भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू०] * पूरक, रेचक, कुम्भक प्राणायामका तत्त्व जानकर अभ्यास करनेसे मुक्ति * ३८९


खाता है, उनमें वह कर्तृत्व आदिके अभिमानसे तनिक भी ग्रस्त नहीं होता।

महर्षे ! इस प्रकार प्राणायामका अभ्यास करनेवाले पुरुषका मन विषयाकार वृत्तियोंके होनेपर भी बाह्य विषयोंमें रमण नहीं करता। जो शुद्ध और तीक्ष्ण बुद्धि-वाले महात्मा इस प्राणविषयक दृष्टिका अवलम्बन करके स्थित हैं, उन्होंने प्रापणीय पूर्ण ब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लिया और वे ही समस्त खेदोंसे रहित हैं। बैठते, चलते, सोते और जागते—सदा-सर्वदा पुरुष यदि तत्त्व-रहस्य समझकर प्राणायामका अभ्यास करें तो वे कभी बन्धनको प्राप्त ही न हों। प्राण और अपानकी उपासना-द्वारा प्राप्त यथार्थ ज्ञानसे युक्त पुरुषोंका मन, जो मलरूप मोहसे रहित एवं स्वस्थ है, इस अन्तःस्थित परमात्मामें ही सदा-सर्वदा लगा रहता है। शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको सदा करता हुआ भी शुद्धान्तःकरण निष्कामी ज्ञानी पुरुष प्राणापानकी गतिको तत्त्वतः जानकर भली-भाँति स्वस्थ हो सच्चिदानन्दघन परमात्माको प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मन् ! हृदय-कमलसे प्राणका अभ्युदय होता है और बाहर बारह अंगुलपर्यन्त प्रदेशमें यह प्राण विलीन होकर रहता है। इसीको 'बाह्य कुम्भक' कहते हैं। महामुने ! बाह्य बारह अंगुलकी चरम सीमासे अपानका उदय होता है और हृदय-प्रदेशमें स्थित कमलमें उसकी गति अस्त हो जाती है; इसीको 'आभ्यन्तर कुम्भक' कहते हैं। जिस बारह अंगुलकी चरम सीमाके आकाश प्रदेशमें प्राणकी समाप्ति हो जाती है, उसी आकाश-प्रदेशसे यह अपान उसीके बाद उत्पन्न हो जाता है। यह प्राण-वायु अग्नि-शिखाकी भाँति बाह्य आकाशके सम्मुख होकर बहता है और अपान-वायु जलकी तरह हृदयाकाशके सम्मुख होकर निम्नभागमें बहता है। चन्द्रमारूप अपान-वायु शरीरको बाहरसे पुष्ट करता है और सूर्यरूप प्राण-वायु इस शरीरको भीतरसे परिपक्व कर देता है। प्राण वायु निरन्तर हृदया-काशको सन्तप्तकर पश्चात् मुखाग्रभागके आकाशको तपाता है; क्योंकि यह उत्तम सूर्य ही है। अपान-वायुरूप यह चन्द्रमा पहले मुखके अग्रभागको पुष्टकर तदनन्तर हृदया-काशका अपने अमृत-प्रवाहसे पोषण करता है। अपानरूप चन्द्रमाकी किरणका प्राणरूपी सूर्यके साथ आभ्यन्तर कुम्भकके समय जिस हृदयस्थ ब्रह्मसे सम्बन्ध होता है, उस ब्रह्मपदको प्राप्तकर पुरुष पुनः शोकको प्राप्त नहीं होता। इसी प्रकार प्राणरूपी सूर्यकी किरणका अपान-रूपी चन्द्रमाके साथ बाह्य-कुम्भकके समय जिस बाह्य-प्रदेशस्थित ब्रह्मसे सम्बन्ध होता है, उस ब्रह्मपदको प्राप्तकर मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त नहीं करता।

मुने ! जो पुरुष हृदयाकाशमें स्थित प्राणरूप सूर्य-देवको उदय-अस्त, चन्द्रमा-रश्मि और गमनागमनसहित तत्त्वसे अनुभव करता है, वही यथार्थ अनुभव करता है। जैसे बाह्य अन्धकारके नष्ट हो जानेपर बाहरके पदार्थ प्रत्यक्ष हो जाते हैं, उसी प्रकार हृदयस्थित अज्ञानके नष्ट हो जानेपर शुद्धस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है। प्राण-वायुके विलीन हो जानेपर और अपान-वायुके उदयके पूर्व बाह्य कुम्भकका चिरकालतक अभ्यास करनेसे योगी शोकसे रहित हो जाता है। अपान-वायुके विलीन होनेपर और प्राण-वायुके उदयसे पूर्व भीतरी कुम्भकका चिरकालतक अभ्यास करनेसे योगी शोकसे रहित हो जाता है। जिस हृदयवर्ती ब्रह्मरूप स्थानमें ये प्राण और अपान दोनों विलीन हो जाते हैं, उस शान्त, आत्मस्वरूप ब्रह्मरूप पदका अवलम्बन करनेसे योगी अनुतप्त नहीं होता। महर्षे ! जिस चिन्मय परब्रह्म परमात्मामें अपानके साथ प्राणका, प्राणके साथ अपानका तथा उन दोनोंके साथ बाह्य एवं आभ्यन्तर देश-कालका विलय हो जाता है, उसी परब्रह्मरूप पदका आप दर्शन कीजिये।

जिस समय अपानके प्राकट्यसे पूर्व प्राण विलीन हुआ रहता है, उस समय किसी प्रकारके यत्नके बिना स्वाभाविक सिद्ध हुई जो बाह्य-कुम्भक अवस्था है, उसीको योगीलोग 'परम पद' कहते हैं। किसी प्रकारके यत्नके बिना ही