संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण, पू० ] * परमशिव परमात्माकी अनन्त शक्तियाँ * ४०३
ज्ञानी महात्माओंका वन्दनीय और पूजनीय है; क्योंकि सबका बल और नाम उसीके हैं। वही सर्वात्मक, प्रकाशरूप, समस्त ज्ञानोंका एकमात्र उत्पादक और सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला है। महर्षे! सबका आदि कारण तथा पूजा, नमस्कार, स्तुति और अर्घ्यके योग्य एवं समस्त देवताओंका स्वामी वही परम चेतन परब्रह्म परमात्मतत्त्व है—यह आप जान लें। वही बड़े-बड़े ज्ञातव्य पदार्थोंकी भी चरम सीमा है। जरा, शोक एवं भयके विनाशक इस परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करके मनुष्य फिर संसारमें भूने हुए बीजकी भाँति जन्म नहीं लेता। विप्रेन्द्र ! तत्त्वसे जान लिये जानेपर जो समस्त प्राणियोंको अभय कर देता है, जो सबका आदिकारण है और जो अनायास उपासनाके योग्य है, आप वही अज, परम एवं परमात्मरूप परमपद हैं।
मुने ! समस्त पदार्थोंके भीतर रहनेवाले अनुभवरूप एकमात्र विशुद्ध प्रकाशमय परमचेतन परमात्माको मुनिलोग महादेवरूप परमेश्वर समझते हैं। वह परमचेतन तत्त्व सम्पूर्ण कारणोंका कारण है, किंतु वास्तवमें उसका कोई कारण नहीं है; वह अपनी सत्तासे समस्त भावोंको सत्ता प्रदान करनेवाला है, किंतु स्वयं भावनाका विषय नहीं है। वह विशुद्ध और अजन्मा है। वही समस्त चेतनोंका चेतन, दृश्य विषयोंका प्रकाशक और दृश्य-संसारका परम आधार है। उसीको मुनिलोग चक्षु आदि एवं सूर्य आदि प्रकाशकोंको प्रकाशक, स्वयं चक्षु-सूर्य आदि प्रकाशकोंद्वारा प्रकाशित न होनेवाला, अलौकिक, समस्त बीजोंका भी बीज, ज्ञानस्वरूप और विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मा कहते हैं। सत्य प्रतीत होनेवाला दृश्य संसार और असत्य न प्रतीत होनेवाली प्रकृति—इन दोनोंका कारण होनेसे वह चिन्मय परमात्मा तत्स्वरूप है; किंतु वास्तवमें वह प्रकृति और संसारसे रहित, परमशान्त है। इस महान् चिन्मय परमात्मामें पहले करोड़ों जगद्रूपी मरु-मरीचिकाएँ हो चुकी हैं, आगे भी होती रहेंगी और वर्तमान कालमें भी हो रही हैं। महान् मेरु पर्वत एवं महान् कल्प आदि काल उस चेतन तत्त्व परमात्मामें समाये हुए हैं। फिर भी वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतम है। कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण यह परमात्मा कुछ न करते हुए ही संसारकी रचना करता है और यह संसारका उद्धाररूप महान् कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता। जिस परमात्माके संकल्पमें यह समस्त संसार विद्यमान है, जिससे यह सारा संसार उत्पन्न हुआ है, जो सर्वस्वरूप है, जो सब ओर व्याप्त है एवं जो सर्वमय है, उस सर्वात्मक परमात्माको बार-बार नमस्कार है।*
(सर्ग ३५-३६)
परमशिव परमात्माकी अनन्त शक्तियाँ
श्रीमहादेवजीने कहा—महर्षे ! उस समस्त जगत्सत्ता-स्वरूप मणिकी पिटारी परम चेतन सर्वेश्वर परमात्मामें उनकी शक्तियाँ प्रत्यक्ष आविर्भूत होती रहती हैं। उनमेंसे परमात्माकी एक शक्ति महाकाशरूप दर्पणके अंदर अपनी सत्ताके प्रतिबिम्बके सदृश कल्प-निमेषनामक निर्मल कालात्मक शरीर धारण करती है। जैसे घरमें दीपकके रहनेपर घरभरकी क्रियाएँ प्रकाशित हो जाती हैं, वैसे ही साक्षीरूपी उस प्रकाशात्मक, सत्यस्वरूप चेतन-तत्त्वके रहनेपर ही जगद्रूप चित्तकी परम्पराएँ प्रकाशित होती हैं।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—जगत्के स्वामिन् ! इन सदाशिवकी कौन-सी शक्तियाँ हैं, वे किस तरहसे रहती हैं,
* यस्मिन् सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वतश्च यः। यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ (नि० पू० ३६। १८)