भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ]श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन३१७


भगवान् उमापतिने कहा—ब्रह्मन् ! शान्तिसे युक्त, परमात्मामें विश्राम लेनेवाली तथा कल्याण करनेवाली तुम्हारी चित्तवृत्तियाँ अपने स्वरूपमें अवस्थित तो हैं ? तुम्हारा कल्याणकारी तप निर्विघ्नरूपसे बराबर चल रहा है न ? तुमने प्राप्तव्य वस्तु प्राप्त कर ली है न ? और सांसारिक भय शान्त हो रहे हैं न ?

(श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—) रघुनन्दन ! समस्त लोकोंके एकमात्र हेतु देवाधिदेव महादेवजीके उस प्रकार कहनेके अनन्तर विनययुक्त वाणीसे मैने उनसे निवेदन किया—'महेश्वर ! देवाधिदेव ! त्रिलोचन ! आपकी निरन्तर स्मृतिसे प्राप्त हुए उत्तम कल्याणसे सम्पन्न पुरुषोंके लिये इस संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है और न किसी तरहके भय ही है । आपके निरन्तर स्मरणसे जनित आनन्दके कारण जिनका चित्त चारो ओरसे मुग्ध हो गया है, ऐसे पुरुषोंको इस जगत्कोशमें सभी प्राणी प्रणाम करते हैं । एकमात्र आपके अनुस्मरणमें निरन्तर जिनका मन लगा रहता है, ऐसे पुरुष जहाँ स्थित रहते हैं, वे ही देश, वे ही जनपद, वे ही दिशाएँ और वे ही पर्वत प्रशस्ततम हैं । प्रभो ! आपका अनुस्मरण पूर्व-संचित, वर्तमान और भविष्यके पुण्यसमूहकी वृद्धि करता है । आपका अनुस्मरण ज्ञानरूपी अमृतका एकमात्र आधारभूत कलश है, धृतिरूपी ज्योत्स्नाके लिये चन्द्रमा है और मोक्षरूपी नगरका द्वार है । समस्त भूतोंके अधिपते ! आपके निरन्तर चिन्तनरूपी उदार चिन्तामणिसे शोभित मैने समस्त वर्तमान और भविष्यत्कालीन आपत्तियोंको पैरसे ठुकरा दिया है ।' श्रीराम ! सुप्रसन्न उन भगवान् शंकरजीसे यों कहकर फिर नतमस्तक हो मैने जो कुछ कहा, उसे तुम सुनो ! 'भगवन् ! यद्यपि आपकी अनुकम्पासे मेरे लिये समस्त दिशाएँ अभीष्ट पदार्थोंसे परिपूर्ण हैं, तथापि देवेश ! मुझे जो एक सन्देह है, उसके विषयमें आपसे निर्णय पूछता हूँ । प्रभो ! वह देवार्चन-विधान किस तरहका है, जो उद्वेगका नाशक, विकाररहित, समस्त पापोंका विनाशकारी तथा समस्त कल्याणोंका अभिवर्धक है ? उसे प्रसन्नमतिसे आप मुझसे कहिये ।'

श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मज्ञानियोंमें अग्रगण्य मुनिवर ! मै तुमसे सर्वश्रेष्ठ वह देवार्चनका विधान कहता हूँ, जिसका अनुष्ठान करनेसे तत्काल ही मनुष्य मुक्त हो जाता है । जो आदि और अन्तसे रहित, वास्तविक ज्ञानस्वरूप है, वही 'देव' कहा जाता है । सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला सत्-स्वरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही 'देव' शब्दका वाच्य है, इसलिये उसीकी पूजा करनी चाहिये । कौन पूज्य है, इस विषयका तात्त्विक ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि एकमात्र निर्गुण निराकार विज्ञानानन्दघन विशुद्ध परमात्मा शिव ही पूज्य है और उसकी पूजन-सामग्रीमें ज्ञान, समता और शान्ति—ये सबसे श्रेष्ठ पुष्प हैं । महर्षे ! ज्ञानस्वरूप परमात्मदेवकी ज्ञान, समता और शान्तिरूप पुष्पोंसे जो पूजा की जाती है, उसीको आप वास्तविक देवार्चन जानिये । परमात्मा ही विज्ञानस्वरूप देव, भगवान् शिव और परम कारणस्वरूप है । अतः ज्ञानरूप पूजन-सामग्रीसे उसीकी सदा-सर्वदा पूजा करनी चाहिये । वसिष्ठजी ! आप जीवात्माको चिन्मय आकाशस्वरूप अविनाशी अकृत्रिम सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप ही जानिये । एकमात्र वह परमात्मा ही पूज्य है, उसके सिवा दूसरा कोई पूज्य नहीं है । अतः उस विज्ञानानन्दघन परमात्माकी पूजा ही पूजा है । महर्षे ! जो परमार्थतः सबसे श्रेष्ठ है, जो आपका—'तत्' पदार्थका, मेरा तथा समस्त जगत्‌का स्वरूपभूत है, एव जो स्वय परिपूर्णस्वरूप है, ज्ञानरूप सामग्रीसे पूजा करने योग्य उस देवका मैने आपसे वर्णन कर दिया । सभी वस्तुओंका, समस्त जगत्‌का. दूसरेका, आपका और मेरा सर्वव्यापी चिन्मय परमात्मा ही पारमार्थिक स्वरूप है, दूसरा नहीं ।

(सर्ग २९)