भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * संकल्पत्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन * ४०१


जिस प्रकार फूल, कोंपल, पत्ते आदि लतासे वास्तवमें भिन्न नहीं हैं, वैसे ही द्वित्व, एकत्व, जगत्त्व, तू-पन, मैं-पन आदि भी चेतनसे भिन्न नहीं हैं। चेतनका देश, काल, क्रिया आदिरूप जो भेद किया गया है, वह भेद चेतनस्वरूप ही है। 'वास्तवमें चेतनमें द्वैत (भेद) है ही नहीं, तब उसमें भेद आया कहाँसे ?'—यह प्रश्न ही नहीं बनता; क्योंकि देश, काल और क्रियाकी सत्ता एवं नियति आदि शक्तियाँ स्वयं चेतनकी सत्तासे ही सत्तायुक्त होकर स्थित हैं, इसलिये वे सब चेतनस्वरूप परमात्मा ही हैं। वही यह चेतन तत्त्व परम ब्रह्म, सत्य, ईश्वर, शिव तथा निराकार, एक परमात्मा आदि अनेक नामोंसे कहा जाता है। इन नामों एवं रूपोंसे अतीत जो परमात्माका स्वरूप है तथा जो सम्पूर्ण मलोंसे रहित आत्मपदार्थ है, वह वाणी और मनका विषय नहीं है। जो यह संसार दिखायी दे रहा है, वह उस महाचेतन परमात्मारूपी लताके फल, पल्लव तथा पुष्प आदिरूप ही है, अतः उससे भिन्न नहीं। किंतु अज्ञानी जीवको अपने ही द्वैतसंकल्पसे एकमें ही द्वैतकी इसी प्रकार प्रतीति होती है, जैसे पुरुषकी वेताल-कल्पनासे उसे भयंकर वेतालकी प्रतीति होने लगती है। जैसे 'मैं कुछ नहीं करता' इस तरहके संकल्पसे पुरुषका कर्तृत्व निवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार जीवात्मामें प्रतीत होनेवाला द्वैत भी अद्वैत-भावनासे निवृत्त हो जाता है।

द्वैत-संकल्पसे तो एक ही वस्तुमें द्वित्वकी प्राप्ति होती है, पर अद्वैतभावनासे अनेकात्मक जगत्का भी द्वित्व नष्ट हो जाता है। क्योंकि विकार आदिसे शून्य, सदा सर्वगामी तथा परमात्माका स्वरूपभूत होनेसे आत्मामें कभी द्वैतभाव नहीं रहता। मुने ! अपने संकल्पसे निर्मित मनोराज्य और गन्धर्वनगरकी तरह जो वस्तु अपने संकल्पसे बनायी गयी है, वह संकल्पके अभावसे नष्ट हो जाती है। केवल दृढ़ संकल्पसे जो यह संसाररूपी दुःख प्राप्त हुआ है, वह केवल संकल्पके अभावसे ही नष्ट हो जायगा, फिर इस विषयमें क्लेश ही क्या ? क्योंकि तनिक भी संकल्प करके मनुष्य दुःखमें डूब जाता है और कुछ भी संकल्प न करके वह अविनाशी सुख पाता है। अतः मुने ! अपने विवेकरूपी पवनसे संकल्परूप मेघोंका विनाश करके शरत्कालमें आकाश-मण्डलकी भाँति तुम उत्तम निर्मलता प्राप्त करो। अविवेकरूप प्रबल प्रवाहसे उमड़ती हुई उन्मत्त संकल्प-रूप नदीको तुम मणिमन्त्रसे सुखा दो और उसमें बहते हुए अपने-आपको धैर्य देकर मनसे रहित हो जाओ एवं अपने-आप अपने संकल्पात्मक कालुष्यका विनाश करके आत्माकी उत्तम विशुद्धता प्राप्त कर अविनाशी आनन्दरूप हो जाओ। यह आत्मा समस्त शक्तियोंसे परिपूर्ण है, अतः जब कभी वह किसी वस्तुकी जैसी भी भावना करता है, अपने संकल्पसे रचित उस वस्तुको उसी समय वैसी ही देखता है। ब्रह्मन् ! यह उत्पन्न हुआ मिथ्यारूप जगत् एकमात्र संकल्पात्मक ही है; अतः केवल संकल्पके अभावसे ही कहीं भी विलीन हो जाता है। इसलिये संकल्परूप जड़को उखाड़कर अत्यन्त दृढ़ताको प्राप्त हुई इस तृणारूपी करंजलताको आप सुखा डालिये। जिस प्रकार गन्धर्वनगरकी उत्पत्ति और विनाश प्रतीतिमात्र ही हैं, उसी प्रकार यह संसाररूप भ्रमकी उत्पत्ति और विनाश भी प्रतीतिमात्र ही हैं। मुने ! मैं एक हूँ, मैं परमात्मा हूँ—इस प्रकारकी भावना कीजिये। इस भावनासे आप परमात्मा ही हो जायेंगे।

महर्षे ! चेतन जीवात्माने अज्ञानके कारण अपने संकल्पसे संसाररूपता प्राप्त की है; किंतु वास्तवमें मोहरूपी कलङ्कसे रहित वह असंसारी है तथा वह ब्रह्मसे अभिन्न और अद्वैत ब्रह्मरूप है। मैं दृश्य देहादि-स्वरूप हूँ—इस प्रकार मोहको प्राप्त हुआ चेतन जीवात्मा संसारमें फँस जाता है; पर वही शुद्ध चिन्मय