भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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४०२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

परमात्मस्वरूपको, जो अपनेसे अभिन्न है, अनुभव करके संसारके बन्धनसे निर्मुक्त हो जाता है। पुनरावृत्ति-रहित निरतिशयानन्दस्वरूप परमात्माके ज्ञानसे परिपूर्ण चेतन जीवात्मा परमपद प्राप्तकर समस्त भ्रमोंसे निर्मुक्त हुआ व्यापक ब्रह्मपदमे विश्राम करता है। मनसे रहित यही चेतन जीवात्मा शान्तिसे सुशोभित सूर्य, चन्द्र आदि ज्योतियोंसे एवं अन्धकार-अज्ञान आदि जडतासे रहित तथा विस्तृत आकाशकी भाँति परम सुन्दर है। वह दोषरहित जीवात्मा अपने वास्तविक परमात्मस्वरूपमें स्थित हो जब तुर्यातीत अवस्थाको प्राप्त हो जाता है, तब वह परमपदको प्राप्त होता है। वह परमपद सभी उत्तमोत्तम अवस्थाओंकी परम अवधि है, परम मङ्गलस्वरूप होनेके कारण समस्त मङ्गलोंमें प्रधान मङ्गल है। वही एक अखण्ड परम पवित्र चेतनरूप है। मुने ! वह परमपद जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं और कल्पनासे अतीत है। उसीका आपसे मैंने वर्णन किया है। उसी पदमें आप सदा स्थित रहें। वह पद ही अविनाशी पूज्य देव है। मुनीश्वर ! इस समस्त जगत्का उपादान वही परमदेव है—इस ज्ञानसे यह समस्त विश्व चिन्मय ब्रह्मरूप ही है। यह विश्व ब्रह्मके संकल्पसे कल्पित होनेके कारण प्रतीत होता है; किंतु यथार्थ ज्ञान होनेपर वास्तवमें इसकी सत्ता नहीं रहती, इसलिये यह नहीं है। वह परमपद शान्त, शिव एवं वाणीके व्यापारसे अतीत है। 'ॐ' इस अक्षरकी जो आनन्दमयी तुरीयामात्रा है, वही परमगति है।

(सर्ग ३३-३४)

सबके परम कारण परम पूजनीय परमात्माका वर्णन

श्रीमहादेवजीने कहा—मुने ! आप पूर्वोक्त विचारका अवलम्बन करके अपने पारमार्थिक स्वरूपका ही प्रमाणोंसे शीघ्र निर्धारण करें एवं उसके विपरीत अनर्यरूप देहा-भिमानका अवलम्बन न करें। जो इस संसारमें जानने-योग्य है, उस परमात्माको तत्त्वज्ञानीने जान लिया। फिर संसारके भ्रमके साथ उसका कोई प्रयोजन नहीं रहा। अतः उस तत्त्वज्ञानीके लिये कर्तव्य या अकर्तव्य कुछ नहीं रहता, यह मै जानता हूँ। आप इन शान्तिमय और अशान्तिमय विकल्पोंका यदि दलन करते हैं तो आप धीर हैं। यदि वैसा नहीं करते तो आप धीर नहीं हैं। इसलिये आस्था रखकर आप परमार्थदर्शी बन जाइये। ब्रह्मज्ञानके लिये शीघ्र ही उपर्युक्त दृष्टिका आश्रय करके मेरे द्वारा जो कुछ कहा जाय, इसे सुनिये। आत्मज्ञानके प्रयत्नके बिना चुपचाप बैठे रहनेसे क्या लाभ ? त्रिशूलधारी भगवान् शंकर इस प्रकार कहकर फिर बोले कि 'आप बाह्यदेहमें आत्मबुद्धि मत कीजिये; क्योकि यन्त्रकी भाँति प्राणसे ही यह शरीर चेष्टा करता है और प्राणवायुसे रहित शरीर निश्चेष्ट हो मूकके सदृश स्थित रहता है; किंतु चेतन जीवात्मा आकाशसे बढ़कर निर्मल और अव्यक्त है। सद्रूप परमात्माकी सत्ता ही चेतन जीवात्माके अस्तित्वमें कारण है। जीवात्माके बिना तो प्राण और देह—ये दोनों नष्ट हो जाते हैं और देह-वियोगसे प्राण वायुमें विलीन हो जाता है; आकाशसे भी निर्मल चेतन आत्मा नष्ट नहीं होता। इसलिये संसार-भ्रमसे उसका क्या प्रयोजन है ? ब्रह्म-ज्ञानके द्वारा दोषोसे रहित हो जीवात्मा परमशिव परब्रह्म परमात्मा हो जाता है। वह परब्रह्म ही हरि है, वही शिव है, वही हिरण्यगर्भ है, वही चतुर्मुख ब्रह्मा है, वही इन्द्र है; वही वायु, वह्नि, चन्द्र एवं सूर्यरूप है और वही परमेश्वर है। वही सर्वव्यापी परमात्मा, सर्वचेतनोंका मूल स्रोत, देवेश, देवभृत्, धाता, देवदेव और स्वर्गका अधिपति है। जिस तरह पल्लवोंका मूलबीज वृक्ष है, उसी तरह सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिका मूल बीज है। वही सच्चिदानन्दघन परब्रह्म

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