संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
४१-वेताल और राजाका संवाद
निर्वाण-प्रकरण पू०] * कर्तृत्वाभिमानसे रहित पुरुषके कर्मोंसे लिप्त न होनेका निरूपण * ४१९
अहंतारूपी विषसे दूषित नहीं हुआ वह रागादिरूपी हैजेसे मुक्त योगी कर्म करते हुए और न करते हुए भी लिप्त नहीं होता। जैसे विवेकी और लौकिक विषयोंका ज्ञाता होनेपर भी दुष्ट-प्रकृति पुरुष कहीं शोभा नहीं पाता, वैसे ही ममतारूपी दोषसे दूषित मनुष्य कहीं भी शोभा नहीं पाता। जो ममता और अहंकारसे रहित, सुख और दुःखोंकी प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है, वह मनुष्य कर्म करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता। पाण्डुपुत्र ! यह शास्त्रविहित उत्तम क्षात्रकर्म तुम्हारा स्वकर्म है। वह बन्धु-वधरूप होनेसे क्रूर होनेपर भी कर्तव्यबुद्धिसे किये जानेपर सुख, अभ्युदय और कल्याणका जनक है।
धनंजय ! तुम आसक्तिको त्यागकर योग—समतामें स्थित हुए कर्तव्यकर्मोंको करो। क्योंकि आसक्तिरहित होकर न्यायसे प्राप्त कर्म करनेवाला मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता। तुम शान्तिमय ब्रह्मस्वरूप होकर कर्मको ब्रह्ममय बना दो। अपने सत्कर्मोंको ब्रह्मार्पण कर देनेपर तुम शीघ्र ब्रह्म ही हो जाओगे। अपने सम्पूर्ण कार्योंको परमेश्वरमें समर्पितकर तथा अपने-आपको भी परमेश्वरमें समर्पितकर पापरहित हुए एवं सर्वभूतोंका आत्मा बनकर इस भूतलको विभूषित करते हुए तुम परमात्मा बन जाओ। तुम सभी संकल्पोंसे रहित हो; इसलिये अब समस्वरूप, शान्तचित्त मुनि बनकर कर्मफलत्यागरूपी संन्यासयोगमें आत्माको युक्त करके कर्म करते हुए ही मुक्त हो जाओ।
अर्जुनने पूछा—भगवन् ! सङ्ग-त्याग, ब्रह्मार्पण, ईश्वरार्पण, सर्वथा संन्यास तथा ज्ञान और योगका विभाग क्या है ? प्रभो ! मेरे मोहकी निवृत्तिके लिये यह सब कहिये।
श्रीभगवान्ने कहा—सारे संकल्पोंकी भलीभाँति शान्ति हो जानेपर सम्पूर्ण वासनाओं और भावनाओंसे रहित जो विशुद्ध केवल चेतनतत्त्व है, वही परब्रह्म परमात्मा कहा गया है। संस्कारके द्वारा पवित्र बुद्धिवाले पुरुषोंने उस परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके साधनको ही ज्ञान कहा है और उसीको योग कहा है तथा 'सम्पूर्ण संसार ब्रह्म ही है', और 'मैं भी ब्रह्मरूप ही हूँ'—इस प्रकार अपने आपको ब्रह्ममें अर्पण कर देनेको ब्रह्मार्पण कहा है एवं सम्पूर्ण कर्मफलोंके त्यागको ज्ञानियोंने संन्यास कहा है। संकल्प-समूहोंका जो त्याग है, वही असङ्ग (आसक्तिका अभाव) कहा गया है। आसक्तिके अभावका नाम ही सङ्गत्याग है। सभी संकल्प-विकल्प समूहोंमें जो एक ईश्वरकी भावना है तथा जीव और ईश्वरके एकत्वकी भावना है, उसीको जीवात्माका ईश्वरमें अर्पण कहा गया है। क्योंकि अज्ञानके कारण ही चेतन परमात्मामें इन जीव और जगत् आदिका नाममात्र ही भेद है। वास्तवमें यह नाम-रूपात्मक सम्पूर्ण जगत् ज्ञान-स्वरूप है; अतः जगत् एक ब्रह्ममय ही है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। अर्जुन ! दिशाएँ मैं हूँ, जगत् मैं हूँ, आत्मा मैं हूँ और कर्म भी मैं ही हूँ। काल मैं हूँ, अद्वैत और द्वैत—सब मैं ही हूँ। इसलिये मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरे पूजक बनो, मुझको प्रणाम करो। इस प्रकार आत्माको मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तुम मुझको ही प्राप्त होओगे।
अर्जुनने पूछा—देवेश्वर ! आपके पर और अपर—दो रूप किस प्रकारके हैं और परमपदरूप सिद्धिके लिये किस समय किस रूपका आश्रय लेकर मैं स्थित रहूँ ?
श्रीभगवान्ने कहा—निष्पाप अर्जुन ! यह जान लो कि मेरे दो रूप हैं—एक तो सामान्य रूप और दूसरा परम रूप। शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाला चतुर्भुज साकारस्वरूप तो मेरा सामान्य रूप है और जो मेरा विकाररहित, अद्वितीय, आदि और अन्तसे रहित निर्गुण निराकार स्वरूप है, वह परम रूप है; वही ब्रह्म, शुद्ध आत्मा, परमात्मा आदि शब्दोंसे कहा जाता है। तुम सम्प्रबुद्ध होकर परम उत्कृष्ट, आदि और अन्तसे रहित मेरे उस रूपको जान जाओगे, जिसके ज्ञानसे प्राणी इस संसारमें फिर उत्पन्न नहीं होता। अरिमर्दन ! यदि
४२-वेतालकृत छः प्रश्नोंका राजाद्वारा समाधान
४२० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तुम ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके योग्य हो तो मुझ परमेश्वर-की आत्माको और अपनी आत्माको एकरसकर अखण्ड परिपूर्णात्माका तत्काल आश्रय ले लो। 'यह मैं हूँ' और 'यह भी मैं हूँ' इत्यादि जो कुछ मैं कहता हूँ, वह सब इस आत्मतत्त्वका ही उपदेश मैं तुम्हें देता हूँ। मैं समझता हूँ कि मेरे उपदेशसे तुम भली प्रकार प्रबुद्ध हो चुके हो, ब्रह्मपदमें विश्रान्ति पा चुके हो और सर्व-संकल्पोंसे भी मुक्त हो चुके हो। अब तुम सत्य एवं अद्वितीय आत्मस्वरूप होकर स्थित रहो एवं सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त और सबको समभावसे देखनेवाले तुम आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखो—अर्थात् एक परमात्माके सिवा और कुछ नहीं है, ऐसा समझो। क्योंकि जो पुरुष 'सब कुछ ब्रह्म ही है' 'मैं भी ब्रह्म ही हूँ' इस प्रकार एकीभावका आश्रय लेकर सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित परमात्माको भजता है, वह सब प्रकारसे व्यवहार करता हुआ भी पुनः इस संसारमें उत्पन्न नहीं होता, अर्थात् वह परमपदको प्राप्त हो जाता है। 'सर्व' शब्दका अर्थ है—एकत्व और वह एकत्व परमात्माका वाचक है। वह परमात्मा प्रत्यक्ष प्रतीत न होनेके कारण सत् भी नहीं कहा जा सकता और ध्रुव सत्य भावरूप होनेके कारण असत् भी नहीं कहा जा सकता; अतः वह सत्-असत्से विलक्षण है। वह जिसके अनुभवमें आ जाता है, उसे शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। जो तीनों लोकोंके अन्तःकरणके भीतर स्थित हुआ प्रकाश देता है और जो ज्ञानियोंके अनुभवमें प्रत्यक्ष है, निश्चय ही वही मैं परमात्मा हूँ।
सम्पूर्ण शरीरोंके भीतर जो दृश्य संसारसे रहित और सूक्ष्मरूपसे व्यापक अनुभवस्वरूप है, वही यह सर्वव्यापी परमात्मा है। बाहर-भीतर प्रकाश करनेवाला तेजस्वरूप मैं देहोंके भीतर प्रत्यक्ष विद्यमान रहता हुआ भी प्रतीत नहीं होता। जिस तरह हजारों घड़ोंके बाहर और भीतर आकाश समभावसे व्यापक है, उसी तरह भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों जगत्में स्थित शरीरोंके भी बाहर और भीतर मैं व्यापक हूँ; किंतु लाखों देहोंके भीतर सम-भावसे व्यापक हुआ भी यह परमात्मा सूक्ष्म होनेके कारण प्रतीत नहीं होता। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जितना भी पदार्थ-समूह है, उसमें जो समभावसे नित्य स्थित है, विद्वान्लोग उसे ही नित्य चिन्मय परमात्मा जानते हैं। विनाशशील पदार्थोंमें साक्षीकी भाँति समभावसे स्थित अविनाशी परमात्माको जो देखता है, वही यथार्थ देखता है। पाण्डुनन्दन ! 'समस्त शरीरोंमें चेतन ही मैं हूँ, शरीर मैं नहीं हूँ' इस प्रकार जो मैं कहता हूँ, वह अद्वितीय परमात्मा मैं सबका आत्मा हूँ। तुम मुझे इस प्रकार तत्त्वतः जानो। जिस प्रकार पर्वतोंका वास्तविक स्वरूप पाषाण ही है, वृक्षोंका स्वरूप काष्ठ ही है और तरङ्गोंका स्वरूप जल ही है, उसी प्रकार सम्पूर्ण पदार्थोंका वास्तविक स्वरूप परमात्मा ही है। जो पुरुष परमात्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको परमात्मामें कल्पित देखता है एवं आत्माको अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है। अर्जुन ! नाना प्रकारके आकार-विकारों-वाले तरङ्गोंमें जैसे जल व्यापक है या कडे-कुण्डल आदिमें सुवर्ण व्यापक है, वैसे ही विविध प्रकारके समस्त प्राणियोंमें परमात्मा समभावसे व्यापक है। तथा जिस प्रकार जलमें नाना प्रकारके चञ्चल तरङ्ग-समूह हैं या सुवर्णमें कडे-कुण्डल आदि हैं, उसी प्रकार परमात्मामें ये समस्त भूत-प्राणी भी हैं। इसलिये भारत ! सम्पूर्ण पदार्थ और भूत-प्राणी एवं परम ब्रह्म—इन सबको एकरूप ही जानो, इनमें लेशमात्र भी पृथक्त्व नहीं है। इस प्रकारके उपदेशोंको सुनकर और निश्चयपूर्वक भीतर अभय ब्रह्मकी भलीभाँति भावना करके समबुद्धि महात्मालोग जीवन्मुक्त होकर इस संसारमें विचरा करते हैं। जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्तिरूप दोषको जीत लिया है, जिनकी
४३-भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य और अपने गुरु त्रितलके साथ संवाद
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति कर्म और ज्ञानके तत्त्वका प्रतिपादन * ४२१
परमात्माके स्वरूपमें नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्णरूपसे नष्ट हो गयी हैं—वे सुख-दुःखनामक द्वन्द्वोंसे विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपदको प्राप्त होते हैं।
( सर्ग ५३ )
श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति कर्म और ज्ञानके तत्त्व-रहस्यका प्रतिपादन
श्रीभगवान्ने कहा—महाबाहो अर्जुन ! तुम फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचनको सुनो, जिसे मैं अतिशय प्रेम रखनेवाले तुम्हारे लिये हितकी इच्छासे कहूँगा। कुन्तीपुत्र ! सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखको देनेवाले इन्द्रिय और विषयोंके संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं; इसलिये भारत ! उनको तुम सहन करो। इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंका विषय-संसर्ग, सुख-दुःख आदि द्वन्द्व या इनसे भिन्न जो कुछ भी पदार्थ हैं, वे सब-के-सब एक सच्चिदानन्दघन परमात्मासे तनिक भी पृथक् नहीं हैं अर्थात् सब कुछ परमात्मा ही है। अतः फिर, सुख और दुःख कहाँ ? आदि-अन्तसे रहित तथा अवयवहीन परमात्मामें पूर्णता और अपूर्णता कैसे हो सकती है । इसलिये जो पुरुष सुख-दुःखमें समान और धीर है, वह अमृतमय ब्रह्मपदको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। वास्तवमें सभी तरहसे सुख-दुःखोंका अस्तित्व तनिक भी नहीं है। परमात्मतत्त्व ही सर्वरूप है, इसलिये अनात्मारूप संसारकी सत्ता कैसे स्थिर होगी। क्योंकि असत् वस्तुकी तो सत्ता है नहीं और सत्का अभाव नहीं है अतएव सुख-दुःख आदि हैं ही नहीं, केवल एक सर्वव्यापी परमात्मा ही है। अर्जुन ! यद्यपि आत्मा दृश्य पदार्थोंका साक्षीरूपसे साक्षात्कार करनेवाला चेतनस्वरूप है और शरीरके अंदर रहता भी है, तथापि वह सुखोंसे न तो हर्षित होता है और न दुःखोंसे दुखित ही । परमात्मासे पृथक् देह आदि कुछ भी नहीं है और न दुःख आदि ही हैं; अतः वास्तवमें कौन किसका अनुभव करेगा ? क्योंकि एक परमात्माके सिवा दूसरी वस्तु है ही नहीं। भारत ! यह दुःख अज्ञानसे उत्पन्न एक प्रकारकी भ्रान्ति ही है
अतः परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे वह सर्वथा विनष्ट हो जाता है। जिस प्रकार रज्जुका यथार्थ तत्त्व न जाननेसे उत्पन्न हुआ रज्जुमें सर्पका भय रज्जुके यथार्थ ज्ञानसे नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार अज्ञानसे उत्पन्न हुए देह एवं दुःखादिका अस्तित्व परमात्माके तात्त्विक ज्ञानसे नष्ट हो जाता है। यह विश्व नित्य एवं पूर्ण ब्रह्म ही है। वह ब्रह्म न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न ही होता है, इसे ही ध्रुव सत्य जानो। यही यथार्थ बोध है।
अर्जुन ! तुम मान, मद, शोक, भय, इच्छा, सुख, दुःख—इस सम्पूर्ण असद्रूप जड द्वैत-प्रपञ्चसे रहित हो जाओ और एकमात्र अद्वितीय चिन्मय सत्यरूप परमात्मामें तद्रूप हो जाओ। भारत ! सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय और पराजयके ज्ञानसे रहित होकर तुम एकमात्र शुद्ध ब्रह्मरूप हो जाओ; क्योंकि तुम ब्रह्मरूप ही हो। अर्जुन ! तुम जो कर्म करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो और भविष्यमें जो कुछ शास्त्रानुकूल अनुष्ठान करोगे, वह सब परमात्म-रूप ही है—इस प्रकारके ज्ञानमें स्थिर रहो। जो पुरुष अपने अन्तःकरणमें जिस पदार्थका संकल्प करता है, वह निस्संदेह उसी रूपमें बदल जाता है। इसलिये अर्जुन ! सत्यस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त करनेके लिये तुम सत्यस्वरूप ब्रह्म हो जाओ । क्योंकि जो पुरुष विनाशशील क्रियारूप संसारमें अक्रिय सच्चिदानन्द ब्रह्मको स्थित देखता और अक्रिय सच्चिदानन्द ब्रह्ममें विनाशशील क्रियारूप संसारको कल्पित देखता है, वह मनुष्योंमें ज्ञानवान् है और सम्पूर्ण कर्मोंको कर चुका है—ऐसा कहा गया है—इसलिये अर्जुन ! तुम कर्मोंमें वासना तथा कर्त्तापनके अभिमानसे रहित हो
४२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जाओ । तुम्हारी कर्मोंको न करनेमें आसक्ति न हो और तुम योगमें स्थित हुए अनासक्तभावसे शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका आचरण करो । मूढ़ता, अकर्मण्यता तथा कर्मोंमें आसक्तिके आश्रयसे रहित हुए सबमें समभाव होकर स्थित रहो । जो पुरुष समस्त कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिका सर्वथा त्याग करके संसारके आश्रयसे रहित हो गया है और परमात्मामें नित्य तृप्त है, वह कर्मोंको भलीभाँति करता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता ।
परमात्माके यथार्थ तात्त्विक ज्ञानका आश्रय लेनेवाले आसक्तिरहित महात्माके हृदयमें सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी कहीं कभी कर्तृत्वाभिमान नहीं होता । कर्तृत्वाभिमान न रहनेसे अभोक्तृत्वकी सिद्धि होती है और भोक्तृत्वके अभावसे समता और एकताकी सिद्धि होती है । उस समता और एकतासे अनन्तताकी सिद्धि होती है तथा उससे अनन्त नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है । जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्पके होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं । जो सम, सौम्य, स्थिर, स्वस्थ, शान्त और सब पदार्थोंसे निःस्पृह होकर स्थित रहता है, वह कर्म करता हुआ भी वास्तवमें कुछ नहीं करता । इसलिये अर्जुन ! तुम हर्ष-शोकादि द्वन्द्वोंसे रहित, नित्य वस्तु परमात्मामें स्थित, योग-क्षेमको न चाहनेवाले और स्वाधीन अन्तःकरणवाले हो जाओ एवं न्यायसे प्राप्त शास्त्रोक्त कर्मोंको करते हुए पृथ्वीको विभूषित करनेवाले आदर्श पुरुष बन जाओ । जो मूढबुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे रोककर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है । किंतु अर्जुन ! जो पुरुष मनसे इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियोंद्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है । जैसे नाना नदियोंके जल सब ओरसे परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठावाले समुद्रमें उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुषमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंको चाहनेवाला नहीं । (सर्ग ५४)
श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति देहकी नश्वरता, आत्माकी अविनाशिता, मनुष्योंकी मरणस्थिति और स्वर्ग-नरकादिकी प्राप्ति एवं जीवात्माके संसारभ्रमणमें कारणरूप वासनाके नाशसे मुक्तिका प्रतिपादन
श्रीभगवान्ने कहा—पार्थ ! बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि प्रारब्धानुसार न्यायसे प्राप्त भोगोंका त्याग न करे और अप्राप्त भोगोंको पानेकी इच्छा न करे एवं न्यायसे प्राप्त भोगोंका शास्त्रानुकूल उपभोग करते हुए भी समभाव- से स्थित रहे। महाबाहु अर्जुन ! जन्मादि विकारस्वभाव- वाले अनात्मरूप जड देहमें मै-पनकी भावना मत करो, अपितु जन्मादि विकारसे रहित सत्य चिन्मय आत्मामें ही आत्माकी भावना करो । देहका नाश होनेपर अविनाशी आत्माका नाश नहीं होता । इसलिये सम्पूर्ण परिग्रहोंसे रहित, चित्तरहित पुरुषका पतन नहीं होता । वह कर्मोंको करता हुआ भी कुछ नहीं करता; क्योंकि परमात्माके यथार्थ तात्त्विक ज्ञानका आश्रय लेनेवाले आसक्तिरहित महात्माके हृदयमें सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी कहीं कभी कर्तृत्वाभिमान नहीं होता । अर्जुन ! यह आत्मा अविनाशी, आदि और अन्तसे रहित, अजर कहा गया है; इसलिये 'आत्माका नाश होता है' यह दुःखदायी दुर्बोध तुम-जैसे मनुष्यको नहीं होना चाहिये । उत्तम आत्मज्ञानी लोग 'आत्मा नाशवान् है' इस रूपसे आत्माको नहीं देखते । देहाभिमानी
**२९-जीवात्माका अपनी भावनासे लिङ्गदेहात्मक पुर्यष्टक बनकर अनेक रूप धारण करना ... ४१४**
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति आत्माकी अविनाशिता आदिका प्रतिपादन * ४२३
अज्ञानी मनुष्य ही आत्मामें आत्माको अनात्मरूपसे देखते हैं यानी देहको ही आत्मा मानते हैं। तथा यह नष्ट हो गया और यह प्राप्त हो गया—इत्यादि भावनाएँ वन्ध्या स्त्रीके पुत्रके समान मोहजनित भ्रम (असत्) हैं। असत् वस्तुकी तो सत्ता नहीं है और सत्का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनोंका ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषोंद्वारा देखा गया है। नाशरहित तो तुम उसको जानो, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्—दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्माके ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये भरतवंशी अर्जुन ! तुम युद्ध करो। आत्मा एक है और द्वैत है ही नहीं; अतः आत्माके सिवा दूसरे असत् पदार्थकी उत्पत्ति हो कैसे सकती है ? क्योंकि सत्का नाश नहीं होता, इसलिये यह सद्रूप परमात्मा अविनाशी और अनन्त है।
अर्जुनने पूछा—भगवन् ! तब तो 'मैं मर गया हूँ' इस प्रकार मनुष्योंकी मरणस्थिति किस हेतुसे प्राप्त होती है और उस स्थितिमें प्रभो ! लोगोंको प्रसिद्ध स्वर्ग और नरक कैसे प्राप्त होते हैं !
श्रीभगवान्ने कहा—अर्जुन ! पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन और बुद्धि—इनसे युक्त तन्मात्राओंका जो समूह है, अज्ञानसे तत्स्वरूप हुआ ही जीव देहोंमें स्थित रहता है। वह देहमें स्थित जीवात्मा वासनासे उसी तरह खींचा जाता है, जिस तरह रस्सीसे बछड़ा। वह शरीरके अंदर पिंजरेमें पक्षीकी तरह बैठा रहता है। जब देश और कालसे जर्जर हुए शरीरसे यह जीव वासना लेकर निकल जाता है, तब इसीको लोग मरना कहते हैं। जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचाको तथा रसना और घ्राणको ग्रहण करके पूर्व शरीरसे दूसरे शरीरमें चला जाता है। इसका शरीर वासनामय ही है यानी केवल वासनाके अनुसार ही उत्पन्न हुआ है, अन्य किसी दूसरे कारणसे नहीं। अतएव वासनाका त्याग होनेपर लिङ्गदेह विनष्ट हो जाता है और उस लिङ्गदेहके विनष्ट हो जानेपर वह जीवात्मा परमपदको प्राप्त हो जाता है। यह वासनामय जीव वासनासे परिपुष्ट होकर अज्ञानसे अनेक भ्रमोंका भार ढोता हुआ कर्मानुसार नाना योनियोंमें भ्रमण करता है; यही जीवात्माका जन्म-मरण है। कुन्तीपुत्र अर्जुन ! शरीरसे जीवके निकल जानेपर देह इसी प्रकार कम्पनशून्य हो जाती है, जिस प्रकार वायुके शान्त हो जानेपर वृक्ष। जब शरीर जीवात्मासे रहित हो जाता है, तब वह 'मर गया' यों कहा जाता है। अनादि अविद्यासे मूढ़बुद्धि यह जीव अपने कर्म और वासनाके अनुसार नरक, स्वर्ग, (इसी लोकमें) पुनर्जन्म आदि, जिनमें भ्रमण करनेका उसने चिरकालसे अभ्यास किया है, अनुभव करता रहता है।
अर्जुनने पूछा—जगत्पते ! इस जीवका स्वर्ग, नरक, मर्त्यलोक आदिमें जो भ्रमण होता है, उसमें कारण क्या है, यह आप मुझसे कहिये।
श्रीभगवान् बोले—अर्जुन ! चिरकालिक अभ्याससे प्रौढ हुई स्वप्नतुल्य यह वासना ही जीवको संसाररूप भूलभुलैयामें डालती है; इसलिये तत्त्वज्ञानके अभ्याससे वासनाका समूल क्षय ही जीवके लिये कल्याणकारक है।
अर्जुनने पूछा—देवदेवेश ! यह वासना किससे उत्पन्न हुई और वह किस प्रकार नष्ट होती है ?
श्रीभगवान् बोले—कौन्तेय ! अनात्मवस्तु देहमें आत्मभावनारूप यह वासना अज्ञानस्वरूप मोहसे उत्पन्न हुई है और परमात्माके यथार्थ अनुभवरूप ज्ञानसे यह विनष्ट हो जाती है। तुम पवित्रात्मा हो चुके हो और सत्य वस्तुका विवेक भी तुम्हें हो चुका है। अब तुम 'यह', 'वह', 'मैं' और 'ये लोग' इत्यादि-रूप वासनासे रहित हो जाओ। क्योंकि भारत ! दूसरेके अधीन न रहनेवाला, संकल्परहित और अविनाशी
४२४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमाम्स्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जीवात्माका परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे वासनासे छूट जाना ही उसका 'मोक्ष' है। महाबाहु अर्जुन ! वासनारूप रज्जुके बन्धनसे छूटा हुआ पुरुष 'मुक्त' कहा जाता है। अतः तुम वासनासे रहित होकर जीते-जी ही उस वास्तविक यथार्थ तत्त्वका अनुभव करो। जो वासनासे रहित नहीं है,—भले ही वह समस्त धर्मोंके परायण क्यों न हो, सर्वज्ञ यानी समस्त सांसारिक विषयोंका पण्डित ही क्यों न हो—फिर भी वह पिंजरेमें स्थित पंछीकी भाँति सब ओरसे वासना-जालसे बँधा हुआ है। क्योंकि वासना ही बन्धन है और वासनाका क्षय ही मोक्ष है। (सर्ग ५५)
श्रीभगवान्के द्वारा अर्जुनके प्रति जीवन्मुक्त अवस्था और जगद्रूप चित्रका वर्णन एवं वासनारहित और ब्रह्मस्वरूप होकर स्थित रहनेका उपदेश तथा इस उपदेशको सुनकर तत्त्वज्ञानके द्वारा अर्जुनकी अविद्यासहित वासनाका और मोहका नाश हो जाना
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन ! इस प्रकार वासना-निवृत्तिरूप जीवन्मुक्तिके द्वारा तुम आन्तरिक शान्ति प्राप्तकर बन्धुवधप्रयुक्त दुःखका निःशेषरूपसे परित्याग कर दो। निष्पाप अर्जुन ! जरा और मरणसे रहित, आकाशकी तरह विशाल चित्तवाले तथा इष्ट एवं अनिष्ट विषयोंके संकल्पोंसे रहित होकर तुम वीतराग हो जाओ। सदासे चला आनेवाला स्वधर्मरूप कर्म जो समभावसे किया जाता है, वह तो जीवन्मुक्तोंके लिये स्वाभाविक ही है और वही जीवन्मुक्तता है। 'यह कर्म मैं छोड़ता हूँ' और 'इस कर्मको मैं अङ्गीकार करता हूँ'—इस प्रकार जो त्याग और ग्रहणका निर्णय है, वह एकमात्र अज्ञानियोंके मनका स्वरूप है; ज्ञानियोंकी तो उनमें सम स्थिति रहती है। जिसकी इन्द्रियाँ कछुएके अङ्गोंकी भाँति इन्द्रियोंके विषयोंसे हटकर अन्तःकरणमें स्थिर हो जाती हैं, वही स्थितप्रज्ञ और जीवन्मुक्त है। कमलनयन ! वास्तवमें यह संसार आकाशसे भी बढ़कर वैसे ही शून्यरूप है, जैसे स्वप्नमें क्षणमात्रमें चित्तमें होनेवाले तीनों लोकोंका नाश और उत्पत्ति—यह तुम जानो। क्योंकि आत्मा, मन और उसका कार्य यह बाह्य और आभ्यन्तर सम्पूर्ण जगत् स्वप्नकी तरह शून्य है (असत् ही हैं)। यह सब चिरकालिक मनोराज्य है, इसलिये अज्ञानी मनुष्योंको इसमें सत्यत्वकी प्रतीति होती है। किंतु वह सत्यत्वकी प्रतीति तत्त्व-ज्ञानरूप आलोकसे नष्ट हो जाती है। चित्तरूपी चितेरेके चित्रमें अवस्थित त्रिभुवन आदि विचित्र मूर्तियों आधारभूत भीतके न रहनेसे बाहर आकार-रहित यानी मिथ्या ही हैं। अर्जुन ! वास्तवमें न तो उन चित्त-कल्पित मूर्तियोंका अस्तित्व है और न तुम्हारे शरीरका ही अस्तित्व है; इसलिये कौन किससे मारा जाता है ? अतः नाश्य-नाशकका मोह छोड़कर तुम निर्मल बनकर ब्रह्मरूप परमपदमें स्थित हो जाओ। अर्जुन ! जैसे एकमात्र चित्तमें रहनेवाला मनोराज्यरूप चित्र आकारवाला प्रतीत होता हुआ भी वास्तवमें शून्यस्वरूप होनेसे असत् ही है, वैसे ही यह जगत् भी शून्यस्वरूप है—यह तुम जानो। अर्जुन ! मन ही क्षणको कल्प कर देता है और असत्को उत्पन्न कर देता है—यह जो मनके विषयमें आश्चर्य है, वह तो बहुत ही थोड़ा है; उससे भी बढ़कर तो आश्चर्य यह है कि वह असत् जगत्को भी शीघ्र सद्रूप कर देता है। इसलिये यह जगद्रूप भ्रान्ति इस प्रकारके आश्चर्य पैदा करनेवाले मनसे ही उत्पन्न हुई है। क्षणभरके लिये ही अज्ञानवश चित्र-विचित्रस्वरूप प्रतीत हुआ जो यह मनोराज्य है, वही दृश्यमान इस प्रपञ्च-जालके रूपमें प्रतीत होता है। यद्यपि ज्ञानियोंकी दृष्टिमें स्वतः नित्यमुक्त आत्मामें
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीभगवान्के द्वारा अर्जुनके प्रति जीवन्मुक्त अवस्थाका वर्णन ४२५
अध्यस्त और एकमात्र कल्पनासे उत्पन्न होनेके कारण प्रतीतिकालमात्रस्थायी यह तुच्छ जगत् क्षणिक ही है, तथापि इसी क्षणिक जगत्के विषयमें इसके वास्तविक स्वरूपसे अपरिचित अज्ञानी लोगोंने वज्रसारकी तरह दृढ़ कल्पना कर रक्खी है अर्थात् इस असत् जगत्को सत्य मान रक्खा है। अहो ! अत्यन्त आश्चर्य है कि यह उज्ज्वल चित्र आधारके बिना ही उत्पन्न होकर सामने दिखलायी दे रहा है। यह जगद्रूप चित्र भलीभाँति लोगोंका अनुरञ्जन करनेवाला है और दृष्टि, मन आदिको भी लुभानेवाला है। यह नाना प्रकारके प्राणियोंसे युक्त है, अद्भुत है, आकाशके समान शून्यरूप है और नाना प्रकारके विलासोंसे वेष्टित भी है। इस प्रकारके इस जगतरूप चित्रका शीघ्र ही अद्भुत चित्रोंका निर्माण करनेमें समर्थ चित्तरूप चित्रकारने आकाशमें ही चित्रण किया है।
अर्जुन ! चेतन आकाशस्वरूप ब्रह्मसे निर्मित सब कुछ ब्रह्म ही है। ब्रह्ममें ब्रह्मके द्वारा ब्रह्म विलीन होता है। ब्रह्ममें ही ब्रह्मके द्वारा ब्रह्मका उपभोग किया जाता है और ब्रह्मद्वारा ब्रह्ममें ब्रह्मका ही विस्तार हुआ है। जैसे प्रतिबिम्ब अपने आधार दर्पणमें प्रतीत होता है, वैसे ही यह जगत् भी अपने आधार ब्रह्ममें ही प्रतीत होता है। अर्जुन ! जब ब्रह्ममें प्रतिभासित छेदन-भेदन आदि सम्पूर्ण व्यवहार और उनका विषय जगत्—ये सब ब्रह्मसे अभिन्न होकर एकमात्र चिन्मय आकाश-स्वरूप ही हैं, तब किस कर्ता या करणसे किस प्रकारसे किस देश या किस कालमें क्या छिन्न-भिन्न किया जा सकता है। इसलिये बोधसे तुम्हारी वासनाओंका अभाव सिद्ध ही है। जो वासनासे रहित नहीं है, भले ही वह समस्त शास्त्रीय कर्मोंके परायण हो और समस्त सांसारिक विषयोंका ज्ञाता हो; फिर भी वह वैसे ही अत्यन्त बद्ध है, जैसे पिंजरेमें स्थित सिंह। जिसकी चित्तरूपी भूमिमें अणुमात्र भी वासनारूप बीज पड़ा रहता है, उसका संसाररूप जंगल पुनः बढ़ जाता है। जब सत्यस्वरूप परमात्माका यथार्थ ज्ञान अभ्यासके द्वारा हृदयमें दृढ़ हो जाता है, तब वासना पूर्णतया नष्ट हो जाती है और वह फिर उत्पन्न नहीं होती। वासनाओंके पूर्णतया नष्ट हो जानेपर विशुद्ध जीवात्मा सांसारिक सुख-दुःखादि वस्तुओंमें वैसे ही लिप्त नहीं होता, जैसे पानीमें कमलका पत्ता। अर्जुन ! असङ्ख्य वासनाओंसे रहित तुम मुझसे सुने हुए पवित्र उपदेशको भलीभाँति समझकर परमात्मामें चित्त-को विलीनकर भय और मोहसे रहित एवं शान्त निर्वाण ब्रह्मस्वरूप हुए स्थित रहो।
अर्जुनने कहा—अच्युत ! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है। अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन ! यदि परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे तुम्हारे हृदयमें रागादि वृत्तियाँ अशेषरूपसे शान्त हो चुकीं तो तुम जान लो कि तुम्हारा सवासनात्मक चित्त भी भीतर शान्त होकर निर्वासनताको प्राप्त हो गया। इस सत्त्वावस्थामें सर्वस्वरूप जीवात्मा सम्पूर्ण वासनाओं और विषयोंसे मुक्त हो जाता है। उस जीवात्माके यथार्थ स्वरूपको कोई भी उसी प्रकार नहीं देख सकते, जिस प्रकार भूमिसे आकाशमें उड़कर दूर देशमें गये हुए पक्षीको। पार्थ ! मन-इन्द्रियोंके प्रकाशक, शुद्धस्वरूप, संकल्परहित, निर्विषय इस जीवात्माको मन-इन्द्रियोंसे दूर समझो। जैसे अग्निके पर्वतपर पहुँचकर हिमकण सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे अविद्या भी नष्ट हो जाती है। नाना प्रकारके आकार और विकारोंवाली यह अविद्या तभीतक रहती है, जबतक जीवात्मा अपने वास्तविक स्वरूप—विशुद्ध विज्ञानानन्दघन परमात्माको भलीभाँति नहीं जान लेता। जो समग्र परमात्मा अपने आपसे परिपूर्ण है, समस्त
४२६ * अविच्छिन्नान्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
दृश्य संसारसे रहित है और वाणीसे अतीत है, उस अनुपम परम वस्तु परमात्माकी किसके साथ उपमा दी जा सकती है अर्थात् किसीके साथ नहीं। इसलिये अर्जुन ! तुम अभीष्ट कामनाओंकी निवृत्तिरूप युक्तिसे विषयात्मक विषसे उत्पन्न महामारीरूप अन्त:करणकी वासनाको निपुणतापूर्वक दूर कर संसारसे तथा सम्पूर्ण भयोंसे रहित परमात्मस्वरूप ही हो जाओ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इस प्रकार उपदेश देकर त्रिलोकीके अधिपति भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके क्षणभरके लिये मौन धारण कर सामने स्थित हो जाने-पर वहाँ (द्वापर युगमें) पाण्डुपुत्र अर्जुन पुनः यह वचन कहेगा।
अर्जुनने कहा—भगवन् ! आप सम्पूर्ण लोकोंका भरण-पोषण करनेवाले हैं। आपके वचनसे मेरी यह बुद्धि शोकरहित और ज्ञानसम्पन्न हो गयी है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इस प्रकारके वचन कहकर और उठकर गाण्डीव-धनुर्धारी वह पाण्डुपुत्र अर्जुन, जिसके सारथि श्रीकृष्ण होंगे, संदेह-रहित हुआ रणलीला करेगा। वह अर्जुन पृथ्वीको ऐसी रक्तकी महानदियोंसे पूर्ण कर देगा, जिनमें आहत हुए बड़े-बड़े हाथी, घोड़े, सारथि आदि बह जायँगे और आकाशको भी ऐसा बना देगा कि सूर्य बाणोंके तथा धूलिके समूहोंसे आच्छादित हो जायगा। (सर्ग ५६–५८)
परमात्माकी नित्य सत्ता, जगत्की असत्ता एवं जीवन्मुक्त-अवस्थाका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिससे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है, जिसमें सम्पूर्ण जगत् स्थित रहता है, जो सम्पूर्ण जगत्स्वरूप है, जो सब ओर विद्यमान है और जो सर्वमय है, उसीको नित्य परमात्मा समझो। वह परमात्मा अश्रद्धालुके लिये दूर होता हुआ भी श्रद्धालुके लिये समीप ही है। वह सर्वव्यापी होनेसे सबमें स्थित है, एवं वास्तवमें ज्ञान और ज्ञेयसे रहित सच्चिदानन्द परमपदस्वरूप है। वही परमपद सबकी पराकाष्ठा है, वही सम्पूर्ण दृष्टियोंमें सर्वोत्तम दृष्टि है, वही सारी महिमाओंकी सर्वोत्तम महिमा है तथा वही गुरुओंका भी गुरु है। वही सबका आत्मा है और वही विज्ञान है, वही शून्यस्वरूप है, वही परब्रह्म है, वही परम कल्याण है, वही शान्त और मङ्गलमय शिव है, वही परम विद्या है और वही परम स्थिति है। उस परमात्मामें यह जगत् अविचारसे ही सत्य-सा प्रतीत होता है, किंतु वास्तवमें विवेकपूर्वक विचार करनेसे असत् है। आदि और अन्तसे रहित आकाशके समान व्यापक मैं ही परब्रह्म परमात्मा हूँ, मुझसे अतिरिक्त यह संसार कुछ भी नहीं है—यों निश्चय करनेपर फिर ब्रह्मस्वरूप मुझमें परिमितता नहीं रह सकती। जो पुरुष इस प्रकारके निश्चयसे युक्त रहता है, वह बाहरसे लोक-शास्त्रकी मर्यादा-के अनुसार कार्य करनेपर भी वास्तवमें उत्पत्ति और विनाशसे रहित है। जिसका मन समसे-भी-सम ब्रह्ममें लीन होकर फिर न उदित होता है और न अस्त होता है एवं जिसकी बुद्धिमें मनका अभाव है, वह महात्मा ब्रह्मरूप ही है। एकमात्र ब्रह्मभावनासे अद्वितीय परमपद पर आरूढ़ हुआ वह महात्मा व्यवहार करता हुआ भी क्षोभको प्राप्त नहीं होता। व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषके हृदयमें मानापमानसे जनित सुख-दुःख आदि विकार तनिक भी नहीं होते, वह पुरुष मुक्तिका अधिकारी है।
वह शान्त चेतन परमात्मा अपने-आप ही अपनेमें संकल्प करता है। उसका संकल्प ही संसार है और उसके संकल्प-का अभाव ही परमपद है। इसलिये परमात्माके संकल्पका अभाव होनेसे ही इस संसारका अभाव हो जाता है। अतः मुनिलोग परमात्माके संकल्पको ही प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * परब्रह्म परमात्माके सत्ता-सामान्य स्वरूपका प्रतिपादन * ४२७
आदिरूप संसार-चक्रकी परम्परा कहते हैं । जैसे सुवर्णमें कड़ा-कुण्डल आदि सुवर्णसे पृथक् नहीं हैं, वैसे ही परमात्माका संकल्प यह संसार भी परमात्मासे पृथक् नहीं है । परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे ही भोग-वासना क्षीण हो जाती है और भोग-वासनाका अभाव ही ज्ञानीका उत्तम लक्षण है । ज्ञान और वैराग्यके कारण तत्त्वज्ञ पुरुषको संसारके भोग स्वभावसे ही रुचिकर नहीं होते । यह संसार सर्वात्मस्वरूप परमात्मा ही है—इस प्रकारका जिसके हृदयमें दृढ अनुभव है, वही जीवन्मुक्त कहा गया है । किंतु यह जीवात्मा जबतक अज्ञानसे आवृत रहता है, तबतक दृश्य विषयभोगोंमें स्थित हुआ संसार-का संकल्प करता रहता है । जब अन्तःकरणमें उत्तम तत्त्वज्ञानका उदय हो जाता है, तब संकल्प-विकल्पका यह क्रम बुझे हुए दीपककी भाँति शान्त हो जाता है । स्वयंप्रकाश, चैतन्यरूप, सम्पूर्ण पदार्थोंका आश्रय और विषयोन्मुखतासे रहित शुद्ध चेतनका जो स्वरूप है, उसे ही तुम परमपद जानो । यह संसार संकल्पमय ही है; इसलिये संकल्प नष्ट हो जानेपर संसार भी नष्ट हो जाता है और फिर सच्चिदानन्द परमात्मा ही रह जाता है । ( सर्ग ५९ )
परब्रह्म परमात्माके सत्ता-सामान्य स्वरूपका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इस प्रकार सबका आदि परमतत्त्व सच्चिदानन्दघन ही परमपद है । उस सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको यथार्थ ज्ञानसे प्राप्त कर यह जीव अज्ञानियोंकी तरह मृत्युको नहीं प्राप्त होता ( अर्थात् वह जन्म-मरणसे छूट जाता है ) । उसे प्राप्तकर वह शोचनीय नहीं रह जाता । उसे पा लेनेपर वह अज्ञानियोंकी तरह जीवन धारण नहीं करता ( अर्थात् वह कुछ विलक्षण ही बन जाता है ) और उसे प्राप्तकर वह सर्वव्यापी होनेके कारण सीमाओंमें नहीं बँधता । आकाशके समान अनन्त परमात्माके सत्ता-सामान्य स्वरूपका यदि जीव थोड़ी देर और थोड़ा-सा भी चिन्तन करता है तो वह मुक्तचित्त मुनि बन जाता है और उस अवस्थामें संसारके समस्त कार्योंको करते हुए भी कभी संतप्त नहीं होता ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—महर्षे ! ‘सत्ता-सामान्य’ शब्दसे आप किसे ग्रहण करते हैं—मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तका जहाँ लय हो गया है, उस ( निर्विशेष ) तत्त्वको या मन आदि विशेषताओंसे युक्त ( सविशेष ) तत्त्वको ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जो सर्वव्यापक, आदि और अन्तसे रहित तथा सदा समभावसे स्थित है, वह ज्ञानसे प्राप्तव्य तथा सम्पूर्ण वस्तुओंका तत्त्वभूत ब्रह्म ही यहाँपर ‘सत्ता-सामान्य’ शब्दसे कहा गया है । वह ब्रह्म आकाशमें आकाशरूपसे, शब्दमें शब्दरूपसे, स्पर्शमें स्पर्शरूपसे तथा त्वचा में त्वग्रूपसे हैं । रसमें रसरूपसे, रसनेन्द्रियमें रसनेन्द्रियरूपसे विद्यमान है । रूपमें रूपस्वरूपसे, नेत्रमें नेत्ररूपसे, घ्राणेन्द्रियमें घ्राणरूपसे और गन्धमें गन्धरूपसे है । शरीरमें शरीररूप-से, पृथ्वीमें पृथ्वीरूपसे है । दूधमें दुग्धरूपसे, वायुमें वायुरूपसे, तेजमें तेजोरूपसे, बुद्धिमें बुद्धिरूपसे, मनमें मनरूपसे और अहंकारमें अहंकाररूपसे विद्यमान है । वृक्षमें वृक्ष रूपसे, पटमें पटरूपसे, घटमें घटरूपसे और वटमें वटरूपसे विद्यमान है । स्थावरमें स्थावररूपसे, जंगममें जंगमरूपसे, जडमें जडरूपसे और चेतनमें चेतनरूपसे विद्यमान है । देवोंमें देवरूपसे, मनुष्योंमें मनुष्यरूपसे, तिर्यक्-योनियोंमें तिर्यग्रूपसे और कृमियोनियोंमें कृमिरूपसे विद्यमान है । कालके क्रममें कालरूपसे, ऋतुओंमें ऋतुरूपसे एवं त्रुटि, क्षण, निमेष आदिमें भी वह सर्वव्यापी ब्रह्म ही उस-उस रूपसे विद्यमान है । इस प्रकार सभी पदार्थोंमें तत्-तत् रूपसे रहता
४२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ]
हुआ वह परब्रह्म परमात्मा सत्ता-सामान्य स्वरूपसे उसी तरह उनसे अभिन्न है, जैसे समुद्रगत कल्लोल, जलकण तथा लहरें जलसामान्यसे अभिन्न हैं। सबमें समान भावसे सत्त रूपमें व्यापक होनेके कारण वह परमात्मा ही सत्ता-सामान्य कहा गया है। श्रीराम! सत्य चिन्मय-स्वरूप इस परमात्माद्वारा कल्पित होनेके कारण इन पदार्थोंकी अनेकरूपता वैसे ही मिथ्या है, जिस प्रकार बालकद्वारा परछाईंमें कल्पित प्रेत।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! मुनि वसिष्ठके इतना कह चुकनेपर दिन बीत गया, सूर्य अस्ताचलको चले गये, सभासद्गण भी सायंकालिक कृत्य—स्नान, संध्योपासना आदि करनेके लिये मुनिको नमस्कार करके उठ गये और रात बीतनेपर सूर्यदेवकी किरणोंके साथ ही फिर दूसरे दिन सभामें प्रविष्ट हुए। (सर्ग ६०)
संसारके मिथ्यात्वका दिग्दर्शन तथा मोहसे जीवके पतनका कथन
श्रीरामजीने पूछा— मुने! जिस प्रकार हमलोगोंके लिये स्वप्नके नगर, राजधानियों तथा राज्य मिथ्या हैं, उसी प्रकार यदि ब्रह्मा आदिके लिये भी शरीर-धारण एवं उत्पन्न हुआ यह सम्पूर्ण जगत् मिथ्या ही है तो हमलोगोंको इसकी सत्यतामें अत्यन्त दृढ़ विश्वास क्यों होता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम! प्रजापतिने इस सृष्टिके पूर्व जो सृष्टि-रचना की थी, वह भी हमारे अनुभवमें आनेवाली वर्तमान सृष्टिके समान ही सत्य प्रतीत होती थी, तथापि वह ब्रह्माजीका संकल्प होनेके कारण वास्तविक न थी। इसी प्रकार यह सृष्टि भी वास्तविक नहीं है। सच्चिदानन्द परमात्माके सर्वव्यापी होनेसे जीव भी सर्वव्यापी है और उस परमात्माकी सत्तासे ही यह संसार सत्य-सा भासित होता है। किंतु वास्तवमें यह संसार अज्ञानसे उत्पन्न होता है और तत्त्वज्ञानसे नष्ट हो जाता है। श्रीराम! सोये हुए पुरुषको अपने तथा अन्य सभी पदार्थोंके रूपमें दीखनेवाला स्वप्न जैसे मिथ्या है, वैसे यह दृश्य संसार भी मिथ्या है। जो स्वप्नका संसार पुरुषसे उत्पन्न है, वह पुरुषका स्वरूप ही है—जैसे किसी बीजसे उत्पन्न वृक्षसहित फल बीजरूप ही है, यह बात भली प्रकार अनुभूत है। जो असत्यसे उत्पन्न होता है, उसे असत्य ही समझो। अतः स्वप्न-पुरुषसे उत्पन्न जो असत् पदार्थोंकी भावना है, वह दृढ़ सत्यरूपसे प्रतीत होनेपर भी असत्य ही है, इसलिये त्याग कर देने योग्य है। जैसे हमलोगोंको स्वप्नमें प्रतीत होनेवाला सृष्टि आदि कार्य दृढ़रूप (सत्य) दीखनेपर भी क्षणस्थायी (मिथ्या) ही होता है, उसी प्रकार सामने वर्तमान यह प्रजापतिके संकल्पसे रचित सृष्टि भी मिथ्या ही है। जैसे द्रवत्वके कारण आवर्तरूप परिवर्तनोंसे जल स्फुरित होता है, उसी प्रकार चिन्मय ब्रह्मके संकल्पसे यह सृष्टि स्फुरित हो रही है। जो देश और कालमें, क्रियाओंसें, द्रव्योंसे, मणियोंसे तथा संकल्पोंसे प्रकट हैं, ऐसे असंख्य पदार्थ गन्धर्व-नगरके सदृश (मिथ्या) होनेपर भी सत्यके समान प्रतीत होते हैं। इस संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो सत्य न हो; क्योंकि सब कुछ ब्रह्मका संकल्प होनेसे ब्रह्मका स्वरूप ही है एवं ब्रह्मका स्वरूप होनेसे सत्य ही है। साथ ही ऐसी कोई वस्तु भी नहीं है, जो असत्य न हो; क्योंकि सब कल्पनामात्र होनेसे असत्य ही है। जैसे स्वप्नमें निमग्न पुरुष स्वप्नकालमें वस्तुओंकी स्थिर स्थिति ही देखता है, उसी प्रकार इस सृष्टिमें जिस अज्ञानीकी बुद्धि निमग्न है, वह सब विषयोंकी स्थिर स्थिति ही देखता है, किंतु यह सृष्टि वास्तवमें स्वप्नवत् कल्पनामात्र है। संसारको अत्यन्त स्थिर समझनेवाला यह जीव एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें प्रवेश करनेवालेकी तरह मोहके कारण एक भ्रमसे दूसरे भ्रममें पड़ जाता है। (सर्ग ६१)
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सांख्ययोग और अष्टाङ्गयोगके द्वारा परम-पदकी प्राप्ति * ४२९
चार प्रकारका मौन और उनमेंसे जीवन्मुक्त ज्ञानीके सुषुप्त मौनकी श्रेष्ठता
इसके अनन्तर भिक्षु आख्यानका वर्णन करके श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मुनिवरोंने दो तरहके मुनि बतलाये हैं—एक काष्ठतपस्वी और दूसरा जीवन्मुक्त। परमात्माकी भावनासे रहित शुष्क क्रियामें बद्धनिश्चय और हठसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंको जीत रखनेवाला मुनि काष्ठमौनी कहा गया है । इस विनाशशील संसारके स्वरूपको यथार्थरूपसे जानकर जो विशुद्धात्मा और परमात्ममें स्थित ज्ञानी महात्मा बाहर न्याययुक्त लौकिक व्यवहार करता हुआ भी भीतर विज्ञानानन्दघन परमात्मामें तृप्त रहता है, वह जीवन्मुक्त मुनि कहा गया है । मौनको जाननेवाले मुनियोंने मौनके चार भेद बतलाये हैं—वाङ्मौन, इन्द्रियमौन, काष्ठमौन और सुषुप्तमौन । वाणीका निरोध वाङ्मौन, हठपूर्वक विषयोंसे इन्द्रियोंका निग्रह इन्द्रियमौन और सम्पूर्ण चेष्टाओंका त्याग काष्ठमौन कहलाता है । एवं परमात्माके स्वरूपानुभवमें जो जीवन्मुक्त निरन्तर लगा रहता है, उसके मौनको सुषुप्तमौन कहते हैं । काष्ठमौनमें वाङ्मौन आदि तीनों मौनोंका अन्तर्भाव है और सुषुप्तमौनावस्थामें जो तुर्यावस्था है, वही जीवन्मुक्तोंकी स्थिति है । ऊपर जो तीन प्रकारका मौन कहा गया है, वह प्रस्फुरित हुए चित्तका चलन ही है। अतएव ये तीनों मौन उपादेय नहीं वरं त्याज्य हैं। किंतु इन तीनोंसे भिन्न चौथा जो सुषुप्तमौन है, वह जीवन्मुक्तोंकी स्थिति है। इसमें स्थित जीवात्माका पुनर्जन्म नहीं होता । इसमें सम्पूर्ण इन्द्रिय-वृत्तियाँ अनुकूलमें तो हर्षित नहीं होतीं और प्रतिकूलमें घृणा नहीं करतीं । जो विभागरहित, अभ्यासरहित एवं आदि और अन्तसे रहित है तथा जो ध्यान करते हुए या ध्यान न करते हुए सभी अवस्थाओंमें समभावसे स्थित है, वही सुषुप्तमौन कहा जाता है । अनेक प्रकारके विभ्रमयुक्त संसारके और परमात्माके तत्त्वको यथार्थरूपसे जाननेपर जो संदेहरहित स्थिति होती है, वही सुषुप्त मौन है। जो सर्वशून्य, आलम्बन रहित, शान्तिस्वरूप, विज्ञानमात्र तथा सत्-असत्से रहित स्थिति है, वह उत्तम सुषुप्त मौन कही गयी है । इस जगत्में विकार-रहित, सर्वात्मक तथा सत्ता-सामान्यस्वरूप परमात्मा मैं ही हूँ—इस तरहकी ज्ञानावस्थाको सौषुप्तमौन कहते हैं । ब्रह्मभूत श्रीरामभद्र ! जाग्रदवस्थामें सब ओर भलीभाँति व्यवहार करता हुआ अथवा सम्पूर्ण व्यवहारोंको छोड़कर समाधिमें स्थित हुआ जीवन्मुक्त देहयुक्त होनेपर भी सम्पूर्ण निर्मल शान्तिवृत्तिसे युक्त तुरीयावस्थामें ही स्थित एवं विदेहस्वरूप ही है ।
( सर्ग ६२--६८ )
सांख्ययोग और अष्टाङ्गयोगके द्वारा परमपदकी प्राप्ति
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जड आकाशसे भी अत्यन्त स्वच्छ चेतनस्वरूप परमात्माकाश है और उस परमात्माकाशभावकी प्राप्ति ही परम श्रेय ( मोक्ष ) है। वह कैसे प्राप्त की जानी है, यह मैं बतलाता हूँ; सुनो। परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे और नित्य एकरस समाधिसे जो सांख्ययोगके द्वारा ज्ञानी हुए हैं, वे सांख्य-योगी कहे गये हैं । जो प्राणादि वायुओंके संयमपूर्वक अष्टाङ्गयोगके द्वारा अनामय, आदि-अन्तसे रहित परम-पदको प्राप्त हो गये हैं, वे योग-योगी कहे गये हैं। यह स्वाभाविक परम शान्त पद सभी योगियोंके लिये उपादेय है । कुछ लोग उस पदको सांख्ययोगद्वारा प्राप्त हो चुके हैं और कुछ लोग इसी देहने अष्टाङ्ग-योगके द्वारा प्राप्त हो चुके हैं। जो सांख्य और योगको एक समझता है, वही ठीक समझता है । क्योकि जो परमपद सांख्ययोगियोंद्वारा प्राप्त किया जाता है; वही अष्टाङ्गयोगियोंद्वारा भी प्राप्त किया जाना है । जहाँ प्राण, मनकी वृत्ति तथा वासणारूपी जाड्यता अत्यन्त अभाव है, उसीको परमपद समझो । वासनाको ही चित्त
४३० * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
कहते हैं। वही संसारका कारण है। वह चित्त सांख्य या योग दोनोंमेंसे किसी एक साधनके द्वारा विलीन होकर संसारकी निवृत्तिका कारण हो जाता है । यह संसार मनके संकल्पसे उत्पन्न हुआ है । उससे उत्पन्न ममता, अहंता, संसृति, उपदेश्य-उपदेशादि, बन्ध और मोक्षकी सत्ता ही कहाँ है अर्थात् सब संकल्पमात्र हैं। एक विज्ञानानन्दघन परमार्थ-तत्त्वका दृढ़ अभ्यास, प्राणोंका विलीन होना तथा मनोनाश—यही 'मोक्ष' शब्दके अर्थका संग्रह है यानी ये ही मोक्षके साधन हैं।
श्रीराम ! इन तीनो उपायोंमें मनोनाशको ही मुख्य साध्य जानो । मनोविनाश जितना ही शीघ्र होगा उतना ही शीघ्र कल्याण होगा। परमात्माके यथार्थज्ञानसे सभी पदार्थोंका अभाव हो जाता है, जिससे वासनाका विनाश होनेपर प्राण और चित्तका वियोग हो जाता है । फिर भलीभाँति शान्त हुआ मन देहरूपताको नहीं प्राप्त होता । मनके विनाशसे ही जीवात्माको परमपदकी प्राप्ति होती है, अतः मुनिगण वासनाको ही मन जानते हैं । चित्तका स्वरूप केवल वासना ही है । उस चित्तका अभाव होनेपर परमपद प्राप्त हो जाता है । रामभद्र ! रज्जुमें सर्पभ्रमके सदृश मिथ्यारूप इस संसारका स्वयं ही विवेकज्ञानसे अच्छी तरह विनाश हो जाता है । एक विज्ञानानन्दघन परमार्थ-तत्त्वका दृढ़ अभ्यास, प्राणनिरोध और मनोविनाश—ये जो तीन उपाय हैं, इनमेंसे किसी एककी सिद्धि हो जानेपर ही दूसरे भी परस्पर सिद्ध हो जाते हैं। ताड़के पत्तोंसे निर्मित पंखेको चलाना जब बंद कर दिया जाता है तब पवन जैसे अपने-आप शान्त हो जाता है, वैसे ही जब प्राणरूप वायुका स्पन्दन शान्त हो जाता है, तब मन भी अपने-आप शान्त हो जाता है। जैसे वायुका चलना रुक जानेपर गन्धका प्रसार भी रुक जाता है, वैसे ही मनका चलना रुक जानेपर प्राण-वायुओंका चलना भी रुक जाता है । सभी प्राणियोंके प्राण और चित्त दोनों उसी प्रकार एक दूसरेसे निरन्तर मिले-जुले रहते हैं, जिस प्रकार पुष्प और गन्ध एवं तिल और तेल एक दूसरेसे निरन्तर मिले-जुले रहते हैं । आधार और आधेयके समान अर्थात् अग्नि और उष्णताके समान दोनोंमेंसे किसी एकका विनाश हो जानेपर दोनों विनष्ट हो जाते हैं और अपने विनाशके द्वारा वे दोनों जीवात्माके लिये एक महान् मोक्षनामक कार्य सम्पन्न कर देते हैं । एक ब्रह्मतत्त्वके दृढ़ अभ्याससे द्वैत-वासनासे रहित होकर मन शान्त हो जाता है और इससे प्राण भी शान्त हो जाता है; क्योंकि प्राणका स्वभाव मनके साथ विलीन हो जाना ही है । मनुष्यको एक शुद्ध परमात्मतत्त्वमें तबतक तदाकारवृत्ति बनाये रखनी चाहिये, जबतक उस वृत्तिका ही अभ्यासके द्वारा अभाव न हो जाय । क्योंकि निग्रहवृत्तिसे युक्त पुरुषोंका चित्त स्वयं ही प्राणोंके साथ विलीन हो जाता है और परमतत्त्व अवशिष्ट रह जाता है । चित्त जिस किसी वस्तुमें तन्मय हो जाता है, वह शीघ्र तद्रूप ही बन जाता है; अतः दीर्घकालतक परमात्मतत्त्वके अभ्यासमे वह समस्त विशेषोंसे मुक्त होकर निर्विशेष ब्रह्मरूप ही हो जाता है । श्रीराम ! यदि परमपदमें चित्त मुहूर्तमात्र भी विश्रामको प्राप्त हो जाय तो उसे तुम ब्रह्मरूपमें ही परिणत हुआ समझो । जिसमे अविद्याका अभाव हो चुका है, ऐसा विशुद्ध चित्त 'सत्त्व'शब्दसे कहा जाता है। जिसमें संसारकी बीजरूपा वासना दग्ध हो गयी है, वह चित्त फिर कभी ब्रह्मरूपतासे अलग नहीं होता; क्योंकि वह ब्रह्ममें तद्रूप हो गया है । जिसकी अविद्या निवृत्त हो चुकी है, जो सत्त्वभावमें स्थित है, जो वासनारहित हो चुका है, ऐसा कोई विरला मनुष्य आकाशके समान निर्गुण-निराकार विज्ञानानन्दघन परमतत्त्वको देखता है और तत्काल मुक्त हो जाता है ।
(सर्ग ६९)
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * बेताल और राजाका संवाद * ४३१
बेताल और राजाका संवाद
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिस अवस्थामें जीव ब्रह्म हो जाता है और चित्तका विनाश हो जाता है तथा विवेकपूर्वक विचारसे अविद्याका अन्त—अभाव हो जाता है, वही जीवात्माका मोक्ष कहा जाता है। मृगतृष्णा-जलकी तरह मिथ्या मन तथा अहंता आदि प्रपञ्च क्षणभरके लिये ही प्रतीत होते हैं और पूर्वोक्त विवेकपूर्वक विचारसे विलीन हो जाते हैं । भद्र ! इस संसाररूपी स्वप्न-विभ्रमके सम्बन्धमें बेतालद्वारा किये गये इन शुभ प्रश्नोंको तुम सुनो, जो मुझे प्रसङ्गवश स्मरण हो आये हैं । विन्ध्याचलके महान् वनमें एक विशालकाय वेताल रहता था । किसी समय वह गर्वमें भरकर प्राणियोंको मार डालनेकी इच्छासे किसी नगरमें गया । पहले वह वेताल किसी एक सज्जन नामक राजाके देशमें रहता था । उस राजाद्वारा किये गये अनेक वधके योग्य मनुष्योंकी बलिके उपहारसे सदा तृप्त होकर वह सुखसे रहता था । सामने आये हुए निरपराधी मनुष्यको वह भूखसे पीड़ित होनेपर भी अकारण नहीं मारता था; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष न्यायके ही पक्षपाती होते हैं । किसी समय न्यायोचित भक्ष्य न मिलनेके कारण अरण्यवासी वह बेताल क्षुधासे प्रेरित होकर न्यायप्राप्त मनुष्यका भक्षण करनेके लिये नगरके भीतर चला गया । उस नगरमें प्रजा-रक्षाके लिये रात्रिमें विचरण करता हुआ राजा उसे मिला । उस राजासे यह उग्र निशाचर भयंकर शब्दोंमें कहने लगा ।
वेतालने कहा—राजन् ! इस समय मुझ भयंकर वेतालके द्वारा तुम पकड़ लिये गये हो । कहाँ जा रहे हो ! अब तुम मर चुके । आज तुम-मेरे भोजन बन जाओ ।
राजाने कहा—निशाचर ! यदि तुम यहाँ बलपूर्वक अन्यायमार्गसे मुझे खा जाओगे तो निश्चय ही तुम्हारे मस्तकके हजारों टुकड़े हो जायेंगे ।
वेतालने कहा—राजन् ! मैं तुम्हें अन्यायपूर्वक नहीं खाऊँगा; परंतु तुम्हें मैं यह न्याय बतलाता हूँ कि तुम राजा हो, इसलिये तुम्हें अर्थियोंके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करने चाहिये । मेरी इस याचनाको, जो पूर्ण करने योग्य है, तुम पूर्ण करो । मैं यहाँ तुमसे जो प्रश्न कर रहा हूँ, इनका भलीभाँति उत्तर दो । राजन् ! किस सूर्यकी किरणोंके ये ब्रह्माण्डरूपी छोटे अणु हैं और किस पवनमें महागगनरूपी त्रसरेणु स्फुरित होते हैं ! एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें जाता हुआ जीवात्मा पहलेके सैकड़ों या हजारों स्वप्नोंके अस्तित्वको छोड़ता हुआ भी किस प्रकाशक स्वच्छ वास्तविक स्वरूपका परित्याग नहीं करता ? जिस प्रकार केलेका खंभा भीतरके भी
४३२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भीतर और उसके भी भीतर बार-बार देखनेसे केवल छिलकामात्र ही रहता है, उसी प्रकार सबके भीतर-के भीतर और उसके भी भीतर ऐसा कौन अणु है, जो प्रकाशक स्वच्छ आत्मस्वरूप है। ब्रह्माण्ड, आकाश, भूतोंके आधारभूत भुवन, सूर्यमण्डल तथा मेरु—ये सब जो बड़े-बड़े महान् पदार्थ प्रसिद्ध हैं—ये अणुत्व धर्म न छोड़नेवाले ऐसे किस अणुके परमाणु हैं ? किस अवयव-रहित परमाणुरूप महागिरिकी शिलाके भीतर ये भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों जगत् हैं ? दुष्ट राजन्! यदि तुम इन प्रश्नोंका उत्तर मुझे न दे सकोगे तो तुम्हें खाकर फिर तुम्हारे नगरके प्राणियोंको बलपूर्वक पकड़कर उन्हें यमराजकी तरह निगल जाऊँगा । ( सर्ग ७० )
वेतालकृत छः प्रश्नोंका राजाद्वारा समाधान
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रामभद्र ! जब ऐसा कहकर वेताल चुप हो गया, तब वह राजा हँसकर यह कहने लगा।
राजाने कहा—वेताल ! यह चराचर जगत्रूपी फल उत्तरोत्तर दशगुण पञ्चभूतोंकी परतसे घिरा हुआ है—अर्थात् इस जगत्के सब ओर पृथ्वीका घेरा है। उसके बाद पृथ्वीसे दसगुना जल, जलसे दसगुना तेज, तेजसे दस-गुना वायु और वायुसे दसगुना आकाश है। ऐसे हजारों फल जहाँ विद्यमान हैं, ऐसी बहुत ऊँची एक शाखा है। उस प्रकारकी बड़ी-बड़ी हजारो शाखाएँ जहाँ विद्यमान हैं, ऐसा बड़े आकारवाला एक महान् वृक्ष है । इसी प्रकारके हजारों वृक्ष जिसमें हैं, ऐसा एक वन है। उसी प्रकारके हजारों वन जहाँपर हैं, ऐसा उन्नत शिखरोंसे युक्त चारों ओरसे परिपूर्ण आकारवाला एक विशाल पर्वत है। जहाँपर वैसे हजारों पर्वत हैं, ऐसा अत्यन्त विस्तीर्ण विशाल खोहोंवाला एक देश है। वैसे हजारो देश जहाँपर विद्यमान हैं, ऐसा बड़े-बड़े हृद और नदियोंसे युक्त एक बहुत बड़ा द्वीप है। वैसे अनन्त द्वीप जिसमें हैं, ऐसी चित्र-विचित्र रचनाओंसे युक्त एक पृथ्वी है। उस प्रकारके हजारों पृथ्वीमण्डल जिसमें विद्यमान हैं, ऐसा एक अत्यन्त विस्तृत महान् भुवन है । उस तरहके असंख्य महान् भुवन जिसमें विद्यमान हैं, ऐसा विस्तृत आकाशके सदृश एक महान् प्रचण्ड ब्रह्माण्ड है। इस-इस तरहके असंख्य ब्रह्माण्ड जिसमें विद्यमान हैं ऐसा एक चञ्चलतारहित असीम जलनिधि है । उस तरहके लाखों सागर जिसमें कोमल तरङ्गरूप है, ऐसा एक अपने स्वरूपमें विश्राम करनेवाला निर्मल महार्णव है। उस प्रकारके हजारों महार्णव जिसके उदरके जलरूप हैं, ऐसा एक कोई बड़ा भारी परिपूर्णाकृति पुरुष है। ऐसे-ऐसे लाखों पुरुषोंकी माला जिसके वक्षःस्थलमें स्थित हैं, ऐसा एक परम पुरुष है, जो सब सत्ताओंका प्रधान है। इस प्रकारके असंख्य महापुरुष जिसके मण्डलमें स्फुरित हो रहे हैं, ऐसा एक महान् आदित्य है। ये सब कल्पनाएँ ही इस आदित्यरूप ब्रह्मकी रश्मियाँ हैं । ब्रह्माण्ड ही इस आदित्य ( ब्रह्म ) की दीप्तियोंके त्रसरेणु हैं । मैंने तुमसे जिस सूर्यका कथन किया था, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही वह सूर्य है; इसीके प्रभावसे सारा जगत् प्रकाशित होता है। वेताल ! पूर्वोक्त असंख्य पदार्थ जिससे प्रकाशित होते हैं, ऐसा विज्ञानस्वरूप परम सूर्य है और ये जो विस्तृत ब्रह्माण्ड हैं, वे उसी सूर्यकी किरणोंमें स्फुरित होनेवाले त्रसरेणु हैं । इस प्रकार यह तुम्हारे प्रथम प्रश्नका उत्तर दिया गया ।
वेताल ! कालकी सत्ता, आकाशकी सत्ता, जीवात्मा-की सत्ता तथा शुद्ध चेतन आत्माकी सत्ता—इत्यादि-सब सूक्ष्म होनेसे निर्दोष रज हैं । वे परमात्मारूपी महावायुमें कल्पित अनेक विकारोंसे चञ्चल होकर स्फुरित होते हैं। 'जगत्' नामक महास्वप्नमें एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें जाता हुआ जीवात्मा परम शान्तिको बढ़ानेवाले
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य * ९३३
अपने महान् शुद्ध आत्मस्वरूपको नहीं छोड़ता। जैसे केलेका खंभा ज्यों-ज्यों छीला जाता है त्यों-त्यों उसके भीतर-भीतर केवल पत्ता ही मिलता जाता है, वैसे ही परिणामशील यह विश्व ज्यों-ज्यों भीतर-भीतर देखा जाता है त्यों-त्यों उसमें ब्रह्म ही मिलता जाता है। वह आकाश-के तुल्य निराकार, अनिर्वचनीय परमात्मा सत्, ब्रह्म, आत्मा आदि शब्दोंसे कहा जाता है। सूक्ष्म मन और इन्द्रियोंके द्वारा अप्राप्य होनेके कारण परमात्मा परमाणु कहा गया है। अनन्त होनेके कारण परमात्मा ही मेरु आदि पर्वतोंका मूल है। परमाणुस्वरूप होते हुए भी इस परमपुरुष अनन्त परमात्मामें ब्रह्माण्ड, आकाश, भुवन, सूर्यमण्डल और मेरु—ये सब पदार्थ परमाणुकी तरह प्रतीत होते हैं। यह परमात्मा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ग्राह्य न होनेसे परमाणु कहा गया है और सब ओर परिपूर्ण होनेसे महापर्वत कहा गया है। वास्तवमें यह परम पुरुष परमात्मा अवयवरहित है, किंतु दृश्यके सम्बन्धसे अवयव-युक्त दिखायी पड़ता है। अज्ञानी वेताल ! ये सब जगत् उस विज्ञानस्वरूप परमात्माके संकल्पसे कल्पित हैं। अतः तुम उस अनन्त, शान्त स्वभाव अपार परमपदको अनुभव करो और शान्त हो जाओ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! राजाके मुखसे इस प्रकार प्रश्नोंका समाधान सुनकर शुद्धान्तःकरण वेताल विचारयुक्त बुद्धिसे परम शान्तिको प्राप्त हो गया। निर्दोष आत्माको तत्त्वसे समझकर और भयंकर क्षुधाको भूलकर वह शान्तमन वेताल परमात्माके ध्यानमें अचल स्थिर हो गया। ( सर्ग ७१—७३ )
भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य और अपने गुरु त्रितलके साथ संवाद
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देहयात्रार्थ प्रारब्धवश प्राप्त हुए अर्थसे संतुष्ट रहनेवाले प्रयत्नशील पुरुषके दुःसाध्य अर्थ भी भगीरथ राजाकी तरह सिद्ध हो जाते हैं। जिसका पूर्णरूपसे मन शान्त हो गया है, जिसकी वृत्तियाँ पर्याप्तरूपसे तृप्त हो गयी हैं, जिसकी आनन्दघनस्वरूप सम ब्रह्ममें निरन्तर निष्ठा है, उस महापुरुषके दुर्लभतर अभीष्ट कार्य भी उसी प्रकार सिद्ध हो जाते हैं, जिस प्रकार भगीरथका सगरपुत्रोंके उद्धारके लिये संजीवन गङ्गावतरणरूप अत्यन्त दुर्लभ कार्य सिद्ध हो गया था।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—प्रभो ! राजा भगीरथके चित्त-कौशलसे गङ्गावतरणरूप दुःसाध्य कार्य किस रीतिसे सिद्ध हुआ था, वह मुझसे कहिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! समुद्रोंसे युक्त पृथ्वी-का एक अत्यन्त धार्मिक भगीरथ नामका राजा हो चुका है। वह राजमण्डलमें सबसे श्रेष्ठ था। चन्द्रमाकी तरह प्रसन्न-मुख एवं चिन्तामणिके सदृश अभीष्ट अर्थोंको देनेवाले इस राजासे याचकगण अपने संकल्पके अनुसार ही अभीष्ट अर्थ प्राप्त करते थे। वह श्रेष्ठ पुरुषोंकी रक्षाके लिये निरन्तर धन देता था। न्यायसे प्राप्त तृण भी ले लेता था। वह याचकोंकी अभीष्ट-सिद्धिके लिये चिन्ता-मणिके सदृश था। मृदु और शीतल स्पर्शवाला वह ब्रह्म-तत्त्वज्ञानियोंकी संनिधिमें उनके चित्तको आह्लादित करता हुआ उसी प्रकार द्रवीभूत हो जाता था, जिस प्रकार चन्द्रमाकी संनिधिमें चन्द्रकान्तमणि। उसने अगस्त्य-मुनिद्वारा शोषित सागरको गङ्गाके प्रवाहसे उसी तरह पूरा कर दिया, जिस तरह याचकोंके समूहको धनसे पूरा किया था। पातालवासी अपने पूर्वजोंको उस लोकबन्धुने गङ्गारूपी सीढ़ी लगाकर ब्रह्मलोकमें पहुँचाया। गङ्गाजीको यहाँ लानेके उद्देश्यसे अपनी तपस्यासे ब्रह्मा, शंकर और जहुकी आराधना करते हुए उस दृढ़ निश्चयसे युक्त भगीरथने बार-बार क्लेश सहन किया। श्रीराम ! इस लोकयात्राका खूब विचार करते हुए उस राजाको युवा-वस्थामें ही तीव्र वैराग्यकी चिनङ्गारियोंने विवेकयुक्त विचार
४३४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उत्पन्न हुआ। वह राजा एकान्तमें असमञ्जसमें पड़कर व्याकुल हो इस संसारयात्राका प्रतिदिन यों विचार करने लगा—'इस संसारमें, जिसके प्राप्त हो जानेसे दूसरा कोई प्राप्य पदार्थ अवशिष्ट नहीं रहता, मैं उसी कर्मको सुकृत समझता हूँ। शेष कर्म तो विषूचिका (हैजेकी बीमारी) है। पुनः-पुनः पर्युषित कर्म करता हुआ मूढ-बुद्धि प्राणी लज्जित नहीं होता। कोई मूर्ख प्राणी तो अवश्य ही बालककी तरह बार-बार एक ही कर्म करता रहता है।' इस तरह चिन्ता करनेके अनन्तर संसारसे अत्यन्त भयभीत उद्विग्न-मन राजा भगीरथने एक दिन अपने गुरु त्रितलसे पूछा।
भगीरथने कहा—विभो! बहुत कालसे इन सारहीन सांसारिक वृत्तिरूप बड़े-बड़े जंगलोंमें भटकते हुए हम सब अत्यन्त खिन्न हो गये हैं। भगवन्! संसारमें फँसानेवाले जरा-मरण-मोहादिरूप सब दुःखोंका अन्त कैसे होता है?
त्रितल बोले—निष्पाप राजन्! चिरकालसे अभ्यस्त अन्तःकरणकी समतासे उत्पन्न, निर्विशेष, अखण्ड और व्यापक ज्ञेय परमात्माके ज्ञानसे सब दुःख नष्ट हो जाते हैं, सारी ग्रन्थियाँ सब ओरसे टूट जाती हैं, सारे संशय तथा कर्म शान्त हो जाते हैं। राजन्! तत्त्वज्ञानियोंने शुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्माको ही ज्ञेय बतलाया है और वह परमात्मा सर्वव्यापी तथा नित्य है। वह उत्पत्ति-विनाशसे रहित है।
भगीरथने कहा—मुनीश्वर! यह तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि चिन्मय, निर्गुण, शान्त, निर्मल और अच्युत परमात्मा है तथा देह आदि अन्य कुछ भी नहीं है—कल्पनामात्र है। किंतु भगवन्! ज्ञेयरूप परमात्माके स्वरूपमें मेरी अचल स्थिति (समाधि) नहीं हो रही है। इसमें क्या कारण है? मैं किस उपायसे उसे प्राप्त करूँ?
त्रितल बोले—हृदयाकाशमें यह चित्त जब ज्ञानके द्वारा ज्ञेयरूप परमात्मामें स्थिर हो जाता है, तब यह जीव सर्वात्मरूप परमात्माको प्राप्त होकर पुनः संसारमें उत्पन्न नहीं होता। पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्तिका अभाव, ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना, अनन्ययोगसे—आत्मा ही ब्रह्म है, ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई पदार्थ है ही नहीं, इस प्रकारकी अभेदभावनासे निरन्तर आत्मामें ब्रह्म-भावना, एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और विषयासक्त मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना, अध्यात्म-ज्ञानमें नित्य-स्थिति और तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना—यह सब ज्ञान है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है, ऐसा कहा गया है। राजन्! अहम्भावकी शान्ति हो जानेपर राग-द्वेषका विनाश कर देनेवाला तथा जन्म-मरणरूप संसार-व्याधिकी औषध परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जाता है।
भगीरथने कहा—महाभाग! पर्वतमें दीर्घकालसे सुदृढ हुए वृक्षकी तरह अपने शरीरमें दीर्घकालसे सुदृढ हुए अहम्भावका मैं कैसे त्याग करूँ?
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा भगीरथका सर्वस्वत्याग, भिक्षाटन और गुरु त्रितलके साथ निवास * ४२५
त्रितल बोले—राजन् ! पौरुष-प्रयत्नसे विषय-भोगोंकी भावनाका त्याग कर फिर परमात्माकी सत्ताका अनुभव करनेसे अहंकारका विनाश हो जाता है । जबतक सम्पूर्ण पदार्थोंका सर्वथा त्याग नहीं किया जाता, तबतक यह अहंकार बना रहता है । यदि विवेकपूर्वक विचार-बुद्धिसे सबका परित्याग करके तुम निश्चल होकर स्थित हो जाओ तो अहंकारका अभाव होकर तुम परमपद-स्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाओगे । यदि तुम्हारे सम्पूर्ण राजचिह्न आदि विक्षेपोंका त्याग हो जाय, यदि तुम भयने रहित हो जाओ, यदि तुम समस्त धनादिकी इच्छाओंका त्याग कर दो, यदि तुम शत्रुओंके लिये ही सम्पूर्ण ऐश्वर्यका त्याग करके और अकिञ्चनभावको प्राप्तकर अहंभावसे निवृत्त हो जाओ, यदि तुम अपने देहके अभिमानसे रहित होकर उन सब शत्रुओंमें ही भिक्षाटन करने लगो तो तुम उच्च-से-उच्च स्थितिको प्राप्त होकर परमपदरूप परमात्माको प्राप्त हो जाओगे ।
( सर्ग ७४ )
राजा भगीरथका सर्वस्वत्याग, भिक्षाटन और गुरु त्रितलके साथ निवास, भगीरथको पुनः राज्यप्राप्ति और ब्रह्मा, रुद्र आदिको आराधना करनेसे गङ्गाजीका भूतलपर अवतरण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तदनन्तर उन गुरुजीके मुखसे इस प्रकारका उपदेश सुनकर राजा भगीरथ मनमें कर्तव्य निश्चित कर उसके अनुष्ठानमें तत्पर हो गया । कुछ ही दिन व्यतीत होनेपर राजा भगीरथने एकमात्र सर्वत्यागकी सिद्धिके लिये अग्निष्टोम यज्ञका अनुष्ठान किया । उसमें उसने ब्राह्मणों तथा अपने बन्धुओंको गौ, पृथ्वी, घोड़े, सुवर्ण आदि समस्त धन दे दिया । तदनन्तर उसने सम्पूर्ण धनसे खाली तथा चिन्तामग्न मन्त्री, नागरिक, प्रजा आदिसे युक्त अपने राज्यको तृणके समान समझकर सीमाके पासके अपने शत्रुको दे दिया । जब महल, मण्डल एवं राज्यपर शत्रुने अधिकार कर लिया, तब मननदीन राजा भगीरथ एकमात्र कटिवस्त्र धारण किये अपने मण्डलसे निकल गया । अपने मण्डलसे निकलकर धैर्यवान् राजा भगीरथने अपनी राजधानीसे बहुत दूरके गाँवों और वनोंमें निवास किया, जहाँ लोग उसके नाम-रूपको नहीं पहचान सकते थे । इस प्रकार व्यवहार करते हुए राजा थोड़े ही समयमें समस्त एषणाओंसे रहित हो उत्तम उपरतिके कारण परमात्मामें परम विश्रामको प्राप्त हो गया ।
किसी समय राजा भगीरथ घूमता हुआ अपने नगरमें ही चला आया और वहाँ उसने अनेक घरों, नागरिकों और मन्त्रियोंसे भिक्षाकी याचना की । उन नागरिकों और मन्त्रियोंने राजा भगीरथको पहचान लिया और उन विषादयुक्त लोगोंने पूजन-सामग्रीसे विधिवत उसकी पूजा की
४३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
'प्रभो! आप अपना राज्य ले लीजिये, इस प्रकार शत्रु-द्वारा प्रार्थना किये जानेपर भी उस मननशील राजाने, जिसने सर्वत्याग कर दिया था, भोजनके सिवा तृणमात्र भी ग्रहण नहीं किया। कुछ दिन वहींपर बिताकर वह अन्यत्र चला गया। लोगोंने उस समय 'क्या ये ही भगीरथ राजा हैं? ये ही हमलोगोंको छोड़कर चले गये? अहो! महान् कष्ट है।' इस प्रकार उसके विषयमें शोक किया। तदनन्तर दूसरे स्थानोंमें विचरण करते हुए शान्तचित्त, स्थिरबुद्धि एवं परम सुखी वह नरेश किसी समय अपने आत्माराम त्रितल नामक गुरुके पास गया। प्रणाम आदिसे अपने गुरुका स्वागत-सत्कार करके उनके साथ कुछ कालतक पर्वत, वन, गाँव और नगरमें तथा अनेक सत्पुरुषोंके बीच निवास किया। वे दोनों उत्तम मुनि अपने पूर्वकृत कर्मोंके फलस्वरूप प्राप्त हुए सुख और दुःख, दोनोंका आदर करते थे। वे समस्त इच्छाओंसे रहित थे और सबके भी समरूप सच्चिदानन्द ब्रह्ममें एकरस होकर परम शान्तिको प्राप्त हो गये थे।
किसी एक अन्य देशमें विद्यमान उत्तम नगरमें पुत्र-रहित राजाकी मृत्यु हो गयी थी। शासकके अभावके कारण जिनके देशकी प्रजा-पालन-मर्यादा नष्ट हो चुकी थी, उस देशके उदास मन्त्री आदि प्रजावर्ग प्रजा-पालनयोग्य उदार गुण-लक्ष्मीसे युक्त किसी एक सुन्दर राजाकी खोजमें थे। वे मन्त्री आदि प्रजावर्ग भिक्षाचर्यामें रत, विरक्त, तपस्वी भगीरथ मुनिके पास पहुँचे। वे उनको प्रजापालन-योग्य समस्त शुभ गुणोंसे युक्त जानकर आदर-सत्कार-पूर्वक ले आये और उनको सेनासहित गन्धपपर अभिषिक्त करके राजा बना दिया। तदोत्तर उस राज्यका परिपालन करते हुए राजा भगीरथके पास पहले आदर पाये हुए कोशल देशके मन्त्री, पुरोहित आदि प्रजावर्ग भी आये और राजाधिराज भगीरथसे यों कहने लगे।
प्रजावर्गने कहा—राजन् ! अयोध्याका राज्य छोड़ते समय आपने सीमाके पासमें स्थित अपने जिस शत्रु राजाको राज्यदानसे पुरस्कृत किया था, उसको मृत्युने निगल लिया है। इस कारण अपने पूर्वराज्यकी रक्षा करनेकी
निर्वाण-प्रकरण पू०] * शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ * ४३७
आप दया कीजिये। बिना इच्छाके प्राप्त हुए राज्यका त्याग करना उचित नहीं।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! इस प्रकार प्रजावर्गके प्रार्थना करनेपर राजा भगीरथने उनकी बात मान ली और वे सात समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीके स्वामी हो गये। राजा भगीरथ सर्वत्र समभाव रखनेवाले, शान्तचित्त, मननशील, वीतराग एवं मत्सर-रहित थे। जिन्होंने अश्वका अन्वेषण करनेके लिये भूमि खोदकर सागरके सदृश गर्त निर्माण किया था और जो कपिलकी क्रोधाग्निसे पातालतलमें भस्मीभूत हो चुके थे, उन अपने पितामहोंको तारनेमें गङ्गाजल ही समर्थ है, जब यह बात राजाने सुनी; तब भूतलपर गङ्गाजीको लानेके लिये जितेन्द्रिय पृथ्वी-पति भगीरथ मन्त्रियोंके सिरपर समस्त राज्यभार छोड़कर तपके लिये निर्जन अरण्यमें चले गये। उस अरण्यमें हजार वर्षतक ब्रह्माजी, शंकरजी और जह्नु मुनिकी बार-बार आराधना करके वे इस पृथ्वीतलपर गङ्गाजीको ले आये। तभीसे ये पुण्यतोया त्रिपथगा गङ्गाजी, जो निर्मल तरङ्ग-मालाओंसे रक्षित जगत्पति शशिभूषण शिवजीके मस्तकमें सुशोभित तथा महात्माओंके महान् पुण्योंकी राशि हैं, आकाशतलसे पृथ्वीपर गिरती हैं। चञ्चल तरङ्गमालाओंसे सुशोभित, अपने फेनपुञ्जरूप हाससे युक्त, प्रसन्न पुण्यरूपा मञ्जरीसे समन्वित तथा धर्मकी संततिस्वरूप यह त्रिमार्गगामिनी गङ्गा उसी समयसे इस पृथ्वी-पर पृथ्वीपति भगीरथकी समुद्रपर्यन्त कीर्ति विस्तार करनेके लिये एक तरहकी वीथिका ही बन गयी हैं। (सर्ग ७५-७६)
शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ, शिखिध्वजके गुणोंका तथा चूडालाके साथ विवाह और क्रीडाका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन! अब तुम अविचल राजा शिखिध्वजकी तरह शान्तिपूर्वक अपने स्वरूपमें स्थित रहो।
श्रीरामजीने पूछा—महान्! यह शिखिध्वज कौन था और उसने परमपद कैसे प्राप्त किया? गुरुवर! उसका चरित्र मुझसे कहिये, जिससे मैं उसे अच्छी प्रकार जान सकूँ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम! अतीतकालीन सातवें मन्वन्तरकी चतुर्थ चतुर्युगीके द्वापर युगमें कुरुवंशमें इसी महासर्गमें शिखिध्वज नामका राजा हुआ था। जम्बूद्वीपमें प्रसिद्ध विन्ध्याचलके समीपवर्ती मालवदेशकी उज्जयिनी नगरीमें वह राजा राज्य करता था। वह धैर्य, औदार्य आदि गुणोंसे युक्त था। उसमें क्षमा, शम, दम विद्यमान थे। वह वीरतासे पूर्ण था। शुभ कर्मोंके अनुष्ठानमें लगा रहता था। मितभाषी था। इस प्रकार वह अनेक गुणोंका खजाना था। समस्त यज्ञोंका निरन्तर अनुष्ठान
४३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
करता था। उसने बड़े-बड़े धनुर्धारियोंको जीत लिया था। वह लोकोपयोगी शुभकार्योंको करता था और पृथ्वीका पालन करता था। वह कोमल, स्निग्ध और मधुर स्वभाववाला दक्ष तथा प्रेमका समुद्र-सा था । वह सुन्दर, शान्त, भाग्यवान्, प्रतापी और धर्मवत्सल था। वह विनययुक्त वाक्योंका प्रयोग करता था तथा याचकोंको सभी प्रकारके पदार्थ देता था। वह उत्तम पदार्थोंका भोक्ता, सत्सङ्गसे युक्त और समस्त वेद-शास्त्रोंका उत्तम श्रोता था। वह शिखिध्वज सब बातोंको जानते हुए भी जानकारीके अभिमानसे रहित था, स्त्री-व्यसन आदिका तो उसने तृणवत् त्याग कर दिया था। बाल्यकालमें ही उसके पिता स्वर्ग चल दिये थे। उसके बाद अपने बाहुबलसे उस जितेन्द्रिय शिखिध्वजने सोलह वर्षतक स्वयं ही दिग्विजय करके अखिल भूमण्डलको अपनी साम्राज्य-सम्पत्तिमें परिणत कर दिया । तदनन्तर निःशङ्क होकर धर्मसे प्रजाका पालन करते हुए वे बुद्धिमान् राजा शिखिध्वज मन्त्रियोंके साथ अपने यशसे दिशाओंको उज्ज्वल करते हुए स्थित थे।
जब वे युवा हो गये, तब उन्होंने अनेक वन और उपवनोंमें, लीला-सरोवरोंमें, लतागृहोंमें तथा विविध भूमियोंमें विचरण किया । उन्होंने वन और उपवनके गुण-वर्णनसे युक्त शृङ्गाररससे परिपूर्ण कथाओंमें रस लिया तथा सुवर्ण-कलशके सदृश स्तनवाली, हारसे सुशोभित शरीर तथा चञ्चल केशोंसे युक्त कुमारियोंका मनसे आदर किया । चतुर मन्त्रियोंने राजाका अभिप्राय जान लिया । तदनन्तर राजाके विवाहके लिये विचार करके मन्त्रियोंने सौराष्ट्रदेशके राजासे युवती कन्याकी याचना की । राजा शिखिध्वजने नवीन यौवनसे सम्पन्न तथा अपने अनुरूप उस उत्तम कन्याके साथ विधिपूर्वक विवाह किया । राजा शिखिध्वजकी पत्नी संसारमें चूडाला नामसे विख्यात थी । वह भी अपने अनुरूप पति प्राप्तकर प्रफुल्लित हो रही थी । राजा शिखिध्वज नील कमलके सदृश नेत्रवाली उस चूडालाको स्नेहसे प्रसन्न रखते थे । एक दूसरेके प्रति अर्पित चित्तवाले उन दोनोंकी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती थी । हाव, भाव, विलास आदि शृङ्गारमयी चेष्टाविशेषोंसे परिपूर्ण अङ्गोंके कारण वह चूडाला सुन्दर नवीन लताके समान शोभित हो रही थी । शिखिध्वज राजाको मन्त्रियोंद्वारा सभी उपभोग-सामग्री समयानुसार समर्पित की जाती थी । उसकी प्रजा सुव्यवस्थित थी । परम सुखी वह राजा कमलिनीके साथ राजहंसके सदृश उस प्रियतमाके साथ रमण करता था । वे दोनों निरन्तर एक दूसरेसे मिले हुए थे । एक दूसरेकी चेष्टाएँ उन्हें प्रिय लगती थीं । एक दूसरेसे शिक्षाग्रहण करनेके कारण वे दोनों सम्पूर्ण कलाओंके ज्ञाता हो गये थे । परस्पर अत्यन्त मित्रताको प्राप्त हुए वे दोनों एकदूसरेके हृदयमें