संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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चेतन परमात्माकी सर्वात्मता
श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मन् ! इस रीतिसे यह समस्त संसार एकमात्र परमात्मस्वरूप ही है। ब्रह्म ही परम आकाश है और यही सबसे बड़ा देव कहा गया है। इस परमदेवका पूजन सबमे कल्याणकर है। उसीसे सब कुछ प्राप्त होना है। वही समस्त जगत्-सृष्टिके आरोपका अधिष्ठान है और उसीमें यह सब व्यवस्थित है। स्वाभाविक आदि-अन्तसे रहित, अद्वितीय, अखण्ड नित्य परमानन्द उसी एकमात्र देवके अर्चनसे प्राप्त होता है। वह सच्चिदानन्द कल्याणस्वरूप शिव समस्त गुणोंसे अतीत और सम्पूर्ण सङ्कल्पोंसे रहित है। मुने ! देश और काल आदि परिच्छेदोंसे रहित, समस्त संसारका प्रकाश करनेवाला विशुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मा ही देव कहा जाता है। वही परब्रह्म परमात्मा 'ॐ', 'तत्', 'सत्' —इन नामोंसे कहा गया है। वह स्वभावतः महान्, ध्रुव, सत्यस्वरूप है, सर्वत्र समभावसे व्यापक है; वही महान् चेतन और परमार्थस्वरूप कहा जाता है। पापशून्य मुने ! अरुन्धतीका और आपका जो चैतन्य तत्त्व है, पार्वतीजी-का, मेरा और गणोंका जो चैतन्य तत्त्व है तथा जो चैतन्य तत्त्व तीनो जगत्में परिपूर्ण है, उत्तममति तत्त्वज्ञ लोग उसे ही परमदेव परमात्मा समझते हैं। एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही इस दृश्य संसारका सार है; इसलिये सकल-सारभूत वस्तुओंकी भी साररूपताको प्राप्त हुआ वह सर्वरूप परम देव परमात्मा मे हूँ। ब्रह्मन् ! वह परमात्मा सर्वव्यापी होनेसे किसीके लिये भी दूर नहीं है; अत वह किसीके लिये दुष्प्राप्य भी नहीं है। वह शरीरके बाहर-भीतर—सर्वत्र स्थित है। वही यह परमात्मा चिन्मय, सूक्ष्म, सर्वव्यापी और मायारहित है। देव, दानव और गन्धर्वों तथा पर्वत, समुद्र आदिसे युक्त यह सम्पूर्ण जगत् उस चैतन्यमें स्थित होकर कर्मानुसार उसी प्रकार घूमता रहता है, जिस प्रकार जल-भँवरमें जल।
ब्रह्मन् ! चिन्मय परमात्माने ही गदा, चक्र आदि आयुधोंसे युक्त चतुर्भुज विष्णुरूपसे समस्त असुर-समूहका उसी प्रकार विनाश कर दिया था, जिस प्रकार वर्षाऋतु इन्द्रधनुषसे युक्त मेघरूपसे आतपका विनाश कर देती है। चेतन परमात्माने ही वृषभ और चन्द्रमाके चिह्नोंसे युक्त त्रिनेत्र रूप धारण कर गौरीको प्राप्त किया है। चेतन परमात्मा ही भगवान् विष्णुके नाभि-कमलमें भ्रमरके समान ध्यानमे तल्लीन एवं वेदत्रयीरूपी कमलिनीका महान् सरोवरस्वरूप ब्रह्माजीका रूप धारण करता है। इसी महाचैतन्य परमात्माके सकाससे सूर्य-चन्द्रमा आदि सदा प्रकाशित होते है। निर्मल चेतनरूपी चन्द्रबिम्बमें खरगोश-की तरह सम्बन्ध प्राप्तकर यह जगत्में स्थित पदार्थोंकी शोभा सर्वत्र दिखायी पड़ती है। भद्र ! सुनो, यद्यपि इस देह-रूपी वृक्षमें हाथ, पैर आदि अपने अङ्ग ही शाखाएँ हैं और केशोंका समूह ही सुन्दर लताओंका समूह है, तथापि यह वृक्ष क्या पर्याप्तरूपसे चेतनके सम्बन्धके बिना किसी तरह शोभित हो सकता है ? चराचर पदार्थोंका निर्माण करनेवाला भी यह चेतन ही है, दूसरा नहीं। इसलिये एकमात्र चेतन ही अपने सङ्कल्पसे जगतरूपमे प्रकट है। ब्रह्मन् ! वस्तुतः इस जगत्में दो प्रकारका सर्वभूत-स्वरूप चेतन है—एक तो चञ्चलस्वभाव 'जीवात्मा और दूसरा निर्विकल्प परम चेतन परमात्मा। वह चेतन परमात्मा ही अपने सङ्कल्पसे जीवात्माके रूपमें अपनेसे भिन्न-सा होकर स्थित है। वह चेतन परमात्मा ही अपने संकल्पसे आकाश आदि पाँच भूतो, शब्दादि पाच विषयो, प्राणा-पानादि पाँच प्राणों और देश-कालके रूपमें परिणत होता है। सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही नारायण होकर समुद्रमे शयन करता हे, ब्रह्मा होकर ब्रह्मलोकमें ध्यानस्थित रहता है, हिमालय पर्वतपर पार्वतीके सहित महादेवजीका रूप धारण कर निवास करता है और वैकुण्ठमे देवेश्रेष्ठ विष्णुका रूप धारणकर रहता है। वह परमात्मा ही सूर्य बनकर