भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 472

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सांख्ययोग और अष्टाङ्गयोगके द्वारा परम-पदकी प्राप्ति * ४२९


चार प्रकारका मौन और उनमेंसे जीवन्मुक्त ज्ञानीके सुषुप्त मौनकी श्रेष्ठता

इसके अनन्तर भिक्षु आख्यानका वर्णन करके श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मुनिवरोंने दो तरहके मुनि बतलाये हैं—एक काष्ठतपस्वी और दूसरा जीवन्मुक्त। परमात्माकी भावनासे रहित शुष्क क्रियामें बद्धनिश्चय और हठसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंको जीत रखनेवाला मुनि काष्ठमौनी कहा गया है । इस विनाशशील संसारके स्वरूपको यथार्थरूपसे जानकर जो विशुद्धात्मा और परमात्ममें स्थित ज्ञानी महात्मा बाहर न्याययुक्त लौकिक व्यवहार करता हुआ भी भीतर विज्ञानानन्दघन परमात्मामें तृप्त रहता है, वह जीवन्मुक्त मुनि कहा गया है । मौनको जाननेवाले मुनियोंने मौनके चार भेद बतलाये हैं—वाङ्मौन, इन्द्रियमौन, काष्ठमौन और सुषुप्तमौन । वाणीका निरोध वाङ्मौन, हठपूर्वक विषयोंसे इन्द्रियोंका निग्रह इन्द्रियमौन और सम्पूर्ण चेष्टाओंका त्याग काष्ठमौन कहलाता है । एवं परमात्माके स्वरूपानुभवमें जो जीवन्मुक्त निरन्तर लगा रहता है, उसके मौनको सुषुप्तमौन कहते हैं । काष्ठमौनमें वाङ्मौन आदि तीनों मौनोंका अन्तर्भाव है और सुषुप्तमौनावस्थामें जो तुर्यावस्था है, वही जीवन्मुक्तोंकी स्थिति है । ऊपर जो तीन प्रकारका मौन कहा गया है, वह प्रस्फुरित हुए चित्तका चलन ही है। अतएव ये तीनों मौन उपादेय नहीं वरं त्याज्य हैं। किंतु इन तीनोंसे भिन्न चौथा जो सुषुप्तमौन है, वह जीवन्मुक्तोंकी स्थिति है। इसमें स्थित जीवात्माका पुनर्जन्म नहीं होता । इसमें सम्पूर्ण इन्द्रिय-वृत्तियाँ अनुकूलमें तो हर्षित नहीं होतीं और प्रतिकूलमें घृणा नहीं करतीं । जो विभागरहित, अभ्यासरहित एवं आदि और अन्तसे रहित है तथा जो ध्यान करते हुए या ध्यान न करते हुए सभी अवस्थाओंमें समभावसे स्थित है, वही सुषुप्तमौन कहा जाता है । अनेक प्रकारके विभ्रमयुक्त संसारके और परमात्माके तत्त्वको यथार्थरूपसे जाननेपर जो संदेहरहित स्थिति होती है, वही सुषुप्त मौन है। जो सर्वशून्य, आलम्बन रहित, शान्तिस्वरूप, विज्ञानमात्र तथा सत्-असत्से रहित स्थिति है, वह उत्तम सुषुप्त मौन कही गयी है । इस जगत्में विकार-रहित, सर्वात्मक तथा सत्ता-सामान्यस्वरूप परमात्मा मैं ही हूँ—इस तरहकी ज्ञानावस्थाको सौषुप्तमौन कहते हैं । ब्रह्मभूत श्रीरामभद्र ! जाग्रदवस्थामें सब ओर भलीभाँति व्यवहार करता हुआ अथवा सम्पूर्ण व्यवहारोंको छोड़कर समाधिमें स्थित हुआ जीवन्मुक्त देहयुक्त होनेपर भी सम्पूर्ण निर्मल शान्तिवृत्तिसे युक्त तुरीयावस्थामें ही स्थित एवं विदेहस्वरूप ही है ।

( सर्ग ६२--६८ )


सांख्ययोग और अष्टाङ्गयोगके द्वारा परमपदकी प्राप्ति

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जड आकाशसे भी अत्यन्त स्वच्छ चेतनस्वरूप परमात्माकाश है और उस परमात्माकाशभावकी प्राप्ति ही परम श्रेय ( मोक्ष ) है। वह कैसे प्राप्त की जानी है, यह मैं बतलाता हूँ; सुनो। परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे और नित्य एकरस समाधिसे जो सांख्ययोगके द्वारा ज्ञानी हुए हैं, वे सांख्य-योगी कहे गये हैं । जो प्राणादि वायुओंके संयमपूर्वक अष्टाङ्गयोगके द्वारा अनामय, आदि-अन्तसे रहित परम-पदको प्राप्त हो गये हैं, वे योग-योगी कहे गये हैं। यह स्वाभाविक परम शान्त पद सभी योगियोंके लिये उपादेय है । कुछ लोग उस पदको सांख्ययोगद्वारा प्राप्त हो चुके हैं और कुछ लोग इसी देहने अष्टाङ्ग-योगके द्वारा प्राप्त हो चुके हैं। जो सांख्य और योगको एक समझता है, वही ठीक समझता है । क्योकि जो परमपद सांख्ययोगियोंद्वारा प्राप्त किया जाता है; वही अष्टाङ्गयोगियोंद्वारा भी प्राप्त किया जाना है । जहाँ प्राण, मनकी वृत्ति तथा वासणारूपी जाड्यता अत्यन्त अभाव है, उसीको परमपद समझो । वासनाको ही चित्त