्तःकरण निष्कामी ज्ञानी पुरुष प्राणापानकी गतिको तत्त्वतः जानकर भली-भाँति स्वस्थ हो सच्चिदानन्दघन परमात्माको प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मन् ! हृदय-कमलसे प्राणका अभ्युदय होता है और बाहर बारह अंगुलपर्यन्त प्रदेशमें यह प्राण विलीन होकर रहता है। इसीको 'बाह्य कुम्भक' कहते हैं। महामुने ! बाह्य बारह अंगुलकी चरम सीमासे अपानका उदय होता है और हृदय-प्रदेशमें स्थित कमलमें उसकी गति अस्त हो जाती है; इसीको 'आभ्यन्तर कुम्भक' कहते हैं। जिस बारह अंगुलकी चरम सीमाके आकाश प्रदेशमें प्राणकी समाप्ति हो जाती है, उसी आकाश-प्रदेशसे यह अपान उसीके बाद उत्पन्न हो जाता है। यह प्राण-वायु अग्नि-शिखाकी भाँति बाह्य आकाशके सम्मुख होकर बहता है और अपान-वायु जलकी तरह हृदयाकाशके सम्मुख होकर निम्नभागमें बहता है। चन्द्रमारूप अपान-वायु शरीरको बाहरसे पुष्ट करता है और सूर्यरूप प्राण-वायु इस शरीरको भीतरसे परिपक्व कर देता है। प्राण वायु निरन्तर हृदया-काशको सन्तप्तकर पश्चात् मुखाग्रभागके आकाशको तपाता है; क्योंकि यह उत्तम सूर्य ही है। अपान-वायुरूप यह चन्द्रमा पहले मुखके अग्रभागको पुष्टकर तदनन्तर हृदया-काशका अपने अमृत-प्रवाहसे पोषण करता है। अपानरूप चन्द्रमाकी किरणका प्राणरूपी सूर्यके साथ आभ्यन्तर कुम्भकके समय जिस हृदयस्थ ब्रह्मसे सम्बन्ध होता है, उस ब्रह्मपदको प्राप्तकर पुरुष पुनः शोकको प्राप्त नहीं होता। इसी प्रकार प्राणरूपी सूर्यकी किरणका अपान-रूपी चन्द्रमाके साथ बाह्य-कुम्भकके समय जिस बाह्य-प्रदेशस्थित ब्रह्मसे सम्बन्ध होता है, उस ब्रह्मपदको प्राप्तकर मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त नहीं करता।

मुने ! जो पुरुष हृदयाकाशमें स्थित प्राणरूप सूर्य-देवको उदय-अस्त, चन्द्रमा-रश्मि और गमनागमनसहित तत्त्वसे अनुभव करता है, वही यथार्थ अनुभव करता है। जैसे बाह्य अन्धकारके नष्ट हो जानेपर बाहरके पदार्थ प्रत्यक्ष हो जाते हैं, उसी प्रकार हृदयस्थित अज्ञानके नष्ट हो जानेपर शुद्धस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है। प्राण-वायुके विलीन हो जानेपर और अपान-वायुके उदयके पूर्व बाह्य कुम्भकका चिरकालतक अभ्यास करनेसे योगी शोकसे रहित हो जाता है। अपान-वायुके विलीन होनेपर और प्राण-वायुके उदयसे पूर्व भीतरी कुम्भकका चिरकालतक अभ्यास करनेसे योगी शोकसे रहित हो जाता है। जिस हृदयवर्ती ब्रह्मरूप स्थानमें ये प्राण और अपान दोनों विलीन हो जाते हैं, उस शान्त, आत्मस्वरूप ब्रह्मरूप पदका अवलम्बन करनेसे योगी अनुतप्त नहीं होता। महर्षे ! जिस चिन्मय परब्रह्म परमात्मामें अपानके साथ प्राणका, प्राणके साथ अपानका तथा उन दोनोंके साथ बाह्य एवं आभ्यन्तर देश-कालका विलय हो जाता है, उसी परब्रह्मरूप पदका आप दर्शन कीजिये।

जिस समय अपानके प्राकट्यसे पूर्व प्राण विलीन हुआ रहता है, उस समय किसी प्रकारके यत्नके बिना स्वाभाविक सिद्ध हुई जो बाह्य-कुम्भक अवस्था है, उसीको योगीलोग 'परम पद' कहते हैं। किसी प्रकारके यत्नके बिना ही

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सिद्ध हुआ अन्तःस्थ कुम्भक सर्वातिशायी ब्रह्मरूप परमपद है। यह परमात्माका वास्तविक स्वरूप है और यही सदा प्रकाशमय परम विशुद्ध चेतन है। इसको प्राप्त कर मनुष्य शोकसे रहित हो जाता है। जो प्राण-विलयका और जो अपान-विनाशका समीप एवं अन्तमें रहकर प्रकाशक है तथा जो प्राण और अपानके अंदर रहता है, हमलोग उस चेतन परमात्माकी उपासना करते हैं। जिसकी सत्ता-स्फूर्तिसे मन मनन करता है, बुद्धि निश्चय करती है एवं अहंकार अहंताको प्राप्त है, उस सच्चिदानन्दघन परमात्माकी हमलोग उपासना करते हैं। जिस परमात्मामें समस्त पदार्थ विद्यमान हैं, जिससे समस्त जगत् उत्पन्न हुआ है, जो सर्वात्मक है, जो सब ओर स्थित है और जो सर्वमय है, हमलोग उस चिन्मय परमात्माकी निरन्तर उपासना करते हैं। जो सम्पूर्ण ज्योतियोंका प्रकाशक है, जो समस्त पवित्रोंका भी परम पवित्र है, जो सम्पूर्ण संकल्प-विकल्प आदि भावनाओंसे रहित है, उस चेतन परब्रह्म परमात्माकी हम उपासना करते हैं। जहाँपर प्राण विलीन हो जाता है; जहाँ अपान भी अस्त हो जाता है तथा जहाँ प्राण और अपान दोनों उत्पन्न भी नहीं होते, हमलोग उस चेतन तत्त्वरूप परमात्माकी उपासना करते हैं। बाह्य और आभ्यन्तर प्रदेशमें स्थित, योगियोंद्वारा अनुभूत होनेवाले जो दो प्राण और अपानकी उत्पत्तिके स्थान हैं, उन दोनोंके अधिष्ठानभूत चेतन तत्त्वकी हम उपासना करते हैं। जो प्राण और अपानके विवेकमें हेतु है, जो उनके अस्तित्वका ज्ञान करानेवाला है, जो स्वयं रूपरहित है एवं जो प्राणोपासनासे प्राप्तव्य है, उस चिन्मय विज्ञानानन्दघन परमात्माकी हम उपासना करते हैं। (सर्ग २५)

भुशुण्डकी वास्तविक स्थितिका निरूपण, वसिष्ठजीद्वारा भुशुण्डकी प्रशंसा, भुशुण्डद्वारा वसिष्ठजीका पूजन तथा आकाशमार्गसे वसिष्ठजीकी स्वलोकप्राप्ति

भुशुण्डने कहा—महामुने ! मैंने प्राणसमाधिके द्वारा पूर्वोक्त रीतिसे विशुद्ध परमात्मामें यह चित्त-विश्रामरूप परम शान्ति क्रमशः स्वयं प्राप्त की है। मैं इस प्राणायामका अवलम्बन करके दृढ़तापूर्वक स्थित हूँ। इसलिये सुमेरुपर्वतके विचलित होनेपर भी मैं चलायमान नहीं होता। चलते-बैठते, जागते या सोते अथवा स्वप्नमें भी मैं अखण्ड ब्रह्माकारवृत्तिरूप समाधिसे विचलित नहीं होता; क्योंकि तपस्वियोंमें महान् वसिष्ठजी ! प्राण और अपानके संयमरूप प्राणायामके अभ्याससे प्राप्त परमात्माके साक्षात् अनुभवसे मैं समस्त शोकोंसे रहित आदिकारण परमपदको प्राप्त हो गया हूँ। ब्रह्मन् ! महाप्रलयसे लेकर प्राणियोंकी उत्पत्ति एवं विनाशको देखता हुआ मैं ज्ञानवान् हुआ आज भी जी रहा हूँ। जो बात बीत चुकी और जो होनेवाली है, उसका मैं कभी चिन्तन नहीं करता। उपर्युक्त प्राणायामविषयक दृष्टिका अपने मनसे अवलम्बन करके इस कल्पवृक्षपर स्थित हूँ । न्याययुक्त जो भी कर्तव्य प्राप्त हो जाते हैं, उनका फलाभिलाषाओंसे रहित होकर केवल सुषुप्तिके समान उपरत बुद्धिसे अनुष्ठान करता रहता हूँ। प्राण और अपानके संयोगरूप कुम्भक-कालमें प्रकाशित होनेवाले परमात्मतत्त्वका निरन्तर स्मरण करता हुआ मैं अपने आपमें स्वयं ही नित्य संतुष्ट रहता हूँ। इसलिये मैं दोषरहित होकर चिरकालसे जी रहा हूँ। मैंने आज यह प्राप्त किया और भविष्यमें दूसरा सुन्दर पदार्थ प्राप्त करूँगा, इस प्रकारकी चिन्ता मुझे कभी नहीं होती । मैं अपने या दूसरे किसीके कार्योंकी किसी समय कहींपर कभी स्तुति और निन्दा नहीं करता। शुभकी प्राप्ति होनेपर मेरा मन हर्षित नहीं होता और अशुभकी प्राप्ति होनेपर कभी खिन्न नहीं होता; क्योंकि मेरा मन नित्य सम ही रहता है।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भुशुण्डकी वास्तविक स्थितिका निरूपण * ३२१

सुने। मेरे मनकी चञ्चलता शान्त हो गयी है। मेरा मन शोकसे रहित, स्वस्थ, समाहित एवं शान्त हो चुका है। इसलिये मैं विकार-रहित हुआ चिरकालसे जी रहा हूँ। 'लकड़ी, रमणी, पर्वत, तृण, अग्नि, हिम, आकाश—इन सबको मैं समभावसे देखता हूँ। जरा और मरण आदिसे मैं भयभीत नहीं होता एवं राज्य-प्राप्ति आदिसे हर्षित नहीं होता। इसलिये मैं अनामय होकर जीवित हूँ। ब्रह्मन् ! यह मेरा बन्धु है, यह मेरा शत्रु है, यह मेरा है एवं यह दूसरेका है—इस प्रकारकी भेद-बुद्धिसे मैं रहित हूँ। ग्रहण और विहार करनेवाला, बैठने और खडा रहनेवाला, श्वास तथा निद्रा लेनेवाला यह शरीर ही है, आत्मा नहीं—यह मैं अनुभव करता हूँ। इसलिये मैं चिरजीवी हूँ। मैं जो कुछ किया करता हूँ, जो कुछ खाता-पीता हूँ, वह सब अहंता-ममतासे रहित हुआ ही करता हूँ। मैं दूसरोंपर आक्रमण करनेमें समर्थ हुआ भी आक्रमण नहीं करता, दूसरोंके द्वारा खेद पहुँचाये जानेपर भी दुःखित नहीं होता एवं दरिद्र होनेपर भी कुछ नहीं चाहता; इसलिये मैं विकार-रहित हुआ बहुत कालसे जी रहा हूँ। मैं आपत्तिकालमें भी चलायमान नहीं होता, वरं पर्वतकी तरह अचल रहता हूँ। जगत्-आकाश, देश-काल, परम्परा-क्रिया—इन सबमें चिन्मयरूपसे मैं ही हूँ, इस प्रकारकी मेरी बुद्धि है; इसलिये मैं विकाररहित हुआ बहुत कालसे स्थित हूँ। ज्ञानके पारंगत ब्रह्मन् ! एकमात्र आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही धृष्टतापूर्वक मैंने, जो और जैसा हूँ, वह सब आपसे यथार्थरूपसे बता दिया है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—'ऐश्वर्यपूर्ण पक्षिराज ! यह बड़े हर्षका विषय है, जो आपने कानोंके लिये भूषण-स्वरूप यह अत्यन्त आश्चर्यमयी अपनी अलौकिक स्थिति मुझसे कही है। वे महात्मा धन्य हैं, जो ब्रह्माजीके समान स्थित अत्यन्त दीर्घजीवी आपके दर्शन करते हैं। ये मेरे नेत्र भी धन्य हैं, जो बराबर आपके दर्शन कर रहे हैं। आपने मुझसे बुद्धिको पवित्र करनेवाला अपना सम्पूर्ण जीवन-वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों ठीक-ठीक कहा है। मैंने सब दिशाओंमें भ्रमण किया और देवताओं एवं बड़े-बड़े तत्त्ववेत्ताओंकी ज्ञान आदि विभूतियोंको देखा, परंतु इस जगत्‌में आपके समान दूसरे किसी महान् ज्ञानीको नहीं देखा। इस संसारमें भ्रमण करनेपर किसी-को किसी महान् पुरुषकी प्राप्ति हो भी सकती है; परंतु आप-जैसे ज्ञानी महात्माओंका प्राप्त होना तो इस जगत्में कहीं भी सुलभ नहीं है अर्थात् दुर्लभ है। पुण्य-देह एवं विमुक्तात्मा आपका अवलोकन करके मैंने तो आज अत्यन्त कल्याणकर एक बहुत बडा कार्य सम्पादन कर लिया है। पक्षिराज ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी शुभ गुफामें प्रवेश करो; क्योंकि मध्याह्न कर्तव्यके लिये मेरा समय हो गया है; अतः मैं भी देवलोकमें जा रहा हूँ।' श्रीराम ! यह सुनकर चिरंजीवी भुशुण्डने वृक्षसे उठकर अर्घ्य, पाद्य और पुष्पोंसे त्रिनेत्रधारी महादेवजीके समान मेरी पैरसे लेकर मस्तकपर्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा की। तदनन्तर 'आप मेरे पीछे चलनेके लिये अधिक श्रम न करें' इस प्रकार कहता हुआ मैं आसनसे उठकर आकाशमार्गसे चला गया। भुशुण्डका स्मरण करते हुए

३९२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अरुन्धतीसे पूजित मैंने भी सप्तर्षि-मण्डलको प्राप्तकर मुनियोंका दर्शन किया।

श्रीराम ! सत्ययुगके प्रथम दो शतक जब व्यतीत हो चुके थे, तब मेरु पर्वतके उस कल्पवृक्षपर भुशुण्डके साथ मैंने पहले-पहल भेंट की थी। इस समय सत्ययुगके क्षीण हो जानेपर त्रेतायुग चल रहा है और इस त्रेतायुगके मध्यमें आप प्रकट हुए हैं। आजसे आठ वर्ष पहले सुमेरु पर्वतके उसी शिखरके ऊपर ज्यों-का-त्यों अजररूपधारी वह भुशुण्ड मुझसे फिर मिला था। इस प्रकारका विचित्र उत्तम भुशुण्ड-वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा, इसका श्रवण और विचार करके जैसा उचित समझो, वैसा करो।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! बुद्धिमान् भुशुण्डकी इस उत्तम कथाका जो विशुद्धबुद्धि मनुष्य भली प्रकार विवेक-पूर्वक विचार करेगा, वह इसी शरीरमें जन्मादि भयोंसे परिपूर्ण इस माया-नदीको पार कर जायगा। (सर्ग २६-२७)


शरीर और संसारकी अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपताका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप श्रीराम ! इस प्रकार यह भुशुण्ड-वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। इस विवेक-युक्त यथार्थ बुद्धिसे भुशुण्ड मोह-संकटसे तर गया था। पूर्वोक्त प्राण और अपानकी उपासना करनेवाले सभी अनासक्तबुद्धि मनुष्य भुशुण्डकी तरह परमपदरूप परमात्मामें स्थिति प्राप्त करते हैं । श्रीराम ! इन सब विचित्र विज्ञानोपासनाओंका तुमने श्रवण किया। अब बुद्धिका अवलम्बन करके जैसा उचित समझो, वैसा करो।

श्रीरामजीने कहा—भगवन् ! आपने जो भुशुण्डका उत्तम, यथार्थ तत्त्वका बोधक और आश्चर्यजनक श्रेष्ठ चरित्र कहा, उससे मुझे अत्यन्त हर्ष हुआ। ब्रह्मन् ! मांस, चर्म और अस्थिसे निर्मित शरीररूपी घरका जो आपने वर्णन किया है, उसकी किसने रचना की, कहाँसे वह उत्पन्न हुआ, किस तरहसे स्थित हुआ और उसमें कौन रहता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! परब्रह्मरूप परमार्थ-तत्त्वको जाननेके लिये तथा संसारके कारणरूप अनेक दोषोंके विनाशके लिये मेरे द्वारा तत्त्वतः कहे जानेवाले इस उपदेशको तुम सुनो । श्रीराम ! इस शरीररूपी घरका—जिसमें हड्डियाँ ही खंभे हैं, मुख आदि नौ दरवाजे हैं और जो रक्त और मांससे लीपा गया है—वास्तवमें किसीने भी निर्माण नहीं किया है। यह शरीर केवल आभासरूप (झलकमात्र) ही है—बिना निर्माताके ही अज्ञानसे भासित होता है। यह देह प्रतीत होता है, इसलिये इसे सत् कहा गया है और वास्तवमें यह नहीं है, इसलिये असत् कहा गया है । जैसे स्वप्नकालमें ही स्वाप्निक पदार्थ सत्-से प्रतीत होते हैं, किंतु जाग्रत्कालमें वे असत् हैं—उनका अत्यन्त अभाव है, तथा जैसे मृगतृष्णिकाका जल भी मृगतृष्णिकाकी प्रतीति होनेपर ही सत्-सा रहता है, अन्य विचारकालमें वह असत् रहता है, वैसे ही देहकी प्रतीति होनेपर देह सत्य-सी है और आत्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर असत्य है, अर्थात् उसका अत्यन्त अभाव है। इसलिये ये शरीर आदि, जो केवल आभासरूप ही हैं, अज्ञानकालमें ही प्रतीत होते हैं।

श्रीराम ! भला, बतलाओ तो सही कि सुख-शय्यापर सोये हुए तुम जिस स्वप्न-देहसे विविध दिशाओंमें परिभ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह किस स्थानमें स्थित है। स्वप्नमें भी जो दूसरा स्वप्न आता है, उस स्वप्नमें जिस देहसे बड़े-बड़े पृथिवी-तटोंपर तुम परिभ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह कहाँ स्थित है ? मनोराज्यके भीतर कल्पित दूसरे मनोराज्यमें बड़े-बड़े वैभवपूर्ण स्थानोंमें

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शरीर और संसारकी अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपताका वर्णन * ३९३


संकल्पद्वारा जिस देहसे तुम भ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह कहाँ स्थित है अर्थात् कहीं नहीं। श्रीराम ! ये शरीर जिस प्रकार मानसिक संकल्पसे उत्पन्न—अतएव सत् और असद्रूप हैं, ठीक उसी प्रकार यह प्रस्तुत शरीर भी मानसिक संकल्पसे उत्पन्न—अतएव सद्रूप और असद्रूप हैं। यह मेरा धन है, यह मेरा शरीर है, यह मेरा देश है—इस प्रकारकी जो भ्रमजनित प्रतीति होती है, वह भी अज्ञानसे ही होती है; क्योंकि धन आदि सब कुछ चित्तजनित सङ्कल्पका ही कार्य है । रघुनन्दन ! इस संसारको एक तरहका दीर्घ स्वप्न, दीर्घ चित्तभ्रम या दीर्घ मनोराज्य ही समझना चाहिये। स्वप्न और संकल्पोंसे ( मनोराज्योंसे ) जैसे एक विलक्षण बिना हुए ही जगत्की प्रतीति होती है, वैसे ही यह व्यावहारिक जगत्की स्थिति भी एक प्रकारसे सङ्कल्पजनित एवं विलक्षण ( अनिर्वचनीय ) ही है; क्योंकि वह बिना हुए ही प्रतीत होती है । श्रीराम ! पौरुष-प्रयत्नसे मनको अन्तर्मुख बनानेपर जब परमात्माके तत्त्वका यथार्थ साक्षात्कार हो जाता है, तब यह जगदाकार सङ्कल्प चिन्मय परमात्मरूप ही अनुभव होने लगता है, किंतु यदि उसकी विपरीत रूपसे भावना की जाय तो विपरीत ही अनुभव होने लगता है ( भावनाके अनुसार ही संसार है ) । क्योकि 'यह वह है', 'यह मेरा है' और 'यह मेरा संसार है'—इस प्रकारकी भावना करनेपर देहादि जगद्रूप संकल्प जो सत्य-सा प्रतीत होता है, वह केवल सुदृढ भावनासे ही होता है । दिनके व्यवहारकालमें मनुष्य जैसा अभ्यास करता है, वैसा ही स्वप्नमें उसे दिखलायी पडता है। उसी प्रकार बार-बार जैसी भावना की जाती है, वैसा ही यह संसार दिखलायी देता है । जैसे स्वप्नकालमें थोड़ा-सा समय भी अधिक समय प्रतीत होता है, वैसे ही यह संसार अल्पकालस्थायी और विनाशशील होनेपर भी स्थिर प्रतीत होता है ।

जैसे सूर्यकी किरणोंसे मरुभूमिमें मृगतृष्णा-नदी दिखायी देती है, वैसे ही ये पृथिवी आदि पदार्थ वास्तविक न होनेपर भी संकल्पसे सत्य-से दिखायी देते हैं । जिस प्रकार नेत्रोंके दोषसे आकाशमें मोरपंख दिखायी देते हैं, वैसे ही बिना हुए ही यह जगत् मनके भ्रमसे प्रतीत होता है । किंतु दोषरहित नेत्रसे जैसे आकाशमें मोरपंख नहीं दिखायी देते, वैसे ही यथार्थ ज्ञान होनेपर यह जगत् दिखलायी नहीं पडता । श्रीराम ! जिस प्रकार डरपोक मनुष्य भी अपने कल्पित मनोराज्यके हाथी, बाघ आदिको देखकर भयभीत नहीं होता, क्योकि वह समझता है कि यह मेरी कल्पनाके सिवा और कुछ नहीं है, वैसे ही यथार्थ ज्ञानी पुरुष इस संसारको कल्पित समझकर भयभीत नहीं होता; क्योंकि ये भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनो जगत् प्रतीतिमात्र ही है । वे वास्तवमें नही है, इसलिये सत् नहीं हैं और उनकी प्रतीति होती है, इसलिये उनको सर्वथा असत् भी नहीं कह सकतेः अतएव अन्य कल्पनाओंका अभाव ही परमात्माका यथार्थ ज्ञान है । इस संसारमें व्यवहार करनेवाले सभी मनुष्योंको अनेक प्रकारकी आपदाएँ स्वाभाविक ही प्राप्त हुआ करती हैं । क्योकि यह जगत्-समूह वैसे ही उत्पन्न होता है, बढ़ता है और विकसित होता है, जैसे समुद्रमें बुद्बुदोंका समूह; फिर इस विषयमें शोक ही क्या । परमात्मा जो सत्य वस्तु है, वह सदा सत्य ही हैं और यह दृश्य जो असत्य वस्तु हैं, वह सदा असत्य ही हैं; इसलिये मायारूप विकृतिके वैचित्र्यसे प्रतीयमान इस प्रपञ्चमे ऐसी दूसरी कौन वस्तु हैं, जिसके विषयमें शोक किया जाय ?

इसलिये असत्यभूत इस संसारमे तनिक भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिये; क्योकि जैसे रज्जुसे बैल दृढ बँध जाता है, वैसे ही आसक्तिसे यह मनुष्य दृढ बँध जाता है । अत निष्पाप श्रीराम ! 'यह सब ब्रह्मरूप ही है' इस प्रकार समझकर तुम आसक्तिरहित हुए इस संसारमें विचरण करो । मनुष्यको विवेक-बुद्धिसे आसक्ति और

३९४* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अनासक्तिका परित्याग करके अनायास ही शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये, शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंका कभी नहीं। अर्थात् उनकी सर्वथा उपेक्षा कर देनी चाहिये। यह दृश्यमान प्रपञ्च केवल प्रतीतिमात्र है, वास्तवमे कुछ नहीं है—यों जिस मनुष्यको भलीभाँति अनुभव हो जाता है, वह अपने भीतर परम शान्तिको प्राप्त कर लेता है। अथवा 'मैं और यह सारा प्रपञ्च चैतन्यात्मक परब्रह्मस्वरूप ही है'—इस प्रकार अनुभव करनेपर अनर्थकारी यह व्यर्थ जगद्रूपी आडम्बर प्रतीत नहीं होता। श्रीराम ! जो कुछ भी आकाशमें या स्वर्गमें या इस संसारमें सर्वोत्तम परमात्म-वस्तु है, वह एकमात्र राग-द्वेष आदि-के विनाशसे ही प्राप्त हो जाती है। किंतु राग-द्वेष आदि दोषोंसे आक्रान्त हुई बुद्धिके द्वारा जैसा जो कुछ किया जाता है, वह सब कुछ मूढोंके लिये तत्काल ही विपरीत रूप (दुःखरूप) हो जाता है। जो पुरुष शास्त्रोंमें निपुण, चतुर एवं बुद्धिमान् होकर भी राग-द्वेष आदिसे परिपूर्ण हैं, वे संसारमें शृगालके तुल्य हैं। उन्हें धिक्कार है। धन, बन्धुवर्ग, मित्र—ये सब बार-बार आते और जाते रहते हैं; इसलिये उनमें बुद्धिमान् पुरुष क्या अनुराग करेगा। कभी नहीं, उत्पत्ति-विनाशशील भोग-पदार्थोंसे परिपूर्ण संसारकी रचनारूप यह परमेश्वरकी माया आसक्त पुरुषोंको ही अनर्थ गर्तोंमें ढकेल देती है। राघव ! वास्तवमें धन, जन और मन सत्य नहीं हैं, किंतु मिथ्या ही दीख पड़ते हैं। क्योंकि आदि और अन्तमें सभी पदार्थ असत् हैं और बीचमें भी क्षणिक एवं दुःखप्रद है; इसलिये बुद्धिमान् पुरुष आकाश-वृक्षके सदृश कल्पित इस संसारसे कैसे प्रेम करेगा। (सर्ग २८)


संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता और आत्माकी अविनाशिता एवं अहंकाररूपी चित्तके त्यागका वर्णन तथा श्रीमहादेवजीके द्वारा श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब केवल संकल्परूपी नाभिका भली प्रकार अवरोध कर दिया जाता है, तभी यह संसाररूपी चक्र घूमनेसे रुक जाता है। किंतु संकल्पात्मक मनोरूप नाभिको राग-द्वेष आदिसे क्षोभित करनेपर यह संसाररूपी चक्र रोकनेकी चेष्टा करनेपर भी वेगके कारण चलता ही रहता है। इसलिये परम पुरुषार्थका आश्रय लेकर श्रवण, मनन, निदिध्यासनकी युक्तियोंके द्वारा ज्ञानरूपी बलसे चित्तरूपी संसार-चक्रकी नाभिका अवश्य अवरोध करना चाहिये। क्योंकि कहींपर ऐसी कोई वस्तु उपलब्ध है ही नहीं, जो उत्तम बुद्धि तथा सौजन्यसे परिपूर्ण शास्त्रसम्मत परम पुरुषार्थसे प्राप्त न की जा सके।* श्रीराम ! आधि और व्याधिसे निरन्तर दुःखित, अश्रु आदिसे क्लिन्न तथा स्वयं विनाशशील इस शरीरमें उस प्रकारकी भी स्थिरता नहीं रहती, जिस प्रकारकी चित्रलिखित पुरुषमे रहती है। चित्रित मनुष्यकी यदि भलीभाँति रक्षा की जाय तो वह दीर्घकालतक सुशोभित रहता है; किंतु उसका बिम्बरूप शरीर तो अनेक यत्नोंसे रक्षित होनेपर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। स्वप्न आदिका शरीर स्वप्नकालीन संकल्पसे जनित होनेके कारण दीर्घकालीन सुख-दुःखोंसे आक्रान्त नहीं होता। यह शरीर तो दीर्घकालीन संकल्पसे उत्पन्न होनेके कारण दीर्घकालके दुःखोंसे आक्रान्त रहता है। संकल्पमय यह शरीर स्वयं भी नहीं है और न आत्माके साथ इसका सम्बन्ध ही है; अतः इस शरीरके लिये यह अज्ञानी जीव निरर्थक क्लेशका भाजन क्यों बनता है ? अर्थात् इसमें एकमात्र अज्ञान ही हेतु हैं। जिस प्रकार चित्रलिखित पुरुषका क्षय या विनाश हो जानेपर बिम्बरूप देहकी हानि नहीं होती, उसी प्रकार संकल्पजनित पुरुषका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी


* प्रज्ञामौजन्ययुक्तेन शास्त्रसवलितेन च।
पौरुषेण न यत्प्राप्तं न तत्क्वचन लभ्यते ॥
(नि० पू० २९ । ८)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता * ३९५


हानि नहीं होती। जिस प्रकार मनोराज्यमें उत्पन्न शरीर आदि पदार्थोंका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी हानि नहीं होती, जिस प्रकार स्वप्नमें उत्पन्न पदार्थोंका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी हानि नहीं होती अथवा जिस प्रकार मृगतृष्णिका-नदीके जलका क्षय या विनाश हो जानेपर वास्तविक जलकी कुछ भी हानि नहीं होती, उसी प्रकार एकमात्र सङ्कल्पसे उत्पन्न, स्वभावतः विनाशशील इस शरीररूपी यन्त्रका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी हानि नहीं होती। अतः शरीरके लिये शोक करना निरर्थक ही है। चित्तके संकल्पसे कल्पित तथा दीर्घकालीन स्वप्नमय इस देहके अलङ्कारोंसे भूषित या आधि-व्याधिसे दूषित हो जानेपर चेतन आत्माकी कुछ भी हानि नहीं है। श्रीराम ! देहका विनाश होनेपर चेतन आत्मा विनष्ट नहीं होता।

अज्ञानरूपी चक्रके ऊपर स्थित हुआ जीवात्मा जिस देहके जन्म-मरणरूपी चक्रको देखता रहता है, वह उत्तरोत्तर अधिक भ्रान्तिको देनेवाला, स्वयं भ्रान्तिरूप, पतनोन्मुख खड्गसे ग्रस्त, भली प्रकार अनर्थ-गर्तमें गिराया गया, हत एवं हन्यमान ही दीख पड़ता है। इसलिये मनुष्यको उत्तम धैर्यका भली प्रकार आश्रय लेकर इस अनादि दृढ़ीभूत भ्रमका परित्याग कर देना चाहिये। मिथ्या अज्ञानके द्वारा एकमात्र सङ्कल्पसे उत्पन्न हुआ यह शरीर सत्य-सा होनेपर भी वास्तवमें असत्य ही है; क्योंकि जो वस्तु अज्ञानसे उत्पन्न हुई है, वह किसी समय भी सत्य नहीं हो सकती। श्रीराम! जड पदार्थके द्वारा जो कुछ किया जाता है, वह किया हुआ नहीं माना जाता, इसलिये यह देह कार्य करता हुआ भी कहीं कुछ भी नहीं करता। जड देह तो इच्छासे रहित है और इस निर्विकार आत्मामें इच्छा रहती नहीं, इसलिये कोई कर्ता है ही नहीं। आत्मा शरीरका द्रष्टामात्र है। अपने शरीररूपी घरसे चित्तरूपी वेतालको हटा देनेपर इस मसाररूपी शून्य नगरमें पुरुष कभी भी नहीं डरता। विमल बुद्धिसे अहंकारकी वासना छोड़कर और अहंकारको सर्वथा भूलकर शीघ्रातिशीघ्र अपनी आत्माका ही अवलम्बन करना चाहिये। अहंकारसे युक्त बुद्धिसे जो क्रिया की जाती है, विषवल्लीके सदृश उसका फल मरणरूप ही होता है। विवेक एवं धैर्यसे रहित जिस मूर्खने अपने अहंकाररूपी महोत्स्रवका अवलम्बन किया, उसे तुम तत्काल विनष्ट हुआ ही समझो। राघव ! जिन बेचारोंको अहंकाररूपी पिशाचने अपने अधीन बना लिया, वे सब नरकरूपी अग्नियोंके इन्धन ही बन गये अर्थात् वे नरककी ज्वालासे जलते रहते हैं। पापशून्य राघव ! 'हा ! हा ! मैं मर गया हूँ', 'मै जल गया हूँ' इत्यादि जो दुःखवृत्तियाँ हैं, वे अहंकाररूपी पिशाचकी ही शक्तियाँ हैं, दूसरेकी नहीं। जिस प्रकार सर्वत्र व्यापक आकाश यहाँ किसीसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र व्यापक आत्मा भी अहंकारसे लिप्त नहीं होता। श्रीराम ! प्राणवायुसे युक्त यह चञ्चल देहरूपी यन्त्र जो कुछ करता एव जो कुछ लेता है वह सब अहंकारकी ही चेष्टा है।

श्रीराम ! जड चित्तका, जो आत्मासे सर्वथा पृथक् है, चेतन आत्माके साथ कभी सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। चित्त ही आत्मा है—यो अज्ञानसे ही प्रतीत होता है। यह जो आत्मा है, वह ज्ञानस्वरूप (चैतन्यरूप), अविनाशी, सर्वत्र विद्यमान और व्यापक है, जब कि अहंकाररूप चित्त तो मूर्ख और हृदयवर्ती सबसे बड़ा अज्ञान है। जिस पुरुषका चित्तरूपी वेताल शान्त हो चुका है, ऐसे पुरुषका गुरु, शास्त्र, धन और बन्धु उसी प्रकार उद्धार करनेमें समर्थ हैं, जिस प्रकार अल्प कीचड़में फँसे हुए पशुका मनुष्य उद्धार करनेमें समर्थ हों। इस जगत्रूपी महान् अरण्यमें अपनेद्वारा ही स्वयं दृढ़तासे धैर्य धारणकर अपना उद्धार कर लेना चाहिये। श्रीराम ! मनुष्यको उचित है कि विषयरूपी सर्पोंका बहिष्कार कर दे, आर्योंके मार्गका अनुसरण करे और महावाक्योंके अर्थका भली प्रकार विचार करके अपनी अद्वितीय आत्माका ही आश्रय ले। मनुष्यको अपवित्र, तुच्छ, भाग्यहीन तथा दुष्ट आकृतिवाले इस शरीरके आरामके लिये विषयभोगमें कभी नहीं फँसना चाहिये; क्योंकि इसमें फँसे हुए पुरुषोंकी चिन्तारूपी

३९६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

क्रूर राक्षसी खा डालती है। जैसे पत्थरका पत्थरपन अथवा जैसे घटका घटपना सामान्य सत्तारूप परमात्मा-से अभिन्न ही है, वैसे ही समष्टि-व्यष्टि मन आदि भी परमात्मासे अभिन्न ही हैं। श्रीराम ! इस विषयमें आगे कही जानेवाली महान् अज्ञानकी नाशक मानस-शिवपूजा-रूप यह दूसरी बात तुम श्रवण करो, जो चन्द्रमौलि भगवान् शंकरने कैलास पर्वतकी कन्दरामें जन्म-मरणरूप दुःखकी शान्तिके लिये मेरे समक्ष कही थी।

कैलासनामक एक पर्वतोंका राजा है। वह अपनी ऊँचाईसे स्वर्गलोकको भी पार कर गया है और वह उमापति भगवान् श्रीशंकरका निवासस्थान है। वहाँपर स्वयं प्रकाशमान भगवान् महादेवजी रहते हैं। पहले किसी समय उसी पर्वतपर उन देवाधिदेवकी पूजा करता हुआ मैं गङ्गाजीके किनारे आश्रम बनाकर रहता था। तपके लिये वहाँपर मैने दीर्घकालतक तपस्वियोंके आचरणका अनुसरण किया। वहाँपर मेरे चारो ओर सिद्धोंके समूह रहते थे। मैं उनसे विचार-विनिमय करके शास्त्रीय दुरूह तत्त्वोंका अनुशीलन करता था। मैने फूल चुननेके लिये एक डलिया रख छोड़ी थी और अनेक शास्त्रीय पुस्तकें भी जुटा रखी थीं। श्रीराम ! उस तरहके गुणोंसे सम्पन्न कैलासवनके कुञ्जोंमें तपश्चर्या करते हुए मेरा बहुत समय व्यतीत हो गया। इसके अनन्तर किसी एक समयकी बात है—श्रावणके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथि थी और रात्रिका प्रथम भाग यानी प्रदोषकाल पूजा, जप, ध्यान आदिमें व्यतीत हो चुका था। उस समय उस अरण्यमें मैने तत्काल ही उत्पन्न हुआ एक बड़ा तेज देखा। वह तेज सैकड़ों बादलोंके तुल्य सफेद एवं असंख्य चन्द्रबिम्बोंके सदृश चमकीला था, उस तेजकी चकाचौंधसे दिशाओंके समस्त कुञ्ज चमक उठे। उसे देखकर मैने भीतरकी प्रकाशमान दिव्य-दृष्टिसे उसके विषयमें विचार किया और तदनन्तर फिर बाह्यदृष्टिसे विशेष अवयवोंके अनुसंधानपूर्वक उसका अवलोकन किया। विचारकर ज्यों ही मैं सामनेका शिखर-प्रदेश देखता हूँ, त्यों ही चन्द्रकलाधर महादेवजी उपस्थित हो गये। वहाँ अर्घ्यपात्र लेकर सावधान एवं प्रसन्न-मन मैं उन गौरीपतिके निकट गया। तदनन्तर चन्द्रज्योत्स्ना-के समान कोमल, शीतल तथा समस्त संतापोंका अपहरण करनेवाली उस महादेवजीकी दृष्टिका मैं दीर्घकाल-तक भाजन बना रहा। पुष्पोंके शिखरपर उपविष्ट तीनों लोकोंके साक्षी उन देवाधिदेवको मैने समीप जाकर अर्घ्य, पुष्प तथा पाद्य समर्पण किया। उनके सामने मैने अनेक मन्दार-पुष्पोंकी अञ्जलियाँ बिखेर दीं और नानाविध नमस्कार एवं स्तोत्रोंसे शिवजीका अभ्यर्चन किया। तदनन्तर मैने शिवजीकी पूजाके सदृश ही पूजासे सखियोंसे युक्त तथा गणमण्डलसे परिवेष्टित भगवती गौरीका उत्तम रीतिसे पूजन किया। पूजाकी समाप्ति होनेपर उनकी आज्ञासे पुष्पमय शिखर-पर बैठे हुए मुझसे अर्धचन्द्रकी कला धारण करनेवाले भगवान् उमापति परिपूर्ण हिमांशुकी किरणके सदृश शीतल वाणीसे कहने लगे।

निर्वाण-प्रकरण पू० ]श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन३१७


भगवान् उमापतिने कहा—ब्रह्मन् ! शान्तिसे युक्त, परमात्मामें विश्राम लेनेवाली तथा कल्याण करनेवाली तुम्हारी चित्तवृत्तियाँ अपने स्वरूपमें अवस्थित तो हैं ? तुम्हारा कल्याणकारी तप निर्विघ्नरूपसे बराबर चल रहा है न ? तुमने प्राप्तव्य वस्तु प्राप्त कर ली है न ? और सांसारिक भय शान्त हो रहे हैं न ?

(श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—) रघुनन्दन ! समस्त लोकोंके एकमात्र हेतु देवाधिदेव महादेवजीके उस प्रकार कहनेके अनन्तर विनययुक्त वाणीसे मैने उनसे निवेदन किया—'महेश्वर ! देवाधिदेव ! त्रिलोचन ! आपकी निरन्तर स्मृतिसे प्राप्त हुए उत्तम कल्याणसे सम्पन्न पुरुषोंके लिये इस संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है और न किसी तरहके भय ही है । आपके निरन्तर स्मरणसे जनित आनन्दके कारण जिनका चित्त चारो ओरसे मुग्ध हो गया है, ऐसे पुरुषोंको इस जगत्कोशमें सभी प्राणी प्रणाम करते हैं । एकमात्र आपके अनुस्मरणमें निरन्तर जिनका मन लगा रहता है, ऐसे पुरुष जहाँ स्थित रहते हैं, वे ही देश, वे ही जनपद, वे ही दिशाएँ और वे ही पर्वत प्रशस्ततम हैं । प्रभो ! आपका अनुस्मरण पूर्व-संचित, वर्तमान और भविष्यके पुण्यसमूहकी वृद्धि करता है । आपका अनुस्मरण ज्ञानरूपी अमृतका एकमात्र आधारभूत कलश है, धृतिरूपी ज्योत्स्नाके लिये चन्द्रमा है और मोक्षरूपी नगरका द्वार है । समस्त भूतोंके अधिपते ! आपके निरन्तर चिन्तनरूपी उदार चिन्तामणिसे शोभित मैने समस्त वर्तमान और भविष्यत्कालीन आपत्तियोंको पैरसे ठुकरा दिया है ।' श्रीराम ! सुप्रसन्न उन भगवान् शंकरजीसे यों कहकर फिर नतमस्तक हो मैने जो कुछ कहा, उसे तुम सुनो ! 'भगवन् ! यद्यपि आपकी अनुकम्पासे मेरे लिये समस्त दिशाएँ अभीष्ट पदार्थोंसे परिपूर्ण हैं, तथापि देवेश ! मुझे जो एक सन्देह है, उसके विषयमें आपसे निर्णय पूछता हूँ । प्रभो ! वह देवार्चन-विधान किस तरहका है, जो उद्वेगका नाशक, विकाररहित, समस्त पापोंका विनाशकारी तथा समस्त कल्याणोंका अभिवर्धक है ? उसे प्रसन्नमतिसे आप मुझसे कहिये ।'

श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मज्ञानियोंमें अग्रगण्य मुनिवर ! मै तुमसे सर्वश्रेष्ठ वह देवार्चनका विधान कहता हूँ, जिसका अनुष्ठान करनेसे तत्काल ही मनुष्य मुक्त हो जाता है । जो आदि और अन्तसे रहित, वास्तविक ज्ञानस्वरूप है, वही 'देव' कहा जाता है । सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला सत्-स्वरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही 'देव' शब्दका वाच्य है, इसलिये उसीकी पूजा करनी चाहिये । कौन पूज्य है, इस विषयका तात्त्विक ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि एकमात्र निर्गुण निराकार विज्ञानानन्दघन विशुद्ध परमात्मा शिव ही पूज्य है और उसकी पूजन-सामग्रीमें ज्ञान, समता और शान्ति—ये सबसे श्रेष्ठ पुष्प हैं । महर्षे ! ज्ञानस्वरूप परमात्मदेवकी ज्ञान, समता और शान्तिरूप पुष्पोंसे जो पूजा की जाती है, उसीको आप वास्तविक देवार्चन जानिये । परमात्मा ही विज्ञानस्वरूप देव, भगवान् शिव और परम कारणस्वरूप है । अतः ज्ञानरूप पूजन-सामग्रीसे उसीकी सदा-सर्वदा पूजा करनी चाहिये । वसिष्ठजी ! आप जीवात्माको चिन्मय आकाशस्वरूप अविनाशी अकृत्रिम सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप ही जानिये । एकमात्र वह परमात्मा ही पूज्य है, उसके सिवा दूसरा कोई पूज्य नहीं है । अतः उस विज्ञानानन्दघन परमात्माकी पूजा ही पूजा है । महर्षे ! जो परमार्थतः सबसे श्रेष्ठ है, जो आपका—'तत्' पदार्थका, मेरा तथा समस्त जगत्‌का स्वरूपभूत है, एव जो स्वय परिपूर्णस्वरूप है, ज्ञानरूप सामग्रीसे पूजा करने योग्य उस देवका मैने आपसे वर्णन कर दिया । सभी वस्तुओंका, समस्त जगत्‌का. दूसरेका, आपका और मेरा सर्वव्यापी चिन्मय परमात्मा ही पारमार्थिक स्वरूप है, दूसरा नहीं ।

(सर्ग २९)

३९८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चेतन परमात्माकी सर्वात्मता

श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मन् ! इस रीतिसे यह समस्त संसार एकमात्र परमात्मस्वरूप ही है। ब्रह्म ही परम आकाश है और यही सबसे बड़ा देव कहा गया है। इस परमदेवका पूजन सबमे कल्याणकर है। उसीसे सब कुछ प्राप्त होना है। वही समस्त जगत्-सृष्टिके आरोपका अधिष्ठान है और उसीमें यह सब व्यवस्थित है। स्वाभाविक आदि-अन्तसे रहित, अद्वितीय, अखण्ड नित्य परमानन्द उसी एकमात्र देवके अर्चनसे प्राप्त होता है। वह सच्चिदानन्द कल्याणस्वरूप शिव समस्त गुणोंसे अतीत और सम्पूर्ण सङ्कल्पोंसे रहित है। मुने ! देश और काल आदि परिच्छेदोंसे रहित, समस्त संसारका प्रकाश करनेवाला विशुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मा ही देव कहा जाता है। वही परब्रह्म परमात्मा 'ॐ', 'तत्', 'सत्' —इन नामोंसे कहा गया है। वह स्वभावतः महान्, ध्रुव, सत्यस्वरूप है, सर्वत्र समभावसे व्यापक है; वही महान् चेतन और परमार्थस्वरूप कहा जाता है। पापशून्य मुने ! अरुन्धतीका और आपका जो चैतन्य तत्त्व है, पार्वतीजी-का, मेरा और गणोंका जो चैतन्य तत्त्व है तथा जो चैतन्य तत्त्व तीनो जगत्में परिपूर्ण है, उत्तममति तत्त्वज्ञ लोग उसे ही परमदेव परमात्मा समझते हैं। एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही इस दृश्य संसारका सार है; इसलिये सकल-सारभूत वस्तुओंकी भी साररूपताको प्राप्त हुआ वह सर्वरूप परम देव परमात्मा मे हूँ। ब्रह्मन् ! वह परमात्मा सर्वव्यापी होनेसे किसीके लिये भी दूर नहीं है; अत वह किसीके लिये दुष्प्राप्य भी नहीं है। वह शरीरके बाहर-भीतर—सर्वत्र स्थित है। वही यह परमात्मा चिन्मय, सूक्ष्म, सर्वव्यापी और मायारहित है। देव, दानव और गन्धर्वों तथा पर्वत, समुद्र आदिसे युक्त यह सम्पूर्ण जगत् उस चैतन्यमें स्थित होकर कर्मानुसार उसी प्रकार घूमता रहता है, जिस प्रकार जल-भँवरमें जल।

ब्रह्मन् ! चिन्मय परमात्माने ही गदा, चक्र आदि आयुधोंसे युक्त चतुर्भुज विष्णुरूपसे समस्त असुर-समूहका उसी प्रकार विनाश कर दिया था, जिस प्रकार वर्षाऋतु इन्द्रधनुषसे युक्त मेघरूपसे आतपका विनाश कर देती है। चेतन परमात्माने ही वृषभ और चन्द्रमाके चिह्नोंसे युक्त त्रिनेत्र रूप धारण कर गौरीको प्राप्त किया है। चेतन परमात्मा ही भगवान् विष्णुके नाभि-कमलमें भ्रमरके समान ध्यानमे तल्लीन एवं वेदत्रयीरूपी कमलिनीका महान् सरोवरस्वरूप ब्रह्माजीका रूप धारण करता है। इसी महाचैतन्य परमात्माके सकाससे सूर्य-चन्द्रमा आदि सदा प्रकाशित होते है। निर्मल चेतनरूपी चन्द्रबिम्बमें खरगोश-की तरह सम्बन्ध प्राप्तकर यह जगत्में स्थित पदार्थोंकी शोभा सर्वत्र दिखायी पड़ती है। भद्र ! सुनो, यद्यपि इस देह-रूपी वृक्षमें हाथ, पैर आदि अपने अङ्ग ही शाखाएँ हैं और केशोंका समूह ही सुन्दर लताओंका समूह है, तथापि यह वृक्ष क्या पर्याप्तरूपसे चेतनके सम्बन्धके बिना किसी तरह शोभित हो सकता है ? चराचर पदार्थोंका निर्माण करनेवाला भी यह चेतन ही है, दूसरा नहीं। इसलिये एकमात्र चेतन ही अपने सङ्कल्पसे जगतरूपमे प्रकट है। ब्रह्मन् ! वस्तुतः इस जगत्में दो प्रकारका सर्वभूत-स्वरूप चेतन है—एक तो चञ्चलस्वभाव 'जीवात्मा और दूसरा निर्विकल्प परम चेतन परमात्मा। वह चेतन परमात्मा ही अपने सङ्कल्पसे जीवात्माके रूपमें अपनेसे भिन्न-सा होकर स्थित है। वह चेतन परमात्मा ही अपने संकल्पसे आकाश आदि पाँच भूतो, शब्दादि पाच विषयो, प्राणा-पानादि पाँच प्राणों और देश-कालके रूपमें परिणत होता है। सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही नारायण होकर समुद्रमे शयन करता हे, ब्रह्मा होकर ब्रह्मलोकमें ध्यानस्थित रहता है, हिमालय पर्वतपर पार्वतीके सहित महादेवजीका रूप धारण कर निवास करता है और वैकुण्ठमे देवेश्रेष्ठ विष्णुका रूप धारणकर रहता है। वह परमात्मा ही सूर्य बनकर

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शुद्ध चेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन * ३९९

दिवसका निर्माण करता है, मेघ बनकर जल बरसाता है, वायु बनकर बहता है। सबका आत्मा, सर्वत्र व्यापक एवं अपनी समस्त संकल्पशक्तिके प्रभावसे सर्वस्वरूप होनेके कारण वह चिन्मय ब्रह्म जगत्-रूप हो जाता है। वास्तवमें तो वह विज्ञानानन्द परमात्मा आकाशसे भी बढ़कर निर्मल और सूक्ष्म है। वह परमात्मा जब-जब जहाँपर जिस भावसे जिस तरह संकल्प करता है, तब-तब वहाँ वैसा ही बन जाता है। (सर्ग ३०)

शुद्ध चेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन

श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मन्! चेतन जीवात्मा अज्ञानके कारण 'मैं दुखी हूँ' इस भावनासे व्यर्थ ही दुखी होता है और 'मै नष्ट हो गया; मै मर गया' यों भावना करता हुआ रोता रहता है। किंतु जिस प्रकार पत्थरमें तेल नहीं रहता, उसी प्रकार शुद्ध चेतन आत्मामें दृश्य, दर्शन और द्रष्टाकी त्रिपुटी नहीं रहती। जैसे चन्द्रमामें कालिमा नहीं रहती, वैसे ही शुद्ध आत्मामें कर्त्ता, कर्म और करण नहीं रहते। जिस प्रकार आकाशमें नवीन अङ्कुरका अभाव है, उसी प्रकार आत्मा-में प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण—इन तीनोंका अभाव है। जिस प्रकार नन्दन-वनमें खैरके वृक्षका अभाव है, उसी प्रकार शुद्ध आत्मामें मन, मनन और दृश्य विषयका अभाव है। जैसे आकाशमें पर्वतका अभाव है, वैसे ही शुद्ध चेतनमें मै-पना, तू-पना और वह-पना आदि नहीं है। जैसे काजलमें सफेदी नहीं रहती, वैसे ही चेतनमें अपनी देह तथा परायी देहका भाव नहीं रहता। वह शुद्ध चेतन आत्मा केवल, निर्विकल्प, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण तेजोंको भी प्रकाशित करनेवाला, स्वच्छ और परम श्रेष्ठ है। वह सम्पूर्ण पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाला, सर्वव्यापक, नित्य शुद्ध, नित्य प्रकाशरूप, मनसे रहित, निर्विकार और निरञ्जन है। एक वही घट और पटमें, वट और दीवाल-में, शकट और वानरमें, गदहे और असुरमें, सागर और आकाशादि भूतोंमें तथा नर और नागमें—सर्वत्र व्यापक होकर स्थित है। वह शुद्ध हुआ भी मलिन-सा, निर्विकल्प हुआ भी सविकल्प-सा, चेतन हुआ भी जड-सा और सर्वव्यापी हुआ भी एकदेशीय-सा प्रतीत होता है।

कर्मेन्द्रियोंकी प्रवृत्तिमें तत्परता संकल्पसे होती है। वह संकल्प मननजनित है। वह मनन चित्तकी अशुद्धिके कारण होता है और उन सबका साक्षी आत्मरूप चेतन सर्वविध मलोंसे रहित है। जिस प्रकार स्फटिक-शिलामें अरण्य, पर्वत, नदी आदिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार अपने स्वरूपमें ही स्थित प्रकाशस्वरूप नित्य चेतन-के अन्तःकरणमें इस जगत्का प्रतिबिम्ब पड़ता है। इस जगत्को अपने संकल्पमें धारण करनेवाला अद्वितीय, निर्विकार चेतन न उत्पन्न होता है न विनष्ट होता है, न क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। अर्थात् वह सब प्रकारके विकारोंसे रहित है। असत्स्वरूप यह जगत् अज्ञानके कारण विशाल खमकी तरह आत्मामें ही प्रतीत होता है। किंतु वास्तवमें मृगतृष्णिका-जलके सदृश प्रतीत होनेवाला यह जगत् तनिक भी सत्य नहीं है। मुने! यह परम चेतन आत्मा अपने पुर्यष्टकमें* ही प्रतिबिम्बित होता है, जैसे स्वच्छ दर्पणमें ही प्रतिमा दिखलायी पड़ती है। महर्षे! अनेक प्रकारकी कल्पनाओं-से ग्रस्त यह पुर्यष्टकरूप दृश्यसमूह शुद्ध चिन्मय आत्मा-से ही उत्पन्न होता है, उसीमें स्थित और विलीन हो जाता है। इसलिये यह सम्पूर्ण विश्व विशुद्ध चेतन आत्मस्वरूप ही है, दूसरा नहीं—यह जानिये।


* मनो बुद्धिरहंकारस्तथा तन्मात्रपञ्चकम् ।
इति पुर्यष्टकं प्रोक्तं देहोऽसावातिवाहिकः ॥
(नि० पू० ५१ । ५०)
'मन, बुद्धि, अहंकार एव पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ—इन आठोंका समूह 'पुर्यष्टक' कहा गया है और यही 'आतिवाहिक' देह कहा गया है।'

४०० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जिस प्रकार जड लोहा लोह-चुम्बकके सान्निध्यसे संचरणशील होता है, उसी प्रकार सर्वव्यापी सत्स्वरूप परमात्माके सान्निध्यसे यह जीवात्मा संचरणशील होता है। अर्थात् सर्वत्र स्थित परमात्मशक्तिसे ही यह जीव चेष्टा करता है। यह जीव अज्ञानसे अपने वास्तविक स्वरूपको भूल जानेके कारण देहके सम्बन्धसे जड-सा हो गया है तथा अपना विशुद्ध चैतन्यरूप स्वभाव भूल जानेके कारण ही यह चेतन चित्त-सा बन गया है। ब्रह्मन् ! परमात्माने ही शरीररूपी गाड़ी खींचनेके लिये मनःशक्ति और प्राण-शक्ति—ये दो सुदृढ़ बैल उत्पन्न किये है। सच्चिदानन्दघन निर्विकार परमात्माके सकाशसे ही यह जीव जीवन धारण करता है, जिस प्रकार दीपकके सकाशसे घर शोभा देता है। अज्ञानके कारण इस जीवकी आधियाँ एवं व्याधियाँ उसी प्रकार उत्तरोत्तर स्थूलता प्राप्त करती हैं, जिस प्रकार जलका तरङ्गरूप और उस तरङ्गरूपका फेनरूप उत्तरोत्तर स्थूलता प्राप्त करता है। सर्वशक्तिरूप होनेपर भी वही चेतन जीवात्मा अज्ञानके कारण 'मैं चेतन नहीं हूँ' इस भावनासे इस देहमें परवशता प्राप्त करता है, किंतु अपने स्वरूपके ज्ञानसे मोह-रहित हो जाता है। हृदयरूप कमल-पत्रके चेष्टा-रहित हो जानेपर ये प्राण शान्त हो जाते हैं, जिस प्रकार पंखेके कम्पनशून्य हो जानेपर पवनकी शक्तियाँ विलीन हो जाती है। हृदयरूप कमल-पत्रके स्फुरणसे यह पुर्यष्टक विस्पष्ट हो जाता है और हृदय-कमलरूप यन्त्र जब चलनेसे रुक जाता है यानी निश्चल हो जाता है, तब वह भी विनष्ट हो जाता है। द्विजवर ! जबतक देहमें पुर्यष्टक विद्यमान रहता है, तबतक देह जीवित रहती है और जब देहमेंसे पुर्यष्टक विलीन हो जाता है, तब देह 'मृत' कही जाती है। किंतु जब शरीरका हृदय-कमलरूपी यन्त्र सदा चलता रहता है, तब यह जीव अपने संकल्पवश प्रकृतिके अधीन हुआ कर्म करता रहता है। पर राग-द्वेषरहित विशुद्ध वासना जिनके हृदयमें रहती है, वे अटल एवं एकरूप रहनेवाले मनुष्य जीवन्मुक्त हैं। हृदय-कमलरूपी यन्त्रके रुक जाने तथा प्राणके शान्त हो जानेपर यह देह पृथ्वीपर लकड़ी और ढेले आदिकी भाँति गिर जाती है। मुने ! ज्यो ही हृदयाकाशके वायुमें अर्थात् प्राणमें यह पुर्यष्टक लीन हो जाता है, त्यों ही मन भी प्राणमें ही विलीन हो जाता है। जिस प्रकार घरके लोगोंके घर छोड़कर दूर चले जानेपर घर शून्य हो जाता है, उसी प्रकार मन एवं प्राणसे शून्य हुआ यह शरीर शवरूप हो जाता है। जिस प्रकार नाना प्रकारके पत्ते उत्पन्न हो-होकर समय पाकर वृक्षसे झड़ जाते हैं, उसी प्रकार प्राणियोंके ये शरीर भी झड़ जाते हैं—विनष्ट हो जाते हैं। जीवोंके ये शरीर और वृक्षोंके पत्ते उत्पन्न और नष्ट होते ही रहते हैं, अतः उनके विषयमें शोक ही क्या है। चैतन्य-समुद्र परमात्मामें ये देहरूपी बुद्बुद कहीं एक प्रकारके तो कहीं दूसरे प्रकारके उत्पन्न होते रहते हैं। बुद्धिमान् जन विनाशशील समझकर इनपर विश्वास नहीं करते।

( सर्ग ३१-३२ )


संकल्पत्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परमपद-स्वरूप परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—मस्तकमें अर्धचन्द्र धारण करनेवाले महादेव ! व्यापकरूप अनन्त एवं अद्वितीय चेतन ब्रह्म-तत्त्वमें द्वित्व ( भेद ) कैसे प्राप्त हुआ ? एवं उसका बुद्धिसे निवारण कैसे हो, ताकि जीवके दुःखोंका सर्वथा नाश हो जाय ?

श्रीमहादेवजीने कहा—जब वह ब्रह्म सत्स्वरूप, अद्वितीय और सर्वशक्तिमान् है, तब उसमे यह भेद और अभेदकी कल्पना ही निर्मूल है। जैसे तरङ्ग, कण, कल्लोल और जलप्रवाह जलसे विभक्त नहीं रहते, वैसे ही ब्रह्मकी सर्वशक्ति वास्तवमें ब्रह्मसे विभक्त नहीं रहती।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * संकल्पत्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन * ४०१


जिस प्रकार फूल, कोंपल, पत्ते आदि लतासे वास्तवमें भिन्न नहीं हैं, वैसे ही द्वित्व, एकत्व, जगत्त्व, तू-पन, मैं-पन आदि भी चेतनसे भिन्न नहीं हैं। चेतनका देश, काल, क्रिया आदिरूप जो भेद किया गया है, वह भेद चेतनस्वरूप ही है। 'वास्तवमें चेतनमें द्वैत (भेद) है ही नहीं, तब उसमें भेद आया कहाँसे ?'—यह प्रश्न ही नहीं बनता; क्योंकि देश, काल और क्रियाकी सत्ता एवं नियति आदि शक्तियाँ स्वयं चेतनकी सत्तासे ही सत्तायुक्त होकर स्थित हैं, इसलिये वे सब चेतनस्वरूप परमात्मा ही हैं। वही यह चेतन तत्त्व परम ब्रह्म, सत्य, ईश्वर, शिव तथा निराकार, एक परमात्मा आदि अनेक नामोंसे कहा जाता है। इन नामों एवं रूपोंसे अतीत जो परमात्माका स्वरूप है तथा जो सम्पूर्ण मलोंसे रहित आत्मपदार्थ है, वह वाणी और मनका विषय नहीं है। जो यह संसार दिखायी दे रहा है, वह उस महाचेतन परमात्मारूपी लताके फल, पल्लव तथा पुष्प आदिरूप ही है, अतः उससे भिन्न नहीं। किंतु अज्ञानी जीवको अपने ही द्वैतसंकल्पसे एकमें ही द्वैतकी इसी प्रकार प्रतीति होती है, जैसे पुरुषकी वेताल-कल्पनासे उसे भयंकर वेतालकी प्रतीति होने लगती है। जैसे 'मैं कुछ नहीं करता' इस तरहके संकल्पसे पुरुषका कर्तृत्व निवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार जीवात्मामें प्रतीत होनेवाला द्वैत भी अद्वैत-भावनासे निवृत्त हो जाता है।

द्वैत-संकल्पसे तो एक ही वस्तुमें द्वित्वकी प्राप्ति होती है, पर अद्वैतभावनासे अनेकात्मक जगत्का भी द्वित्व नष्ट हो जाता है। क्योंकि विकार आदिसे शून्य, सदा सर्वगामी तथा परमात्माका स्वरूपभूत होनेसे आत्मामें कभी द्वैतभाव नहीं रहता। मुने ! अपने संकल्पसे निर्मित मनोराज्य और गन्धर्वनगरकी तरह जो वस्तु अपने संकल्पसे बनायी गयी है, वह संकल्पके अभावसे नष्ट हो जाती है। केवल दृढ़ संकल्पसे जो यह संसाररूपी दुःख प्राप्त हुआ है, वह केवल संकल्पके अभावसे ही नष्ट हो जायगा, फिर इस विषयमें क्लेश ही क्या ? क्योंकि तनिक भी संकल्प करके मनुष्य दुःखमें डूब जाता है और कुछ भी संकल्प न करके वह अविनाशी सुख पाता है। अतः मुने ! अपने विवेकरूपी पवनसे संकल्परूप मेघोंका विनाश करके शरत्कालमें आकाश-मण्डलकी भाँति तुम उत्तम निर्मलता प्राप्त करो। अविवेकरूप प्रबल प्रवाहसे उमड़ती हुई उन्मत्त संकल्प-रूप नदीको तुम मणिमन्त्रसे सुखा दो और उसमें बहते हुए अपने-आपको धैर्य देकर मनसे रहित हो जाओ एवं अपने-आप अपने संकल्पात्मक कालुष्यका विनाश करके आत्माकी उत्तम विशुद्धता प्राप्त कर अविनाशी आनन्दरूप हो जाओ। यह आत्मा समस्त शक्तियोंसे परिपूर्ण है, अतः जब कभी वह किसी वस्तुकी जैसी भी भावना करता है, अपने संकल्पसे रचित उस वस्तुको उसी समय वैसी ही देखता है। ब्रह्मन् ! यह उत्पन्न हुआ मिथ्यारूप जगत् एकमात्र संकल्पात्मक ही है; अतः केवल संकल्पके अभावसे ही कहीं भी विलीन हो जाता है। इसलिये संकल्परूप जड़को उखाड़कर अत्यन्त दृढ़ताको प्राप्त हुई इस तृणारूपी करंजलताको आप सुखा डालिये। जिस प्रकार गन्धर्वनगरकी उत्पत्ति और विनाश प्रतीतिमात्र ही हैं, उसी प्रकार यह संसाररूप भ्रमकी उत्पत्ति और विनाश भी प्रतीतिमात्र ही हैं। मुने ! मैं एक हूँ, मैं परमात्मा हूँ—इस प्रकारकी भावना कीजिये। इस भावनासे आप परमात्मा ही हो जायेंगे।

महर्षे ! चेतन जीवात्माने अज्ञानके कारण अपने संकल्पसे संसाररूपता प्राप्त की है; किंतु वास्तवमें मोहरूपी कलङ्कसे रहित वह असंसारी है तथा वह ब्रह्मसे अभिन्न और अद्वैत ब्रह्मरूप है। मैं दृश्य देहादि-स्वरूप हूँ—इस प्रकार मोहको प्राप्त हुआ चेतन जीवात्मा संसारमें फँस जाता है; पर वही शुद्ध चिन्मय

४०२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

परमात्मस्वरूपको, जो अपनेसे अभिन्न है, अनुभव करके संसारके बन्धनसे निर्मुक्त हो जाता है। पुनरावृत्ति-रहित निरतिशयानन्दस्वरूप परमात्माके ज्ञानसे परिपूर्ण चेतन जीवात्मा परमपद प्राप्तकर समस्त भ्रमोंसे निर्मुक्त हुआ व्यापक ब्रह्मपदमे विश्राम करता है। मनसे रहित यही चेतन जीवात्मा शान्तिसे सुशोभित सूर्य, चन्द्र आदि ज्योतियोंसे एवं अन्धकार-अज्ञान आदि जडतासे रहित तथा विस्तृत आकाशकी भाँति परम सुन्दर है। वह दोषरहित जीवात्मा अपने वास्तविक परमात्मस्वरूपमें स्थित हो जब तुर्यातीत अवस्थाको प्राप्त हो जाता है, तब वह परमपदको प्राप्त होता है। वह परमपद सभी उत्तमोत्तम अवस्थाओंकी परम अवधि है, परम मङ्गलस्वरूप होनेके कारण समस्त मङ्गलोंमें प्रधान मङ्गल है। वही एक अखण्ड परम पवित्र चेतनरूप है। मुने ! वह परमपद जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं और कल्पनासे अतीत है। उसीका आपसे मैंने वर्णन किया है। उसी पदमें आप सदा स्थित रहें। वह पद ही अविनाशी पूज्य देव है। मुनीश्वर ! इस समस्त जगत्का उपादान वही परमदेव है—इस ज्ञानसे यह समस्त विश्व चिन्मय ब्रह्मरूप ही है। यह विश्व ब्रह्मके संकल्पसे कल्पित होनेके कारण प्रतीत होता है; किंतु यथार्थ ज्ञान होनेपर वास्तवमें इसकी सत्ता नहीं रहती, इसलिये यह नहीं है। वह परमपद शान्त, शिव एवं वाणीके व्यापारसे अतीत है। 'ॐ' इस अक्षरकी जो आनन्दमयी तुरीयामात्रा है, वही परमगति है।

(सर्ग ३३-३४)

सबके परम कारण परम पूजनीय परमात्माका वर्णन

श्रीमहादेवजीने कहा—मुने ! आप पूर्वोक्त विचारका अवलम्बन करके अपने पारमार्थिक स्वरूपका ही प्रमाणोंसे शीघ्र निर्धारण करें एवं उसके विपरीत अनर्यरूप देहा-भिमानका अवलम्बन न करें। जो इस संसारमें जानने-योग्य है, उस परमात्माको तत्त्वज्ञानीने जान लिया। फिर संसारके भ्रमके साथ उसका कोई प्रयोजन नहीं रहा। अतः उस तत्त्वज्ञानीके लिये कर्तव्य या अकर्तव्य कुछ नहीं रहता, यह मै जानता हूँ। आप इन शान्तिमय और अशान्तिमय विकल्पोंका यदि दलन करते हैं तो आप धीर हैं। यदि वैसा नहीं करते तो आप धीर नहीं हैं। इसलिये आस्था रखकर आप परमार्थदर्शी बन जाइये। ब्रह्मज्ञानके लिये शीघ्र ही उपर्युक्त दृष्टिका आश्रय करके मेरे द्वारा जो कुछ कहा जाय, इसे सुनिये। आत्मज्ञानके प्रयत्नके बिना चुपचाप बैठे रहनेसे क्या लाभ ? त्रिशूलधारी भगवान् शंकर इस प्रकार कहकर फिर बोले कि 'आप बाह्यदेहमें आत्मबुद्धि मत कीजिये; क्योकि यन्त्रकी भाँति प्राणसे ही यह शरीर चेष्टा करता है और प्राणवायुसे रहित शरीर निश्चेष्ट हो मूकके सदृश स्थित रहता है; किंतु चेतन जीवात्मा आकाशसे बढ़कर निर्मल और अव्यक्त है। सद्रूप परमात्माकी सत्ता ही चेतन जीवात्माके अस्तित्वमें कारण है। जीवात्माके बिना तो प्राण और देह—ये दोनों नष्ट हो जाते हैं और देह-वियोगसे प्राण वायुमें विलीन हो जाता है; आकाशसे भी निर्मल चेतन आत्मा नष्ट नहीं होता। इसलिये संसार-भ्रमसे उसका क्या प्रयोजन है ? ब्रह्म-ज्ञानके द्वारा दोषोसे रहित हो जीवात्मा परमशिव परब्रह्म परमात्मा हो जाता है। वह परब्रह्म ही हरि है, वही शिव है, वही हिरण्यगर्भ है, वही चतुर्मुख ब्रह्मा है, वही इन्द्र है; वही वायु, वह्नि, चन्द्र एवं सूर्यरूप है और वही परमेश्वर है। वही सर्वव्यापी परमात्मा, सर्वचेतनोंका मूल स्रोत, देवेश, देवभृत्, धाता, देवदेव और स्वर्गका अधिपति है। जिस तरह पल्लवोंका मूलबीज वृक्ष है, उसी तरह सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिका मूल बीज है। वही सच्चिदानन्दघन परब्रह्म

निर्वाण-प्रकरण, पू० ] * परमशिव परमात्माकी अनन्त शक्तियाँ * ४०३

ज्ञानी महात्माओंका वन्दनीय और पूजनीय है; क्योंकि सबका बल और नाम उसीके हैं। वही सर्वात्मक, प्रकाशरूप, समस्त ज्ञानोंका एकमात्र उत्पादक और सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला है। महर्षे! सबका आदि कारण तथा पूजा, नमस्कार, स्तुति और अर्घ्यके योग्य एवं समस्त देवताओंका स्वामी वही परम चेतन परब्रह्म परमात्मतत्त्व है—यह आप जान लें। वही बड़े-बड़े ज्ञातव्य पदार्थोंकी भी चरम सीमा है। जरा, शोक एवं भयके विनाशक इस परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करके मनुष्य फिर संसारमें भूने हुए बीजकी भाँति जन्म नहीं लेता। विप्रेन्द्र ! तत्त्वसे जान लिये जानेपर जो समस्त प्राणियोंको अभय कर देता है, जो सबका आदिकारण है और जो अनायास उपासनाके योग्य है, आप वही अज, परम एवं परमात्मरूप परमपद हैं।

मुने ! समस्त पदार्थोंके भीतर रहनेवाले अनुभवरूप एकमात्र विशुद्ध प्रकाशमय परमचेतन परमात्माको मुनिलोग महादेवरूप परमेश्वर समझते हैं। वह परमचेतन तत्त्व सम्पूर्ण कारणोंका कारण है, किंतु वास्तवमें उसका कोई कारण नहीं है; वह अपनी सत्तासे समस्त भावोंको सत्ता प्रदान करनेवाला है, किंतु स्वयं भावनाका विषय नहीं है। वह विशुद्ध और अजन्मा है। वही समस्त चेतनोंका चेतन, दृश्य विषयोंका प्रकाशक और दृश्य-संसारका परम आधार है। उसीको मुनिलोग चक्षु आदि एवं सूर्य आदि प्रकाशकोंको प्रकाशक, स्वयं चक्षु-सूर्य आदि प्रकाशकोंद्वारा प्रकाशित न होनेवाला, अलौकिक, समस्त बीजोंका भी बीज, ज्ञानस्वरूप और विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मा कहते हैं। सत्य प्रतीत होनेवाला दृश्य संसार और असत्य न प्रतीत होनेवाली प्रकृति—इन दोनोंका कारण होनेसे वह चिन्मय परमात्मा तत्स्वरूप है; किंतु वास्तवमें वह प्रकृति और संसारसे रहित, परमशान्त है। इस महान् चिन्मय परमात्मामें पहले करोड़ों जगद्रूपी मरु-मरीचिकाएँ हो चुकी हैं, आगे भी होती रहेंगी और वर्तमान कालमें भी हो रही हैं। महान् मेरु पर्वत एवं महान् कल्प आदि काल उस चेतन तत्त्व परमात्मामें समाये हुए हैं। फिर भी वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतम है। कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण यह परमात्मा कुछ न करते हुए ही संसारकी रचना करता है और यह संसारका उद्धाररूप महान् कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता। जिस परमात्माके संकल्पमें यह समस्त संसार विद्यमान है, जिससे यह सारा संसार उत्पन्न हुआ है, जो सर्वस्वरूप है, जो सब ओर व्याप्त है एवं जो सर्वमय है, उस सर्वात्मक परमात्माको बार-बार नमस्कार है।*

(सर्ग ३५-३६)

परमशिव परमात्माकी अनन्त शक्तियाँ

श्रीमहादेवजीने कहा—महर्षे ! उस समस्त जगत्सत्ता-स्वरूप मणिकी पिटारी परम चेतन सर्वेश्वर परमात्मामें उनकी शक्तियाँ प्रत्यक्ष आविर्भूत होती रहती हैं। उनमेंसे परमात्माकी एक शक्ति महाकाशरूप दर्पणके अंदर अपनी सत्ताके प्रतिबिम्बके सदृश कल्प-निमेषनामक निर्मल कालात्मक शरीर धारण करती है। जैसे घरमें दीपकके रहनेपर घरभरकी क्रियाएँ प्रकाशित हो जाती हैं, वैसे ही साक्षीरूपी उस प्रकाशात्मक, सत्यस्वरूप चेतन-तत्त्वके रहनेपर ही जगद्रूप चित्तकी परम्पराएँ प्रकाशित होती हैं।

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—जगत्के स्वामिन् ! इन सदाशिवकी कौन-सी शक्तियाँ हैं, वे किस तरहसे रहती हैं,


* यस्मिन् सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वतश्च यः। यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ (नि० पू० ३६। १८)

४०४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

उनकी साक्षिताका क्या स्वरूप है, उनका व्यवहार क्या है और वे कितनी हैं ?

श्रीमहादेवजीने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सौम्य ! उस निराकार, सर्वात्मक, अप्रमेय, परमशान्त, सच्चिदानन्दघन सदाशिव परमात्माकी इच्छासत्ता, व्योमसत्ता, कालसत्ता तथा नियति-सत्ता और महासत्ता—ये पाँच सत्तात्मक शक्तियाँ हैं। (तात्पर्य यह है कि 'सोऽकामयत बहु स्याम्' इस श्रुतिके अनुसार सबसे पहले उनकी इच्छासत्ता अभिव्यक्त हुई। तदनन्तर आकाशकी अभिव्यक्ति होनेपर आकाशसत्ता, तदनन्तर कालात्मक सूत्रकी अभिव्यक्ति होनेपर कालसत्ता, सद्रूपके नियत संस्थानवाले भूत एवं भौतिक पदार्थोंका आविर्भाव होनेपर नियति-सत्ता अभिव्यक्त हुई और तदनन्तर उनमें अनुस्यूत महासत्ता अभिव्यक्त हुई ।) इनके सिवा ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति कर्तृत्वशक्ति और अकर्तृत्वशक्ति आदि परमात्माकी अनेक शक्तियाँ हैं। उन सदाशिवस्वरूप परमात्माकी इन शक्तियोंका कोई अन्त नहीं है।

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—देव ! ये उपर्युक्त शक्तियाँ हुईं किस निमित्तसे ? इनमें बहुत्व कैसे आया ? इनका उदय कैसे हुआ ? एवं शक्ति और शक्तिमान् दोनोंमें परस्पर-विरुद्ध भेद और अभेद किस युक्तिसे रह सकते हैं ?

श्रीमहादेवजीने कहा—महर्षे ! अनन्त असीम आकारवाले सदाशिवरूप परमात्माकी यह चिन्मात्ररूपता ही उसकी शक्ति कही जाती है। एकमात्र कल्पनासे ही वह चेतन परमात्मासे भिन्न-सी प्रतीत होती है, वास्तवमें कुछ भी भेद नहीं है। ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, साक्षित्व आदि कल्पनाओंसे परमात्माकी ये शक्तियाँ उसी प्रकार विविध स्वरूप धारण करती हैं, जैसे समुद्रमें तरङ्ग आदि भेद-कल्पनाओंसे जल विविध रूप धारण करता है। गमनशील ब्रह्माण्डरूपी नृत्य-मण्डपमें ऋतु, मास आदि काल नियति-क्रमद्वारा महाकालरूपी नटसे उत्तम रीतिसे शिक्षित हुई उस प्रकारकी शक्तिरूपिणी नटियाँ नाचती हैं। यही परा और अपरा एवं नियति कही जाती है। ईश्वरकी क्रिया, कृति, इच्छा या काल इत्यादि उसीके नाम हैं। तृणसे लेकर ब्रह्मापर्यन्त जितने चराचर जीव हैं, उनको मर्यादामें रखनेवाली नियति कही जाती है। महर्षे ! नाट्यशास्त्रमें प्रसिद्ध स्वेद, स्तम्भ, रोमाञ्च आदि विकारोंसे व्याप्त, चिरकालसे प्रवृत्त हुए इस संसारनामक नाटकके नाट्योंमें सारभूत नियति नटीके विलासमें अधिपति होकर देखनेवाला सदा उदितस्वभाव यह परमेश्वर अद्वितीय होकर ही स्थित है। वह परमार्थतः उस नटी और नाट्यसे भिन्न नहीं है। ( सर्ग ३७ )


सच्चिदानन्दघन परमदेव परमात्माके ध्यानरूप पूजनसे परमपदकी प्राप्ति

श्रीमहादेवजी कहते हैं—महर्षे ! उस परमात्मदेवके पूजनके जितने क्रम हैं, उन सबमें पहले देहाभिमानको प्रयत्नपूर्वक छोड़ देना चाहिये। ध्यान ही इस परमात्मदेवकी पूजा है। इसलिये तीनों भुवनोंके आधारभूत इस परमात्मदेवकी निम्न प्रकारके ध्यानसे सदा पूजा करनी चाहिये। वह चेतन परमात्मा ज्ञानके द्वारा लाखों सूर्योंके समान देदीप्यमान, सूर्य आदि समस्त प्रकाशकोंका भी प्रकाशक तथा सबसे परे रहनेवाला ज्ञानस्वरूप है। उसका मनसे चिन्तन करना चाहिये।

इस नियति-नाटकके साक्षी परमात्माका इतना बड़ा स्वरूप है कि सबसे बड़े असीम आकाशका जो विपुल विस्तार है, वह उसकी गर्दन है; नीचेके आकाशका जो असीम विस्तार है, वह उसका चरण-सरोज है। सीमा-शून्य दिशाओंके किनारोंका यह जो विस्तार है, वही उसका भुजमण्डल है और उसीसे वह सुशोभित है; उन हाथोंमें उसने विविध ब्रह्माण्डोंमें विद्यमान बड़े-बड़े सत्य आदि लोकरूप श्रेष्ठ आयुधोंको ग्रहण कर रखा है। उसके हृदय-कोशके एक कोनेमें अनेक ब्रह्माण्ड-समूह

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सच्चिदानन्दघन परमदेव परमात्माके ध्यानरूप पूजनसे परमपदकी प्राप्ति * ४०५


छिपे हुए हैं। वह प्रकाशस्वरूप एवं तमसे परे है और उसके स्वरूपका कहीं पार भी नहीं पाया जा सकता। पूर्वोक्त नियतिके नाटकका साक्षी यह परमात्मा ही परमदेव है। यही समस्त पदार्थोंका आश्रय, सर्वव्यापक, चिन्मय और अनुभवरूप है। सभी सज्जनोंद्वारा यही सर्वदा पूजनीय है। यही परमदेव परमात्मा घटमें, पटमें, वटमें, दीवालमें, छकड़ेमें और वानर आदि प्राणियोंमें समभावसे स्थित है। यही परमात्मा शिव, हर, हरि, ब्रह्मा, इन्द्र, कुबेर और यमस्वरूप है। अनेक प्रकारकी घट-पट आदि आकृतियोंको लेकर असंख्य पदोंसे बोधित होनेवाली तथा उन आकृतियोंको छोड़नेपर एक पदसे बोधित होनेवाली सत्तारूप इस जगज्जालका उत्पादक महाकाल इस परमात्मदेवका द्वारपाल है। पर्वतों एवं चौदह भुवनोंके असीम विस्तारसे युक्त यह ब्रह्माण्ड-मण्डल इस परमात्मदेवके किसी एक देह-कोणमें स्थित होकर उसके अङ्गका अवयवरूप हो गया है।

महर्षे ! जिसके हजारों कान एवं आँखें हैं, हजारों मस्तक हैं और जो स्वयं हजारों भुजाओंसे विभूषित है, ऐसे शान्तस्वभाव महादेवका चिन्तन करना चाहिये। वह परमात्मा सभी जगह दर्शन-शक्तिसे परिपूर्ण है यानी सर्वत्र देखता है, सब ओर घ्राण-शक्तिसे समन्वित है, सर्वतः स्पर्शन-शक्तिसे युक्त है, सभी ओर रसन-शक्तिसे परिपूर्ण है, सर्वत्र श्रवण-शक्तिसे व्याप्त है, सर्वत्र मनन-शक्तिवाला है; तथापि वह सर्वथा संकल्पसे रहित है एवं सभी ओर सर्वश्रेष्ठ कल्याणस्वरूप है। उस परमात्मदेवका चिन्तन करना चाहिये। नित्य, सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, सबको अपने-अपने संकल्पके अनुसार समस्त पदार्थ प्रदान करनेवाले, सारे प्राणियोंके अन्तःकरण-में स्थित और सभीके लिये एकमात्र साध्य, सर्वरूप उस परमात्मदेवका चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार ध्यानके द्वारा उस देवाधिदेवकी पूजा करनी चाहिये। अनायास प्राप्त होने योग्य, शान्तिमय, अविनाशी, अमृतस्वरूप एकमात्र परमात्मस्वरूपके ज्ञानसे सदा इस देवकी पूजा की जा सकती है। जो यह हृदयप्रदेशमें स्थित शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माका निरन्तर अनुभव है, यही श्रेष्ठ ध्यान है और यही परम पूजा कही गयी है। देखते-सुनते, स्पर्श करते सूँघते-खाते, चलते-सोते, श्वास-प्रश्वास लेते, बोलते, त्याग करते और ग्रहण करते—सभी समय मनुष्यको शुद्ध चिन्मय परमात्माके ध्यानमें ही तत्पर रहना चाहिये। इस परमात्माके लिये शुद्ध ज्ञानरूप ध्यान ही प्रियतम वस्तु है, अतः ध्यानसे ही उसके लिये उपहार है। ध्यान ही उसके लिये अर्घ्य, पाद्य और पुष्प है। मुने ! यह परमात्मदेव ध्यानसे ही प्रसन्न होता है। इस प्रकार आठों पहर ध्यानद्वारा पूजन करनेसे मनुष्य परमधाममें निवास करता है। महर्षे ! जो यह परमात्मदेवका उत्तम पूजन मैंने आपसे कहा है, यही परम योग है, यही वह उत्तम कर्म है। आत्मरूप वसिष्ठजी ! जो मनुष्य दुःख और विक्षेपसे रहित हो सारे पापोंके विनाशक एवं परम पवित्र इस ध्यानरूप पूजनको करेगा, उस समस्त बन्धनोंसे मुक्त और ब्रह्मतत्त्वको प्राप्त पुरुषकी जगत्में सुर एवं असुर वैसे ही वन्दना करेंगे, जैसे वे मेरी वन्दना करते हैं।

महर्षे ! यह ध्यान पवित्र करनेवालोंको भी पवित्र करनेवाला तथा सम्पूर्ण अज्ञानोंका नाशक है। अतः शरीरमें स्थित, समस्त ज्ञानोंके उत्पादक एवं बोधक परम कल्याणस्वरूप इस परमात्मदेवका अपने अन्तः-करणसे नित्य ही ध्यान करना चाहिये। सबके हृदयरूपी गुहामें स्थित, समस्त ज्ञान और ज्ञेयके ज्ञाता, सम्पूर्ण कर्मोंके कर्ता और समस्त ज्ञानोंके स्मर्ता, सम्पूर्ण प्रकाशों-से भी अधिक प्रकाशस्वरूप तथा सर्वव्यापी परम शिव परमात्माका ध्यान करना चाहिये। वह परमात्मा मनकी मननात्मिका शक्तिमें, प्राण एवं अपानके मध्यमें तथा हृदय, कण्ठ, तालु और भौंके मध्यमें स्थित (व्यापक) है। वह कथाओंकी कल्पनाओंसे रहित और देहके एक-