भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३९० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सिद्ध हुआ अन्तःस्थ कुम्भक सर्वातिशायी ब्रह्मरूप परमपद है। यह परमात्माका वास्तविक स्वरूप है और यही सदा प्रकाशमय परम विशुद्ध चेतन है। इसको प्राप्त कर मनुष्य शोकसे रहित हो जाता है। जो प्राण-विलयका और जो अपान-विनाशका समीप एवं अन्तमें रहकर प्रकाशक है तथा जो प्राण और अपानके अंदर रहता है, हमलोग उस चेतन परमात्माकी उपासना करते हैं। जिसकी सत्ता-स्फूर्तिसे मन मनन करता है, बुद्धि निश्चय करती है एवं अहंकार अहंताको प्राप्त है, उस सच्चिदानन्दघन परमात्माकी हमलोग उपासना करते हैं। जिस परमात्मामें समस्त पदार्थ विद्यमान हैं, जिससे समस्त जगत् उत्पन्न हुआ है, जो सर्वात्मक है, जो सब ओर स्थित है और जो सर्वमय है, हमलोग उस चिन्मय परमात्माकी निरन्तर उपासना करते हैं। जो सम्पूर्ण ज्योतियोंका प्रकाशक है, जो समस्त पवित्रोंका भी परम पवित्र है, जो सम्पूर्ण संकल्प-विकल्प आदि भावनाओंसे रहित है, उस चेतन परब्रह्म परमात्माकी हम उपासना करते हैं। जहाँपर प्राण विलीन हो जाता है; जहाँ अपान भी अस्त हो जाता है तथा जहाँ प्राण और अपान दोनों उत्पन्न भी नहीं होते, हमलोग उस चेतन तत्त्वरूप परमात्माकी उपासना करते हैं। बाह्य और आभ्यन्तर प्रदेशमें स्थित, योगियोंद्वारा अनुभूत होनेवाले जो दो प्राण और अपानकी उत्पत्तिके स्थान हैं, उन दोनोंके अधिष्ठानभूत चेतन तत्त्वकी हम उपासना करते हैं। जो प्राण और अपानके विवेकमें हेतु है, जो उनके अस्तित्वका ज्ञान करानेवाला है, जो स्वयं रूपरहित है एवं जो प्राणोपासनासे प्राप्तव्य है, उस चिन्मय विज्ञानानन्दघन परमात्माकी हम उपासना करते हैं। (सर्ग २५)

भुशुण्डकी वास्तविक स्थितिका निरूपण, वसिष्ठजीद्वारा भुशुण्डकी प्रशंसा, भुशुण्डद्वारा वसिष्ठजीका पूजन तथा आकाशमार्गसे वसिष्ठजीकी स्वलोकप्राप्ति

भुशुण्डने कहा—महामुने ! मैंने प्राणसमाधिके द्वारा पूर्वोक्त रीतिसे विशुद्ध परमात्मामें यह चित्त-विश्रामरूप परम शान्ति क्रमशः स्वयं प्राप्त की है। मैं इस प्राणायामका अवलम्बन करके दृढ़तापूर्वक स्थित हूँ। इसलिये सुमेरुपर्वतके विचलित होनेपर भी मैं चलायमान नहीं होता। चलते-बैठते, जागते या सोते अथवा स्वप्नमें भी मैं अखण्ड ब्रह्माकारवृत्तिरूप समाधिसे विचलित नहीं होता; क्योंकि तपस्वियोंमें महान् वसिष्ठजी ! प्राण और अपानके संयमरूप प्राणायामके अभ्याससे प्राप्त परमात्माके साक्षात् अनुभवसे मैं समस्त शोकोंसे रहित आदिकारण परमपदको प्राप्त हो गया हूँ। ब्रह्मन् ! महाप्रलयसे लेकर प्राणियोंकी उत्पत्ति एवं विनाशको देखता हुआ मैं ज्ञानवान् हुआ आज भी जी रहा हूँ। जो बात बीत चुकी और जो होनेवाली है, उसका मैं कभी चिन्तन नहीं करता। उपर्युक्त प्राणायामविषयक दृष्टिका अपने मनसे अवलम्बन करके इस कल्पवृक्षपर स्थित हूँ । न्याययुक्त जो भी कर्तव्य प्राप्त हो जाते हैं, उनका फलाभिलाषाओंसे रहित होकर केवल सुषुप्तिके समान उपरत बुद्धिसे अनुष्ठान करता रहता हूँ। प्राण और अपानके संयोगरूप कुम्भक-कालमें प्रकाशित होनेवाले परमात्मतत्त्वका निरन्तर स्मरण करता हुआ मैं अपने आपमें स्वयं ही नित्य संतुष्ट रहता हूँ। इसलिये मैं दोषरहित होकर चिरकालसे जी रहा हूँ। मैंने आज यह प्राप्त किया और भविष्यमें दूसरा सुन्दर पदार्थ प्राप्त करूँगा, इस प्रकारकी चिन्ता मुझे कभी नहीं होती । मैं अपने या दूसरे किसीके कार्योंकी किसी समय कहींपर कभी स्तुति और निन्दा नहीं करता। शुभकी प्राप्ति होनेपर मेरा मन हर्षित नहीं होता और अशुभकी प्राप्ति होनेपर कभी खिन्न नहीं होता; क्योंकि मेरा मन नित्य सम ही रहता है।