भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शुद्ध चेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन * ३९९

दिवसका निर्माण करता है, मेघ बनकर जल बरसाता है, वायु बनकर बहता है। सबका आत्मा, सर्वत्र व्यापक एवं अपनी समस्त संकल्पशक्तिके प्रभावसे सर्वस्वरूप होनेके कारण वह चिन्मय ब्रह्म जगत्-रूप हो जाता है। वास्तवमें तो वह विज्ञानानन्द परमात्मा आकाशसे भी बढ़कर निर्मल और सूक्ष्म है। वह परमात्मा जब-जब जहाँपर जिस भावसे जिस तरह संकल्प करता है, तब-तब वहाँ वैसा ही बन जाता है। (सर्ग ३०)

शुद्ध चेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन

श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मन्! चेतन जीवात्मा अज्ञानके कारण 'मैं दुखी हूँ' इस भावनासे व्यर्थ ही दुखी होता है और 'मै नष्ट हो गया; मै मर गया' यों भावना करता हुआ रोता रहता है। किंतु जिस प्रकार पत्थरमें तेल नहीं रहता, उसी प्रकार शुद्ध चेतन आत्मामें दृश्य, दर्शन और द्रष्टाकी त्रिपुटी नहीं रहती। जैसे चन्द्रमामें कालिमा नहीं रहती, वैसे ही शुद्ध आत्मामें कर्त्ता, कर्म और करण नहीं रहते। जिस प्रकार आकाशमें नवीन अङ्कुरका अभाव है, उसी प्रकार आत्मा-में प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण—इन तीनोंका अभाव है। जिस प्रकार नन्दन-वनमें खैरके वृक्षका अभाव है, उसी प्रकार शुद्ध आत्मामें मन, मनन और दृश्य विषयका अभाव है। जैसे आकाशमें पर्वतका अभाव है, वैसे ही शुद्ध चेतनमें मै-पना, तू-पना और वह-पना आदि नहीं है। जैसे काजलमें सफेदी नहीं रहती, वैसे ही चेतनमें अपनी देह तथा परायी देहका भाव नहीं रहता। वह शुद्ध चेतन आत्मा केवल, निर्विकल्प, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण तेजोंको भी प्रकाशित करनेवाला, स्वच्छ और परम श्रेष्ठ है। वह सम्पूर्ण पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाला, सर्वव्यापक, नित्य शुद्ध, नित्य प्रकाशरूप, मनसे रहित, निर्विकार और निरञ्जन है। एक वही घट और पटमें, वट और दीवाल-में, शकट और वानरमें, गदहे और असुरमें, सागर और आकाशादि भूतोंमें तथा नर और नागमें—सर्वत्र व्यापक होकर स्थित है। वह शुद्ध हुआ भी मलिन-सा, निर्विकल्प हुआ भी सविकल्प-सा, चेतन हुआ भी जड-सा और सर्वव्यापी हुआ भी एकदेशीय-सा प्रतीत होता है।

कर्मेन्द्रियोंकी प्रवृत्तिमें तत्परता संकल्पसे होती है। वह संकल्प मननजनित है। वह मनन चित्तकी अशुद्धिके कारण होता है और उन सबका साक्षी आत्मरूप चेतन सर्वविध मलोंसे रहित है। जिस प्रकार स्फटिक-शिलामें अरण्य, पर्वत, नदी आदिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार अपने स्वरूपमें ही स्थित प्रकाशस्वरूप नित्य चेतन-के अन्तःकरणमें इस जगत्का प्रतिबिम्ब पड़ता है। इस जगत्को अपने संकल्पमें धारण करनेवाला अद्वितीय, निर्विकार चेतन न उत्पन्न होता है न विनष्ट होता है, न क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। अर्थात् वह सब प्रकारके विकारोंसे रहित है। असत्स्वरूप यह जगत् अज्ञानके कारण विशाल खमकी तरह आत्मामें ही प्रतीत होता है। किंतु वास्तवमें मृगतृष्णिका-जलके सदृश प्रतीत होनेवाला यह जगत् तनिक भी सत्य नहीं है। मुने! यह परम चेतन आत्मा अपने पुर्यष्टकमें* ही प्रतिबिम्बित होता है, जैसे स्वच्छ दर्पणमें ही प्रतिमा दिखलायी पड़ती है। महर्षे! अनेक प्रकारकी कल्पनाओं-से ग्रस्त यह पुर्यष्टकरूप दृश्यसमूह शुद्ध चिन्मय आत्मा-से ही उत्पन्न होता है, उसीमें स्थित और विलीन हो जाता है। इसलिये यह सम्पूर्ण विश्व विशुद्ध चेतन आत्मस्वरूप ही है, दूसरा नहीं—यह जानिये।


* मनो बुद्धिरहंकारस्तथा तन्मात्रपञ्चकम् ।
इति पुर्यष्टकं प्रोक्तं देहोऽसावातिवाहिकः ॥
(नि० पू० ५१ । ५०)
'मन, बुद्धि, अहंकार एव पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ—इन आठोंका समूह 'पुर्यष्टक' कहा गया है और यही 'आतिवाहिक' देह कहा गया है।'

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