भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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४२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ]


हुआ वह परब्रह्म परमात्मा सत्ता-सामान्य स्वरूपसे उसी तरह उनसे अभिन्न है, जैसे समुद्रगत कल्लोल, जलकण तथा लहरें जलसामान्यसे अभिन्न हैं। सबमें समान भावसे सत्त रूपमें व्यापक होनेके कारण वह परमात्मा ही सत्ता-सामान्य कहा गया है। श्रीराम! सत्य चिन्मय-स्वरूप इस परमात्माद्वारा कल्पित होनेके कारण इन पदार्थोंकी अनेकरूपता वैसे ही मिथ्या है, जिस प्रकार बालकद्वारा परछाईंमें कल्पित प्रेत।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! मुनि वसिष्ठके इतना कह चुकनेपर दिन बीत गया, सूर्य अस्ताचलको चले गये, सभासद्गण भी सायंकालिक कृत्य—स्नान, संध्योपासना आदि करनेके लिये मुनिको नमस्कार करके उठ गये और रात बीतनेपर सूर्यदेवकी किरणोंके साथ ही फिर दूसरे दिन सभामें प्रविष्ट हुए। (सर्ग ६०)


संसारके मिथ्यात्वका दिग्दर्शन तथा मोहसे जीवके पतनका कथन

श्रीरामजीने पूछा— मुने! जिस प्रकार हमलोगोंके लिये स्वप्नके नगर, राजधानियों तथा राज्य मिथ्या हैं, उसी प्रकार यदि ब्रह्मा आदिके लिये भी शरीर-धारण एवं उत्पन्न हुआ यह सम्पूर्ण जगत् मिथ्या ही है तो हमलोगोंको इसकी सत्यतामें अत्यन्त दृढ़ विश्वास क्यों होता है?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम! प्रजापतिने इस सृष्टिके पूर्व जो सृष्टि-रचना की थी, वह भी हमारे अनुभवमें आनेवाली वर्तमान सृष्टिके समान ही सत्य प्रतीत होती थी, तथापि वह ब्रह्माजीका संकल्प होनेके कारण वास्तविक न थी। इसी प्रकार यह सृष्टि भी वास्तविक नहीं है। सच्चिदानन्द परमात्माके सर्वव्यापी होनेसे जीव भी सर्वव्यापी है और उस परमात्माकी सत्तासे ही यह संसार सत्य-सा भासित होता है। किंतु वास्तवमें यह संसार अज्ञानसे उत्पन्न होता है और तत्त्वज्ञानसे नष्ट हो जाता है। श्रीराम! सोये हुए पुरुषको अपने तथा अन्य सभी पदार्थोंके रूपमें दीखनेवाला स्वप्न जैसे मिथ्या है, वैसे यह दृश्य संसार भी मिथ्या है। जो स्वप्नका संसार पुरुषसे उत्पन्न है, वह पुरुषका स्वरूप ही है—जैसे किसी बीजसे उत्पन्न वृक्षसहित फल बीजरूप ही है, यह बात भली प्रकार अनुभूत है। जो असत्यसे उत्पन्न होता है, उसे असत्य ही समझो। अतः स्वप्न-पुरुषसे उत्पन्न जो असत् पदार्थोंकी भावना है, वह दृढ़ सत्यरूपसे प्रतीत होनेपर भी असत्य ही है, इसलिये त्याग कर देने योग्य है। जैसे हमलोगोंको स्वप्नमें प्रतीत होनेवाला सृष्टि आदि कार्य दृढ़रूप (सत्य) दीखनेपर भी क्षणस्थायी (मिथ्या) ही होता है, उसी प्रकार सामने वर्तमान यह प्रजापतिके संकल्पसे रचित सृष्टि भी मिथ्या ही है। जैसे द्रवत्वके कारण आवर्तरूप परिवर्तनोंसे जल स्फुरित होता है, उसी प्रकार चिन्मय ब्रह्मके संकल्पसे यह सृष्टि स्फुरित हो रही है। जो देश और कालमें, क्रियाओंसें, द्रव्योंसे, मणियोंसे तथा संकल्पोंसे प्रकट हैं, ऐसे असंख्य पदार्थ गन्धर्व-नगरके सदृश (मिथ्या) होनेपर भी सत्यके समान प्रतीत होते हैं। इस संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो सत्य न हो; क्योंकि सब कुछ ब्रह्मका संकल्प होनेसे ब्रह्मका स्वरूप ही है एवं ब्रह्मका स्वरूप होनेसे सत्य ही है। साथ ही ऐसी कोई वस्तु भी नहीं है, जो असत्य न हो; क्योंकि सब कल्पनामात्र होनेसे असत्य ही है। जैसे स्वप्नमें निमग्न पुरुष स्वप्नकालमें वस्तुओंकी स्थिर स्थिति ही देखता है, उसी प्रकार इस सृष्टिमें जिस अज्ञानीकी बुद्धि निमग्न है, वह सब विषयोंकी स्थिर स्थिति ही देखता है, किंतु यह सृष्टि वास्तवमें स्वप्नवत् कल्पनामात्र है। संसारको अत्यन्त स्थिर समझनेवाला यह जीव एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें प्रवेश करनेवालेकी तरह मोहके कारण एक भ्रमसे दूसरे भ्रममें पड़ जाता है। (सर्ग ६१)

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