संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
४२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ]
हुआ वह परब्रह्म परमात्मा सत्ता-सामान्य स्वरूपसे उसी तरह उनसे अभिन्न है, जैसे समुद्रगत कल्लोल, जलकण तथा लहरें जलसामान्यसे अभिन्न हैं। सबमें समान भावसे सत्त रूपमें व्यापक होनेके कारण वह परमात्मा ही सत्ता-सामान्य कहा गया है। श्रीराम! सत्य चिन्मय-स्वरूप इस परमात्माद्वारा कल्पित होनेके कारण इन पदार्थोंकी अनेकरूपता वैसे ही मिथ्या है, जिस प्रकार बालकद्वारा परछाईंमें कल्पित प्रेत।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! मुनि वसिष्ठके इतना कह चुकनेपर दिन बीत गया, सूर्य अस्ताचलको चले गये, सभासद्गण भी सायंकालिक कृत्य—स्नान, संध्योपासना आदि करनेके लिये मुनिको नमस्कार करके उठ गये और रात बीतनेपर सूर्यदेवकी किरणोंके साथ ही फिर दूसरे दिन सभामें प्रविष्ट हुए। (सर्ग ६०)
संसारके मिथ्यात्वका दिग्दर्शन तथा मोहसे जीवके पतनका कथन
श्रीरामजीने पूछा— मुने! जिस प्रकार हमलोगोंके लिये स्वप्नके नगर, राजधानियों तथा राज्य मिथ्या हैं, उसी प्रकार यदि ब्रह्मा आदिके लिये भी शरीर-धारण एवं उत्पन्न हुआ यह सम्पूर्ण जगत् मिथ्या ही है तो हमलोगोंको इसकी सत्यतामें अत्यन्त दृढ़ विश्वास क्यों होता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम! प्रजापतिने इस सृष्टिके पूर्व जो सृष्टि-रचना की थी, वह भी हमारे अनुभवमें आनेवाली वर्तमान सृष्टिके समान ही सत्य प्रतीत होती थी, तथापि वह ब्रह्माजीका संकल्प होनेके कारण वास्तविक न थी। इसी प्रकार यह सृष्टि भी वास्तविक नहीं है। सच्चिदानन्द परमात्माके सर्वव्यापी होनेसे जीव भी सर्वव्यापी है और उस परमात्माकी सत्तासे ही यह संसार सत्य-सा भासित होता है। किंतु वास्तवमें यह संसार अज्ञानसे उत्पन्न होता है और तत्त्वज्ञानसे नष्ट हो जाता है। श्रीराम! सोये हुए पुरुषको अपने तथा अन्य सभी पदार्थोंके रूपमें दीखनेवाला स्वप्न जैसे मिथ्या है, वैसे यह दृश्य संसार भी मिथ्या है। जो स्वप्नका संसार पुरुषसे उत्पन्न है, वह पुरुषका स्वरूप ही है—जैसे किसी बीजसे उत्पन्न वृक्षसहित फल बीजरूप ही है, यह बात भली प्रकार अनुभूत है। जो असत्यसे उत्पन्न होता है, उसे असत्य ही समझो। अतः स्वप्न-पुरुषसे उत्पन्न जो असत् पदार्थोंकी भावना है, वह दृढ़ सत्यरूपसे प्रतीत होनेपर भी असत्य ही है, इसलिये त्याग कर देने योग्य है। जैसे हमलोगोंको स्वप्नमें प्रतीत होनेवाला सृष्टि आदि कार्य दृढ़रूप (सत्य) दीखनेपर भी क्षणस्थायी (मिथ्या) ही होता है, उसी प्रकार सामने वर्तमान यह प्रजापतिके संकल्पसे रचित सृष्टि भी मिथ्या ही है। जैसे द्रवत्वके कारण आवर्तरूप परिवर्तनोंसे जल स्फुरित होता है, उसी प्रकार चिन्मय ब्रह्मके संकल्पसे यह सृष्टि स्फुरित हो रही है। जो देश और कालमें, क्रियाओंसें, द्रव्योंसे, मणियोंसे तथा संकल्पोंसे प्रकट हैं, ऐसे असंख्य पदार्थ गन्धर्व-नगरके सदृश (मिथ्या) होनेपर भी सत्यके समान प्रतीत होते हैं। इस संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो सत्य न हो; क्योंकि सब कुछ ब्रह्मका संकल्प होनेसे ब्रह्मका स्वरूप ही है एवं ब्रह्मका स्वरूप होनेसे सत्य ही है। साथ ही ऐसी कोई वस्तु भी नहीं है, जो असत्य न हो; क्योंकि सब कल्पनामात्र होनेसे असत्य ही है। जैसे स्वप्नमें निमग्न पुरुष स्वप्नकालमें वस्तुओंकी स्थिर स्थिति ही देखता है, उसी प्रकार इस सृष्टिमें जिस अज्ञानीकी बुद्धि निमग्न है, वह सब विषयोंकी स्थिर स्थिति ही देखता है, किंतु यह सृष्टि वास्तवमें स्वप्नवत् कल्पनामात्र है। संसारको अत्यन्त स्थिर समझनेवाला यह जीव एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें प्रवेश करनेवालेकी तरह मोहके कारण एक भ्रमसे दूसरे भ्रममें पड़ जाता है। (सर्ग ६१)
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सांख्ययोग और अष्टाङ्गयोगके द्वारा परम-पदकी प्राप्ति * ४२९
चार प्रकारका मौन और उनमेंसे जीवन्मुक्त ज्ञानीके सुषुप्त मौनकी श्रेष्ठता
इसके अनन्तर भिक्षु आख्यानका वर्णन करके श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मुनिवरोंने दो तरहके मुनि बतलाये हैं—एक काष्ठतपस्वी और दूसरा जीवन्मुक्त। परमात्माकी भावनासे रहित शुष्क क्रियामें बद्धनिश्चय और हठसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंको जीत रखनेवाला मुनि काष्ठमौनी कहा गया है । इस विनाशशील संसारके स्वरूपको यथार्थरूपसे जानकर जो विशुद्धात्मा और परमात्ममें स्थित ज्ञानी महात्मा बाहर न्याययुक्त लौकिक व्यवहार करता हुआ भी भीतर विज्ञानानन्दघन परमात्मामें तृप्त रहता है, वह जीवन्मुक्त मुनि कहा गया है । मौनको जाननेवाले मुनियोंने मौनके चार भेद बतलाये हैं—वाङ्मौन, इन्द्रियमौन, काष्ठमौन और सुषुप्तमौन । वाणीका निरोध वाङ्मौन, हठपूर्वक विषयोंसे इन्द्रियोंका निग्रह इन्द्रियमौन और सम्पूर्ण चेष्टाओंका त्याग काष्ठमौन कहलाता है । एवं परमात्माके स्वरूपानुभवमें जो जीवन्मुक्त निरन्तर लगा रहता है, उसके मौनको सुषुप्तमौन कहते हैं । काष्ठमौनमें वाङ्मौन आदि तीनों मौनोंका अन्तर्भाव है और सुषुप्तमौनावस्थामें जो तुर्यावस्था है, वही जीवन्मुक्तोंकी स्थिति है । ऊपर जो तीन प्रकारका मौन कहा गया है, वह प्रस्फुरित हुए चित्तका चलन ही है। अतएव ये तीनों मौन उपादेय नहीं वरं त्याज्य हैं। किंतु इन तीनोंसे भिन्न चौथा जो सुषुप्तमौन है, वह जीवन्मुक्तोंकी स्थिति है। इसमें स्थित जीवात्माका पुनर्जन्म नहीं होता । इसमें सम्पूर्ण इन्द्रिय-वृत्तियाँ अनुकूलमें तो हर्षित नहीं होतीं और प्रतिकूलमें घृणा नहीं करतीं । जो विभागरहित, अभ्यासरहित एवं आदि और अन्तसे रहित है तथा जो ध्यान करते हुए या ध्यान न करते हुए सभी अवस्थाओंमें समभावसे स्थित है, वही सुषुप्तमौन कहा जाता है । अनेक प्रकारके विभ्रमयुक्त संसारके और परमात्माके तत्त्वको यथार्थरूपसे जाननेपर जो संदेहरहित स्थिति होती है, वही सुषुप्त मौन है। जो सर्वशून्य, आलम्बन रहित, शान्तिस्वरूप, विज्ञानमात्र तथा सत्-असत्से रहित स्थिति है, वह उत्तम सुषुप्त मौन कही गयी है । इस जगत्में विकार-रहित, सर्वात्मक तथा सत्ता-सामान्यस्वरूप परमात्मा मैं ही हूँ—इस तरहकी ज्ञानावस्थाको सौषुप्तमौन कहते हैं । ब्रह्मभूत श्रीरामभद्र ! जाग्रदवस्थामें सब ओर भलीभाँति व्यवहार करता हुआ अथवा सम्पूर्ण व्यवहारोंको छोड़कर समाधिमें स्थित हुआ जीवन्मुक्त देहयुक्त होनेपर भी सम्पूर्ण निर्मल शान्तिवृत्तिसे युक्त तुरीयावस्थामें ही स्थित एवं विदेहस्वरूप ही है ।
( सर्ग ६२--६८ )
सांख्ययोग और अष्टाङ्गयोगके द्वारा परमपदकी प्राप्ति
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जड आकाशसे भी अत्यन्त स्वच्छ चेतनस्वरूप परमात्माकाश है और उस परमात्माकाशभावकी प्राप्ति ही परम श्रेय ( मोक्ष ) है। वह कैसे प्राप्त की जानी है, यह मैं बतलाता हूँ; सुनो। परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे और नित्य एकरस समाधिसे जो सांख्ययोगके द्वारा ज्ञानी हुए हैं, वे सांख्य-योगी कहे गये हैं । जो प्राणादि वायुओंके संयमपूर्वक अष्टाङ्गयोगके द्वारा अनामय, आदि-अन्तसे रहित परम-पदको प्राप्त हो गये हैं, वे योग-योगी कहे गये हैं। यह स्वाभाविक परम शान्त पद सभी योगियोंके लिये उपादेय है । कुछ लोग उस पदको सांख्ययोगद्वारा प्राप्त हो चुके हैं और कुछ लोग इसी देहने अष्टाङ्ग-योगके द्वारा प्राप्त हो चुके हैं। जो सांख्य और योगको एक समझता है, वही ठीक समझता है । क्योकि जो परमपद सांख्ययोगियोंद्वारा प्राप्त किया जाता है; वही अष्टाङ्गयोगियोंद्वारा भी प्राप्त किया जाना है । जहाँ प्राण, मनकी वृत्ति तथा वासणारूपी जाड्यता अत्यन्त अभाव है, उसीको परमपद समझो । वासनाको ही चित्त
४३० * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
कहते हैं। वही संसारका कारण है। वह चित्त सांख्य या योग दोनोंमेंसे किसी एक साधनके द्वारा विलीन होकर संसारकी निवृत्तिका कारण हो जाता है । यह संसार मनके संकल्पसे उत्पन्न हुआ है । उससे उत्पन्न ममता, अहंता, संसृति, उपदेश्य-उपदेशादि, बन्ध और मोक्षकी सत्ता ही कहाँ है अर्थात् सब संकल्पमात्र हैं। एक विज्ञानानन्दघन परमार्थ-तत्त्वका दृढ़ अभ्यास, प्राणोंका विलीन होना तथा मनोनाश—यही 'मोक्ष' शब्दके अर्थका संग्रह है यानी ये ही मोक्षके साधन हैं।
श्रीराम ! इन तीनो उपायोंमें मनोनाशको ही मुख्य साध्य जानो । मनोविनाश जितना ही शीघ्र होगा उतना ही शीघ्र कल्याण होगा। परमात्माके यथार्थज्ञानसे सभी पदार्थोंका अभाव हो जाता है, जिससे वासनाका विनाश होनेपर प्राण और चित्तका वियोग हो जाता है । फिर भलीभाँति शान्त हुआ मन देहरूपताको नहीं प्राप्त होता । मनके विनाशसे ही जीवात्माको परमपदकी प्राप्ति होती है, अतः मुनिगण वासनाको ही मन जानते हैं । चित्तका स्वरूप केवल वासना ही है । उस चित्तका अभाव होनेपर परमपद प्राप्त हो जाता है । रामभद्र ! रज्जुमें सर्पभ्रमके सदृश मिथ्यारूप इस संसारका स्वयं ही विवेकज्ञानसे अच्छी तरह विनाश हो जाता है । एक विज्ञानानन्दघन परमार्थ-तत्त्वका दृढ़ अभ्यास, प्राणनिरोध और मनोविनाश—ये जो तीन उपाय हैं, इनमेंसे किसी एककी सिद्धि हो जानेपर ही दूसरे भी परस्पर सिद्ध हो जाते हैं। ताड़के पत्तोंसे निर्मित पंखेको चलाना जब बंद कर दिया जाता है तब पवन जैसे अपने-आप शान्त हो जाता है, वैसे ही जब प्राणरूप वायुका स्पन्दन शान्त हो जाता है, तब मन भी अपने-आप शान्त हो जाता है। जैसे वायुका चलना रुक जानेपर गन्धका प्रसार भी रुक जाता है, वैसे ही मनका चलना रुक जानेपर प्राण-वायुओंका चलना भी रुक जाता है । सभी प्राणियोंके प्राण और चित्त दोनों उसी प्रकार एक दूसरेसे निरन्तर मिले-जुले रहते हैं, जिस प्रकार पुष्प और गन्ध एवं तिल और तेल एक दूसरेसे निरन्तर मिले-जुले रहते हैं । आधार और आधेयके समान अर्थात् अग्नि और उष्णताके समान दोनोंमेंसे किसी एकका विनाश हो जानेपर दोनों विनष्ट हो जाते हैं और अपने विनाशके द्वारा वे दोनों जीवात्माके लिये एक महान् मोक्षनामक कार्य सम्पन्न कर देते हैं । एक ब्रह्मतत्त्वके दृढ़ अभ्याससे द्वैत-वासनासे रहित होकर मन शान्त हो जाता है और इससे प्राण भी शान्त हो जाता है; क्योंकि प्राणका स्वभाव मनके साथ विलीन हो जाना ही है । मनुष्यको एक शुद्ध परमात्मतत्त्वमें तबतक तदाकारवृत्ति बनाये रखनी चाहिये, जबतक उस वृत्तिका ही अभ्यासके द्वारा अभाव न हो जाय । क्योंकि निग्रहवृत्तिसे युक्त पुरुषोंका चित्त स्वयं ही प्राणोंके साथ विलीन हो जाता है और परमतत्त्व अवशिष्ट रह जाता है । चित्त जिस किसी वस्तुमें तन्मय हो जाता है, वह शीघ्र तद्रूप ही बन जाता है; अतः दीर्घकालतक परमात्मतत्त्वके अभ्यासमे वह समस्त विशेषोंसे मुक्त होकर निर्विशेष ब्रह्मरूप ही हो जाता है । श्रीराम ! यदि परमपदमें चित्त मुहूर्तमात्र भी विश्रामको प्राप्त हो जाय तो उसे तुम ब्रह्मरूपमें ही परिणत हुआ समझो । जिसमे अविद्याका अभाव हो चुका है, ऐसा विशुद्ध चित्त 'सत्त्व'शब्दसे कहा जाता है। जिसमें संसारकी बीजरूपा वासना दग्ध हो गयी है, वह चित्त फिर कभी ब्रह्मरूपतासे अलग नहीं होता; क्योंकि वह ब्रह्ममें तद्रूप हो गया है । जिसकी अविद्या निवृत्त हो चुकी है, जो सत्त्वभावमें स्थित है, जो वासनारहित हो चुका है, ऐसा कोई विरला मनुष्य आकाशके समान निर्गुण-निराकार विज्ञानानन्दघन परमतत्त्वको देखता है और तत्काल मुक्त हो जाता है ।
(सर्ग ६९)
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * बेताल और राजाका संवाद * ४३१
बेताल और राजाका संवाद
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिस अवस्थामें जीव ब्रह्म हो जाता है और चित्तका विनाश हो जाता है तथा विवेकपूर्वक विचारसे अविद्याका अन्त—अभाव हो जाता है, वही जीवात्माका मोक्ष कहा जाता है। मृगतृष्णा-जलकी तरह मिथ्या मन तथा अहंता आदि प्रपञ्च क्षणभरके लिये ही प्रतीत होते हैं और पूर्वोक्त विवेकपूर्वक विचारसे विलीन हो जाते हैं । भद्र ! इस संसाररूपी स्वप्न-विभ्रमके सम्बन्धमें बेतालद्वारा किये गये इन शुभ प्रश्नोंको तुम सुनो, जो मुझे प्रसङ्गवश स्मरण हो आये हैं । विन्ध्याचलके महान् वनमें एक विशालकाय वेताल रहता था । किसी समय वह गर्वमें भरकर प्राणियोंको मार डालनेकी इच्छासे किसी नगरमें गया । पहले वह वेताल किसी एक सज्जन नामक राजाके देशमें रहता था । उस राजाद्वारा किये गये अनेक वधके योग्य मनुष्योंकी बलिके उपहारसे सदा तृप्त होकर वह सुखसे रहता था । सामने आये हुए निरपराधी मनुष्यको वह भूखसे पीड़ित होनेपर भी अकारण नहीं मारता था; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष न्यायके ही पक्षपाती होते हैं । किसी समय न्यायोचित भक्ष्य न मिलनेके कारण अरण्यवासी वह बेताल क्षुधासे प्रेरित होकर न्यायप्राप्त मनुष्यका भक्षण करनेके लिये नगरके भीतर चला गया । उस नगरमें प्रजा-रक्षाके लिये रात्रिमें विचरण करता हुआ राजा उसे मिला । उस राजासे यह उग्र निशाचर भयंकर शब्दोंमें कहने लगा ।
वेतालने कहा—राजन् ! इस समय मुझ भयंकर वेतालके द्वारा तुम पकड़ लिये गये हो । कहाँ जा रहे हो ! अब तुम मर चुके । आज तुम-मेरे भोजन बन जाओ ।
राजाने कहा—निशाचर ! यदि तुम यहाँ बलपूर्वक अन्यायमार्गसे मुझे खा जाओगे तो निश्चय ही तुम्हारे मस्तकके हजारों टुकड़े हो जायेंगे ।
वेतालने कहा—राजन् ! मैं तुम्हें अन्यायपूर्वक नहीं खाऊँगा; परंतु तुम्हें मैं यह न्याय बतलाता हूँ कि तुम राजा हो, इसलिये तुम्हें अर्थियोंके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करने चाहिये । मेरी इस याचनाको, जो पूर्ण करने योग्य है, तुम पूर्ण करो । मैं यहाँ तुमसे जो प्रश्न कर रहा हूँ, इनका भलीभाँति उत्तर दो । राजन् ! किस सूर्यकी किरणोंके ये ब्रह्माण्डरूपी छोटे अणु हैं और किस पवनमें महागगनरूपी त्रसरेणु स्फुरित होते हैं ! एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें जाता हुआ जीवात्मा पहलेके सैकड़ों या हजारों स्वप्नोंके अस्तित्वको छोड़ता हुआ भी किस प्रकाशक स्वच्छ वास्तविक स्वरूपका परित्याग नहीं करता ? जिस प्रकार केलेका खंभा भीतरके भी
४३२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भीतर और उसके भी भीतर बार-बार देखनेसे केवल छिलकामात्र ही रहता है, उसी प्रकार सबके भीतर-के भीतर और उसके भी भीतर ऐसा कौन अणु है, जो प्रकाशक स्वच्छ आत्मस्वरूप है। ब्रह्माण्ड, आकाश, भूतोंके आधारभूत भुवन, सूर्यमण्डल तथा मेरु—ये सब जो बड़े-बड़े महान् पदार्थ प्रसिद्ध हैं—ये अणुत्व धर्म न छोड़नेवाले ऐसे किस अणुके परमाणु हैं ? किस अवयव-रहित परमाणुरूप महागिरिकी शिलाके भीतर ये भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों जगत् हैं ? दुष्ट राजन्! यदि तुम इन प्रश्नोंका उत्तर मुझे न दे सकोगे तो तुम्हें खाकर फिर तुम्हारे नगरके प्राणियोंको बलपूर्वक पकड़कर उन्हें यमराजकी तरह निगल जाऊँगा । ( सर्ग ७० )
वेतालकृत छः प्रश्नोंका राजाद्वारा समाधान
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रामभद्र ! जब ऐसा कहकर वेताल चुप हो गया, तब वह राजा हँसकर यह कहने लगा।
राजाने कहा—वेताल ! यह चराचर जगत्रूपी फल उत्तरोत्तर दशगुण पञ्चभूतोंकी परतसे घिरा हुआ है—अर्थात् इस जगत्के सब ओर पृथ्वीका घेरा है। उसके बाद पृथ्वीसे दसगुना जल, जलसे दसगुना तेज, तेजसे दस-गुना वायु और वायुसे दसगुना आकाश है। ऐसे हजारों फल जहाँ विद्यमान हैं, ऐसी बहुत ऊँची एक शाखा है। उस प्रकारकी बड़ी-बड़ी हजारो शाखाएँ जहाँ विद्यमान हैं, ऐसा बड़े आकारवाला एक महान् वृक्ष है । इसी प्रकारके हजारों वृक्ष जिसमें हैं, ऐसा एक वन है। उसी प्रकारके हजारों वन जहाँपर हैं, ऐसा उन्नत शिखरोंसे युक्त चारों ओरसे परिपूर्ण आकारवाला एक विशाल पर्वत है। जहाँपर वैसे हजारों पर्वत हैं, ऐसा अत्यन्त विस्तीर्ण विशाल खोहोंवाला एक देश है। वैसे हजारो देश जहाँपर विद्यमान हैं, ऐसा बड़े-बड़े हृद और नदियोंसे युक्त एक बहुत बड़ा द्वीप है। वैसे अनन्त द्वीप जिसमें हैं, ऐसी चित्र-विचित्र रचनाओंसे युक्त एक पृथ्वी है। उस प्रकारके हजारों पृथ्वीमण्डल जिसमें विद्यमान हैं, ऐसा एक अत्यन्त विस्तृत महान् भुवन है । उस तरहके असंख्य महान् भुवन जिसमें विद्यमान हैं, ऐसा विस्तृत आकाशके सदृश एक महान् प्रचण्ड ब्रह्माण्ड है। इस-इस तरहके असंख्य ब्रह्माण्ड जिसमें विद्यमान हैं ऐसा एक चञ्चलतारहित असीम जलनिधि है । उस तरहके लाखों सागर जिसमें कोमल तरङ्गरूप है, ऐसा एक अपने स्वरूपमें विश्राम करनेवाला निर्मल महार्णव है। उस प्रकारके हजारों महार्णव जिसके उदरके जलरूप हैं, ऐसा एक कोई बड़ा भारी परिपूर्णाकृति पुरुष है। ऐसे-ऐसे लाखों पुरुषोंकी माला जिसके वक्षःस्थलमें स्थित हैं, ऐसा एक परम पुरुष है, जो सब सत्ताओंका प्रधान है। इस प्रकारके असंख्य महापुरुष जिसके मण्डलमें स्फुरित हो रहे हैं, ऐसा एक महान् आदित्य है। ये सब कल्पनाएँ ही इस आदित्यरूप ब्रह्मकी रश्मियाँ हैं । ब्रह्माण्ड ही इस आदित्य ( ब्रह्म ) की दीप्तियोंके त्रसरेणु हैं । मैंने तुमसे जिस सूर्यका कथन किया था, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही वह सूर्य है; इसीके प्रभावसे सारा जगत् प्रकाशित होता है। वेताल ! पूर्वोक्त असंख्य पदार्थ जिससे प्रकाशित होते हैं, ऐसा विज्ञानस्वरूप परम सूर्य है और ये जो विस्तृत ब्रह्माण्ड हैं, वे उसी सूर्यकी किरणोंमें स्फुरित होनेवाले त्रसरेणु हैं । इस प्रकार यह तुम्हारे प्रथम प्रश्नका उत्तर दिया गया ।
वेताल ! कालकी सत्ता, आकाशकी सत्ता, जीवात्मा-की सत्ता तथा शुद्ध चेतन आत्माकी सत्ता—इत्यादि-सब सूक्ष्म होनेसे निर्दोष रज हैं । वे परमात्मारूपी महावायुमें कल्पित अनेक विकारोंसे चञ्चल होकर स्फुरित होते हैं। 'जगत्' नामक महास्वप्नमें एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें जाता हुआ जीवात्मा परम शान्तिको बढ़ानेवाले
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य * ९३३
अपने महान् शुद्ध आत्मस्वरूपको नहीं छोड़ता। जैसे केलेका खंभा ज्यों-ज्यों छीला जाता है त्यों-त्यों उसके भीतर-भीतर केवल पत्ता ही मिलता जाता है, वैसे ही परिणामशील यह विश्व ज्यों-ज्यों भीतर-भीतर देखा जाता है त्यों-त्यों उसमें ब्रह्म ही मिलता जाता है। वह आकाश-के तुल्य निराकार, अनिर्वचनीय परमात्मा सत्, ब्रह्म, आत्मा आदि शब्दोंसे कहा जाता है। सूक्ष्म मन और इन्द्रियोंके द्वारा अप्राप्य होनेके कारण परमात्मा परमाणु कहा गया है। अनन्त होनेके कारण परमात्मा ही मेरु आदि पर्वतोंका मूल है। परमाणुस्वरूप होते हुए भी इस परमपुरुष अनन्त परमात्मामें ब्रह्माण्ड, आकाश, भुवन, सूर्यमण्डल और मेरु—ये सब पदार्थ परमाणुकी तरह प्रतीत होते हैं। यह परमात्मा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ग्राह्य न होनेसे परमाणु कहा गया है और सब ओर परिपूर्ण होनेसे महापर्वत कहा गया है। वास्तवमें यह परम पुरुष परमात्मा अवयवरहित है, किंतु दृश्यके सम्बन्धसे अवयव-युक्त दिखायी पड़ता है। अज्ञानी वेताल ! ये सब जगत् उस विज्ञानस्वरूप परमात्माके संकल्पसे कल्पित हैं। अतः तुम उस अनन्त, शान्त स्वभाव अपार परमपदको अनुभव करो और शान्त हो जाओ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! राजाके मुखसे इस प्रकार प्रश्नोंका समाधान सुनकर शुद्धान्तःकरण वेताल विचारयुक्त बुद्धिसे परम शान्तिको प्राप्त हो गया। निर्दोष आत्माको तत्त्वसे समझकर और भयंकर क्षुधाको भूलकर वह शान्तमन वेताल परमात्माके ध्यानमें अचल स्थिर हो गया। ( सर्ग ७१—७३ )
भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य और अपने गुरु त्रितलके साथ संवाद
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देहयात्रार्थ प्रारब्धवश प्राप्त हुए अर्थसे संतुष्ट रहनेवाले प्रयत्नशील पुरुषके दुःसाध्य अर्थ भी भगीरथ राजाकी तरह सिद्ध हो जाते हैं। जिसका पूर्णरूपसे मन शान्त हो गया है, जिसकी वृत्तियाँ पर्याप्तरूपसे तृप्त हो गयी हैं, जिसकी आनन्दघनस्वरूप सम ब्रह्ममें निरन्तर निष्ठा है, उस महापुरुषके दुर्लभतर अभीष्ट कार्य भी उसी प्रकार सिद्ध हो जाते हैं, जिस प्रकार भगीरथका सगरपुत्रोंके उद्धारके लिये संजीवन गङ्गावतरणरूप अत्यन्त दुर्लभ कार्य सिद्ध हो गया था।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—प्रभो ! राजा भगीरथके चित्त-कौशलसे गङ्गावतरणरूप दुःसाध्य कार्य किस रीतिसे सिद्ध हुआ था, वह मुझसे कहिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! समुद्रोंसे युक्त पृथ्वी-का एक अत्यन्त धार्मिक भगीरथ नामका राजा हो चुका है। वह राजमण्डलमें सबसे श्रेष्ठ था। चन्द्रमाकी तरह प्रसन्न-मुख एवं चिन्तामणिके सदृश अभीष्ट अर्थोंको देनेवाले इस राजासे याचकगण अपने संकल्पके अनुसार ही अभीष्ट अर्थ प्राप्त करते थे। वह श्रेष्ठ पुरुषोंकी रक्षाके लिये निरन्तर धन देता था। न्यायसे प्राप्त तृण भी ले लेता था। वह याचकोंकी अभीष्ट-सिद्धिके लिये चिन्ता-मणिके सदृश था। मृदु और शीतल स्पर्शवाला वह ब्रह्म-तत्त्वज्ञानियोंकी संनिधिमें उनके चित्तको आह्लादित करता हुआ उसी प्रकार द्रवीभूत हो जाता था, जिस प्रकार चन्द्रमाकी संनिधिमें चन्द्रकान्तमणि। उसने अगस्त्य-मुनिद्वारा शोषित सागरको गङ्गाके प्रवाहसे उसी तरह पूरा कर दिया, जिस तरह याचकोंके समूहको धनसे पूरा किया था। पातालवासी अपने पूर्वजोंको उस लोकबन्धुने गङ्गारूपी सीढ़ी लगाकर ब्रह्मलोकमें पहुँचाया। गङ्गाजीको यहाँ लानेके उद्देश्यसे अपनी तपस्यासे ब्रह्मा, शंकर और जहुकी आराधना करते हुए उस दृढ़ निश्चयसे युक्त भगीरथने बार-बार क्लेश सहन किया। श्रीराम ! इस लोकयात्राका खूब विचार करते हुए उस राजाको युवा-वस्थामें ही तीव्र वैराग्यकी चिनङ्गारियोंने विवेकयुक्त विचार
४३४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उत्पन्न हुआ। वह राजा एकान्तमें असमञ्जसमें पड़कर व्याकुल हो इस संसारयात्राका प्रतिदिन यों विचार करने लगा—'इस संसारमें, जिसके प्राप्त हो जानेसे दूसरा कोई प्राप्य पदार्थ अवशिष्ट नहीं रहता, मैं उसी कर्मको सुकृत समझता हूँ। शेष कर्म तो विषूचिका (हैजेकी बीमारी) है। पुनः-पुनः पर्युषित कर्म करता हुआ मूढ-बुद्धि प्राणी लज्जित नहीं होता। कोई मूर्ख प्राणी तो अवश्य ही बालककी तरह बार-बार एक ही कर्म करता रहता है।' इस तरह चिन्ता करनेके अनन्तर संसारसे अत्यन्त भयभीत उद्विग्न-मन राजा भगीरथने एक दिन अपने गुरु त्रितलसे पूछा।
भगीरथने कहा—विभो! बहुत कालसे इन सारहीन सांसारिक वृत्तिरूप बड़े-बड़े जंगलोंमें भटकते हुए हम सब अत्यन्त खिन्न हो गये हैं। भगवन्! संसारमें फँसानेवाले जरा-मरण-मोहादिरूप सब दुःखोंका अन्त कैसे होता है?
त्रितल बोले—निष्पाप राजन्! चिरकालसे अभ्यस्त अन्तःकरणकी समतासे उत्पन्न, निर्विशेष, अखण्ड और व्यापक ज्ञेय परमात्माके ज्ञानसे सब दुःख नष्ट हो जाते हैं, सारी ग्रन्थियाँ सब ओरसे टूट जाती हैं, सारे संशय तथा कर्म शान्त हो जाते हैं। राजन्! तत्त्वज्ञानियोंने शुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्माको ही ज्ञेय बतलाया है और वह परमात्मा सर्वव्यापी तथा नित्य है। वह उत्पत्ति-विनाशसे रहित है।
भगीरथने कहा—मुनीश्वर! यह तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि चिन्मय, निर्गुण, शान्त, निर्मल और अच्युत परमात्मा है तथा देह आदि अन्य कुछ भी नहीं है—कल्पनामात्र है। किंतु भगवन्! ज्ञेयरूप परमात्माके स्वरूपमें मेरी अचल स्थिति (समाधि) नहीं हो रही है। इसमें क्या कारण है? मैं किस उपायसे उसे प्राप्त करूँ?
त्रितल बोले—हृदयाकाशमें यह चित्त जब ज्ञानके द्वारा ज्ञेयरूप परमात्मामें स्थिर हो जाता है, तब यह जीव सर्वात्मरूप परमात्माको प्राप्त होकर पुनः संसारमें उत्पन्न नहीं होता। पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्तिका अभाव, ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना, अनन्ययोगसे—आत्मा ही ब्रह्म है, ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई पदार्थ है ही नहीं, इस प्रकारकी अभेदभावनासे निरन्तर आत्मामें ब्रह्म-भावना, एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और विषयासक्त मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना, अध्यात्म-ज्ञानमें नित्य-स्थिति और तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना—यह सब ज्ञान है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है, ऐसा कहा गया है। राजन्! अहम्भावकी शान्ति हो जानेपर राग-द्वेषका विनाश कर देनेवाला तथा जन्म-मरणरूप संसार-व्याधिकी औषध परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जाता है।
भगीरथने कहा—महाभाग! पर्वतमें दीर्घकालसे सुदृढ हुए वृक्षकी तरह अपने शरीरमें दीर्घकालसे सुदृढ हुए अहम्भावका मैं कैसे त्याग करूँ?
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा भगीरथका सर्वस्वत्याग, भिक्षाटन और गुरु त्रितलके साथ निवास * ४२५
त्रितल बोले—राजन् ! पौरुष-प्रयत्नसे विषय-भोगोंकी भावनाका त्याग कर फिर परमात्माकी सत्ताका अनुभव करनेसे अहंकारका विनाश हो जाता है । जबतक सम्पूर्ण पदार्थोंका सर्वथा त्याग नहीं किया जाता, तबतक यह अहंकार बना रहता है । यदि विवेकपूर्वक विचार-बुद्धिसे सबका परित्याग करके तुम निश्चल होकर स्थित हो जाओ तो अहंकारका अभाव होकर तुम परमपद-स्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाओगे । यदि तुम्हारे सम्पूर्ण राजचिह्न आदि विक्षेपोंका त्याग हो जाय, यदि तुम भयने रहित हो जाओ, यदि तुम समस्त धनादिकी इच्छाओंका त्याग कर दो, यदि तुम शत्रुओंके लिये ही सम्पूर्ण ऐश्वर्यका त्याग करके और अकिञ्चनभावको प्राप्तकर अहंभावसे निवृत्त हो जाओ, यदि तुम अपने देहके अभिमानसे रहित होकर उन सब शत्रुओंमें ही भिक्षाटन करने लगो तो तुम उच्च-से-उच्च स्थितिको प्राप्त होकर परमपदरूप परमात्माको प्राप्त हो जाओगे ।
( सर्ग ७४ )
राजा भगीरथका सर्वस्वत्याग, भिक्षाटन और गुरु त्रितलके साथ निवास, भगीरथको पुनः राज्यप्राप्ति और ब्रह्मा, रुद्र आदिको आराधना करनेसे गङ्गाजीका भूतलपर अवतरण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तदनन्तर उन गुरुजीके मुखसे इस प्रकारका उपदेश सुनकर राजा भगीरथ मनमें कर्तव्य निश्चित कर उसके अनुष्ठानमें तत्पर हो गया । कुछ ही दिन व्यतीत होनेपर राजा भगीरथने एकमात्र सर्वत्यागकी सिद्धिके लिये अग्निष्टोम यज्ञका अनुष्ठान किया । उसमें उसने ब्राह्मणों तथा अपने बन्धुओंको गौ, पृथ्वी, घोड़े, सुवर्ण आदि समस्त धन दे दिया । तदनन्तर उसने सम्पूर्ण धनसे खाली तथा चिन्तामग्न मन्त्री, नागरिक, प्रजा आदिसे युक्त अपने राज्यको तृणके समान समझकर सीमाके पासके अपने शत्रुको दे दिया । जब महल, मण्डल एवं राज्यपर शत्रुने अधिकार कर लिया, तब मननदीन राजा भगीरथ एकमात्र कटिवस्त्र धारण किये अपने मण्डलसे निकल गया । अपने मण्डलसे निकलकर धैर्यवान् राजा भगीरथने अपनी राजधानीसे बहुत दूरके गाँवों और वनोंमें निवास किया, जहाँ लोग उसके नाम-रूपको नहीं पहचान सकते थे । इस प्रकार व्यवहार करते हुए राजा थोड़े ही समयमें समस्त एषणाओंसे रहित हो उत्तम उपरतिके कारण परमात्मामें परम विश्रामको प्राप्त हो गया ।
किसी समय राजा भगीरथ घूमता हुआ अपने नगरमें ही चला आया और वहाँ उसने अनेक घरों, नागरिकों और मन्त्रियोंसे भिक्षाकी याचना की । उन नागरिकों और मन्त्रियोंने राजा भगीरथको पहचान लिया और उन विषादयुक्त लोगोंने पूजन-सामग्रीसे विधिवत उसकी पूजा की
४३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
'प्रभो! आप अपना राज्य ले लीजिये, इस प्रकार शत्रु-द्वारा प्रार्थना किये जानेपर भी उस मननशील राजाने, जिसने सर्वत्याग कर दिया था, भोजनके सिवा तृणमात्र भी ग्रहण नहीं किया। कुछ दिन वहींपर बिताकर वह अन्यत्र चला गया। लोगोंने उस समय 'क्या ये ही भगीरथ राजा हैं? ये ही हमलोगोंको छोड़कर चले गये? अहो! महान् कष्ट है।' इस प्रकार उसके विषयमें शोक किया। तदनन्तर दूसरे स्थानोंमें विचरण करते हुए शान्तचित्त, स्थिरबुद्धि एवं परम सुखी वह नरेश किसी समय अपने आत्माराम त्रितल नामक गुरुके पास गया। प्रणाम आदिसे अपने गुरुका स्वागत-सत्कार करके उनके साथ कुछ कालतक पर्वत, वन, गाँव और नगरमें तथा अनेक सत्पुरुषोंके बीच निवास किया। वे दोनों उत्तम मुनि अपने पूर्वकृत कर्मोंके फलस्वरूप प्राप्त हुए सुख और दुःख, दोनोंका आदर करते थे। वे समस्त इच्छाओंसे रहित थे और सबके भी समरूप सच्चिदानन्द ब्रह्ममें एकरस होकर परम शान्तिको प्राप्त हो गये थे।
किसी एक अन्य देशमें विद्यमान उत्तम नगरमें पुत्र-रहित राजाकी मृत्यु हो गयी थी। शासकके अभावके कारण जिनके देशकी प्रजा-पालन-मर्यादा नष्ट हो चुकी थी, उस देशके उदास मन्त्री आदि प्रजावर्ग प्रजा-पालनयोग्य उदार गुण-लक्ष्मीसे युक्त किसी एक सुन्दर राजाकी खोजमें थे। वे मन्त्री आदि प्रजावर्ग भिक्षाचर्यामें रत, विरक्त, तपस्वी भगीरथ मुनिके पास पहुँचे। वे उनको प्रजापालन-योग्य समस्त शुभ गुणोंसे युक्त जानकर आदर-सत्कार-पूर्वक ले आये और उनको सेनासहित गन्धपपर अभिषिक्त करके राजा बना दिया। तदोत्तर उस राज्यका परिपालन करते हुए राजा भगीरथके पास पहले आदर पाये हुए कोशल देशके मन्त्री, पुरोहित आदि प्रजावर्ग भी आये और राजाधिराज भगीरथसे यों कहने लगे।
प्रजावर्गने कहा—राजन् ! अयोध्याका राज्य छोड़ते समय आपने सीमाके पासमें स्थित अपने जिस शत्रु राजाको राज्यदानसे पुरस्कृत किया था, उसको मृत्युने निगल लिया है। इस कारण अपने पूर्वराज्यकी रक्षा करनेकी
निर्वाण-प्रकरण पू०] * शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ * ४३७
आप दया कीजिये। बिना इच्छाके प्राप्त हुए राज्यका त्याग करना उचित नहीं।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! इस प्रकार प्रजावर्गके प्रार्थना करनेपर राजा भगीरथने उनकी बात मान ली और वे सात समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीके स्वामी हो गये। राजा भगीरथ सर्वत्र समभाव रखनेवाले, शान्तचित्त, मननशील, वीतराग एवं मत्सर-रहित थे। जिन्होंने अश्वका अन्वेषण करनेके लिये भूमि खोदकर सागरके सदृश गर्त निर्माण किया था और जो कपिलकी क्रोधाग्निसे पातालतलमें भस्मीभूत हो चुके थे, उन अपने पितामहोंको तारनेमें गङ्गाजल ही समर्थ है, जब यह बात राजाने सुनी; तब भूतलपर गङ्गाजीको लानेके लिये जितेन्द्रिय पृथ्वी-पति भगीरथ मन्त्रियोंके सिरपर समस्त राज्यभार छोड़कर तपके लिये निर्जन अरण्यमें चले गये। उस अरण्यमें हजार वर्षतक ब्रह्माजी, शंकरजी और जह्नु मुनिकी बार-बार आराधना करके वे इस पृथ्वीतलपर गङ्गाजीको ले आये। तभीसे ये पुण्यतोया त्रिपथगा गङ्गाजी, जो निर्मल तरङ्ग-मालाओंसे रक्षित जगत्पति शशिभूषण शिवजीके मस्तकमें सुशोभित तथा महात्माओंके महान् पुण्योंकी राशि हैं, आकाशतलसे पृथ्वीपर गिरती हैं। चञ्चल तरङ्गमालाओंसे सुशोभित, अपने फेनपुञ्जरूप हाससे युक्त, प्रसन्न पुण्यरूपा मञ्जरीसे समन्वित तथा धर्मकी संततिस्वरूप यह त्रिमार्गगामिनी गङ्गा उसी समयसे इस पृथ्वी-पर पृथ्वीपति भगीरथकी समुद्रपर्यन्त कीर्ति विस्तार करनेके लिये एक तरहकी वीथिका ही बन गयी हैं। (सर्ग ७५-७६)
शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ, शिखिध्वजके गुणोंका तथा चूडालाके साथ विवाह और क्रीडाका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन! अब तुम अविचल राजा शिखिध्वजकी तरह शान्तिपूर्वक अपने स्वरूपमें स्थित रहो।
श्रीरामजीने पूछा—महान्! यह शिखिध्वज कौन था और उसने परमपद कैसे प्राप्त किया? गुरुवर! उसका चरित्र मुझसे कहिये, जिससे मैं उसे अच्छी प्रकार जान सकूँ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम! अतीतकालीन सातवें मन्वन्तरकी चतुर्थ चतुर्युगीके द्वापर युगमें कुरुवंशमें इसी महासर्गमें शिखिध्वज नामका राजा हुआ था। जम्बूद्वीपमें प्रसिद्ध विन्ध्याचलके समीपवर्ती मालवदेशकी उज्जयिनी नगरीमें वह राजा राज्य करता था। वह धैर्य, औदार्य आदि गुणोंसे युक्त था। उसमें क्षमा, शम, दम विद्यमान थे। वह वीरतासे पूर्ण था। शुभ कर्मोंके अनुष्ठानमें लगा रहता था। मितभाषी था। इस प्रकार वह अनेक गुणोंका खजाना था। समस्त यज्ञोंका निरन्तर अनुष्ठान
४३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
करता था। उसने बड़े-बड़े धनुर्धारियोंको जीत लिया था। वह लोकोपयोगी शुभकार्योंको करता था और पृथ्वीका पालन करता था। वह कोमल, स्निग्ध और मधुर स्वभाववाला दक्ष तथा प्रेमका समुद्र-सा था । वह सुन्दर, शान्त, भाग्यवान्, प्रतापी और धर्मवत्सल था। वह विनययुक्त वाक्योंका प्रयोग करता था तथा याचकोंको सभी प्रकारके पदार्थ देता था। वह उत्तम पदार्थोंका भोक्ता, सत्सङ्गसे युक्त और समस्त वेद-शास्त्रोंका उत्तम श्रोता था। वह शिखिध्वज सब बातोंको जानते हुए भी जानकारीके अभिमानसे रहित था, स्त्री-व्यसन आदिका तो उसने तृणवत् त्याग कर दिया था। बाल्यकालमें ही उसके पिता स्वर्ग चल दिये थे। उसके बाद अपने बाहुबलसे उस जितेन्द्रिय शिखिध्वजने सोलह वर्षतक स्वयं ही दिग्विजय करके अखिल भूमण्डलको अपनी साम्राज्य-सम्पत्तिमें परिणत कर दिया । तदनन्तर निःशङ्क होकर धर्मसे प्रजाका पालन करते हुए वे बुद्धिमान् राजा शिखिध्वज मन्त्रियोंके साथ अपने यशसे दिशाओंको उज्ज्वल करते हुए स्थित थे।
जब वे युवा हो गये, तब उन्होंने अनेक वन और उपवनोंमें, लीला-सरोवरोंमें, लतागृहोंमें तथा विविध भूमियोंमें विचरण किया । उन्होंने वन और उपवनके गुण-वर्णनसे युक्त शृङ्गाररससे परिपूर्ण कथाओंमें रस लिया तथा सुवर्ण-कलशके सदृश स्तनवाली, हारसे सुशोभित शरीर तथा चञ्चल केशोंसे युक्त कुमारियोंका मनसे आदर किया । चतुर मन्त्रियोंने राजाका अभिप्राय जान लिया । तदनन्तर राजाके विवाहके लिये विचार करके मन्त्रियोंने सौराष्ट्रदेशके राजासे युवती कन्याकी याचना की । राजा शिखिध्वजने नवीन यौवनसे सम्पन्न तथा अपने अनुरूप उस उत्तम कन्याके साथ विधिपूर्वक विवाह किया । राजा शिखिध्वजकी पत्नी संसारमें चूडाला नामसे विख्यात थी । वह भी अपने अनुरूप पति प्राप्तकर प्रफुल्लित हो रही थी । राजा शिखिध्वज नील कमलके सदृश नेत्रवाली उस चूडालाको स्नेहसे प्रसन्न रखते थे । एक दूसरेके प्रति अर्पित चित्तवाले उन दोनोंकी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती थी । हाव, भाव, विलास आदि शृङ्गारमयी चेष्टाविशेषोंसे परिपूर्ण अङ्गोंके कारण वह चूडाला सुन्दर नवीन लताके समान शोभित हो रही थी । शिखिध्वज राजाको मन्त्रियोंद्वारा सभी उपभोग-सामग्री समयानुसार समर्पित की जाती थी । उसकी प्रजा सुव्यवस्थित थी । परम सुखी वह राजा कमलिनीके साथ राजहंसके सदृश उस प्रियतमाके साथ रमण करता था । वे दोनों निरन्तर एक दूसरेसे मिले हुए थे । एक दूसरेकी चेष्टाएँ उन्हें प्रिय लगती थीं । एक दूसरेसे शिक्षाग्रहण करनेके कारण वे दोनों सम्पूर्ण कलाओंके ज्ञाता हो गये थे । परस्पर अत्यन्त मित्रताको प्राप्त हुए वे दोनों एकदूसरेके हृदयमें
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * क्रमसे उन दोनोंकी वैराग्य एवं अध्यात्मज्ञानमें निष्ठा * ४३९
बस जानेके कारण मानो एकरूप ही हो गये थे । जैसे ब्रह्मचारी नियतकालतक गुरुमुखसे अध्ययन करके समस्त शास्त्रोंका पण्डित हो जाता है, वैसे ही कुछ नियतकाल-तक अपने स्वामीके मुखसे सुन-सुनकर समस्त शास्त्रोंके तात्पर्यमें और चित्रकला आदिमें भी चातुर्य प्राप्तकर चूडाला समस्त विषयोंकी पण्डिता हो गयी थी तथा चूडालाके द्वारा इस शिखिध्वजने भी नृत्य, वाद्य आदि जितने कला-कौशल हैं, उन सबका शिक्षण ग्रहण किया और वे कलाओंके पारंगत विद्वान् हो गये । उन दोनोंकी बुद्धि चातुर्यसे युक्त तथा सुन्दर थी । वे दोनों स्नेहसे प्रसन्न और मधुर लगते थे । ज्ञानतत्त्वका कथन करनेमें भी वे समान थे । श्रेष्ठ पुरुषोंका अनुकरण करते थे । सदाचार-परायण थे । प्रजाजनोंके वृत्तान्तका भी ज्ञान रखते थे । वे समस्त कलाओंके पण्डित एवं शृङ्गारादि नवरसरूपी रसायनोंसे सुशोभित थे ।
(सर्ग ७७)
क्रमसे उन दोनोंकी वैराग्य एवं अध्यात्मज्ञानमें निष्ठा तथा चूडालाको यथार्थ ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इसी प्रकार अनेक वर्षोंतक दृढ़ प्रेमसे सम्पन्न उस दम्पतीने प्रतिदिन यौवनकी आनन्द लीलाओंद्वारा रमण किया । यों एकके बाद एक करके अनेक वर्ष बीत गये और फूटे हुए घड़ेसे जलके क्षय होनेकी भाँति धीरे-धीरे तारुण्यका क्षय होते देख उन दोनोंने विचार किया—'समुद्रकी तरङ्गोंके समान चञ्चल, क्षणभङ्गुर शरीरसे व्यवहार करनेवाले जीवका पके हुए फलके पतनकी तरह मरण अवश्यम्भावी है । अब इस देहमें वृद्धावस्था आनेकी तैयारी कर रही है; क्योंकि आयु निरन्तर क्षीण होती जाती है । यह जीर्ण जीवन इन्द्रजालके सदृश असत्य ही है । यह शरीर वर्षाकालमें जलके बुद्बुदकी भाँति क्षणभरमें ही विलीन हो जानेवाला है । विचार -करनेसे जगत्का यह व्यवहार कदली-गर्भके सदृश निस्सार ही सिद्ध होता है । इस संसारमें ऐसी कौन वस्तु है, जो शुभ, सुस्थिर एवं अत्यन्त सुन्दर हो, अर्थात् कोई भी नहीं है ।' उस दम्पतीने इस प्रकार निश्चय करके संसाररूपी व्याधिकी असली औषध अध्यात्मशास्त्रका दीर्घकालतक विवेकपूर्वक विचार किया । केवल आत्मज्ञानसे ही संसाररूपी महामारी शान्त हो जाती है, यह निर्णयकर वे दोनों आत्माका ज्ञान सम्पादन करनेमें तत्पर हो गये । अध्यात्मज्ञानमें ही उनका चित्त लग गया था । प्राण भी उसीमें लगे थे । उसीमें उनकी निष्ठा थी । अध्यात्मज्ञानका ही उन्होंने आश्रय लिया था । वे उसीकी अर्चनामें लगे रहते थे । उनकी इच्छा भी अध्यात्म-ज्ञानकी ही रहती थी और उस समय इस संसारसे वे दोनों विरक्त हो गये थे । उन्होंने अध्यात्मज्ञानमें ही दृढ़ अभ्यास बढ़ा लिया था । वे एक दूसरेको अध्यात्मज्ञानका ही प्रबोध कराते थे । उनकी प्रीति उसी ज्ञानमें थी एवं परस्पर उनका समस्त आरम्भ उसीमें होता था ।
तदनन्तर वह चूडाला अध्यात्मविषयको जाननेवाले महात्माओंके मुखसे संसार-दुःखसमुद्रसे पार करनेमें समर्थ आत्मज्ञानोपयोगी मनोहर पदक्रमोंसे संयुक्त शास्त्रार्थोंका निरन्तर श्रवण करके बाह्य शरीरके व्यापारोंसे उपरत और उज्ज्वल प्रबुद्धबुद्धिसे युक्त हो अपनी आत्माके विषयमें इस प्रकार अहर्निश विचार करने लगी ।
'अब मैं स्वयं विवेचन करके अपने आपका पता लगाती हूँ कि मैं क्या हूँ तथा यह संसाररूप मोह किसको, कैसे, कहाँसे प्राप्त हुआ है । यह देह तो जड़ है; इसलिये देह मैं नहीं हूँ, यह अटल निश्चय है । हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रिय-समुदाय भी इस शरीरसे अभिन्न अवयवरूप ही हैं । कभी अवयव और अवयवीमें भेद नहीं होता, इसलिये वे भी जड़ ही हैं । ज्ञानेन्द्रिय-
४५० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ-
समुदाय भी शरीरावयवरूप ही है, इसलिये वह भी जड ही दीख पड़ता है। संकल्पात्मक शक्ति रखनेवाला जो मन है, उसे भी मैं जड ही मानती हूँ; क्योंकि ज्ञानेन्द्रियाँ मनसे ही प्रेरित होती हैं। जैसे गोफनसे पाषाण प्रेरित होता है, वैसे ही मन भी बुद्धिके निश्चयोंसे प्रेरित होता है; इस तरह निश्चयरूपा बुद्धि भी जड ही है, यह अटल निश्चय है। अहंकार भी सारशून्य तथा मुर्देके सदृश है, इसलिये जड ही है; क्योंकि बुद्धि अहंकारसे प्रेरित होती है। अहंकार भी जड ही है, क्योंकि वह जीवात्मासे अध्यस्त है। यह चेतन जीव प्राणवायुरूप उपाधिसे उपहित हुआ हृदयमें रहता है। वह परमात्माका अंश होनेके कारण परमात्माकी सत्तासे ही सत्तावान् है। चेतनस्वरूप आत्मा मिथ्या जड विषयोंके साथ तादात्म्य एवं संसर्गका अभ्यास करके ही जड-जैसा बन जाता है और अपने असली शुद्ध चिन्मय स्वरूपको भूल जाता है। चेतन जीवात्माकी विषयोंके साथ एकाग्रता होनेपर वह एक क्षणमें अपने स्वरूपको भूलकर तत्स्वरूप हो जाता है। इस प्रकार जब विषयोंके सम्मुख होनेसे यह चेतन जीवात्मा जड, शून्य, मिथ्याके समान हो जाता है, तब चिन्मय परमात्माके द्वारा प्रबोधित किया जाता है।'
इस प्रकार विचारकर फिर उस चूडालाने यह सोचा कि किस उपायसे यह जीवात्मा प्रबुद्ध हो। बहुत समयके बाद उसने आत्मतत्त्वको जान लिया और वह कहने लगी—'अहो! बड़े आनन्दका विषय है कि दीर्घकालके बाद मुझे उस निर्विकार जानने योग्य परमात्माके स्वरूपका अनुभव हो गया, जिसे जान लेनेपर पुरुष फिर उससे च्युत नहीं होता। वास्तवमें एक महान् चेतन परमात्मा ही इस संसारमें सत्यरूपसे विराजमान है। उसको महासत्ता भी कहते हैं। यह निष्कलङ्क, समरूप, विशुद्ध और अहंकाररहित है। उसका स्वरूप शुद्ध विज्ञान ही है। वह परम मङ्गलमय केवल सत्यस्वरूप है। वह अपने परमानन्द-स्वरूपसे कभी विचलित नहीं होता। एक बार उसका साक्षात्कार हो जानेपर वह फिर सदा प्रत्यक्ष रहता है, उसका कभी अभाव नहीं होता। वह ब्रह्म, परमात्मा आदि नामोंसे कहा गया है। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयरूप त्रिपुटी इस परमात्मासे भिन्न कोई वस्तु नहीं है। वह चेतन परमात्मा ही मन, बुद्धि, आदि इन्द्रिय पदार्थोंके रूपमें प्रकट होकर क्रियाशील होता है। जैसे समुद्रके जलमें तरङ्ग आदि वास्तवमें उत्पन्न न हुए भी उत्पन्न हुए-से प्रतीत होते हैं, वैसे ही महाचेतनमें जगत् वास्तवमें उत्पन्न न होते हुए भी उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता है। इस नित्य चिन्मय परमात्माके जन्म, मरण, सद्गति, असद्गति या नाशकी कहीं सम्भावना ही नहीं है। यह परमात्मा अच्छेद्य, अदाह्य और परम विशुद्ध है। अहा! मैं बहुत कालके बाद शान्त होकर सब ओरसे परम निर्वाणपदको प्राप्त हुई हूँ। कुम्हार आदिके द्वारा बनायी गयी मृत्तिकाकी सेना जैसे मृत्तिकारूप ही है, वैसे ही सुर, असुर आदिसे युक्त यह विश्व स्वभावतः परब्रह्मस्वरूप ही है तथा द्रष्टा एवं दृश्यरूप सत्ता भी एक चैतन्य-स्वरूप ही है। यह ऐक्य है, यह द्वैत है; यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ इत्यादि भ्रमजनित मोह क्या चीज है और वह किस तरह, किसको, कहाँसे और कहाँ हुआ है? अर्थात् किसीको कहीं नहीं। यह सब मिथ्या है। अतः मैं अपने अंदर अनन्त पारमार्थिक स्वरूपको अनायास प्राप्तकर अब शान्तरूपसे स्थित हूँ। न तो इदं है, न अहं है और न दूसरा है एवं न भाव है ओर न अभाव ही है। सब कुछ शान्त, निरालम्ब केवल परब्रह्मस्वरूप परमात्मा ही है।' इस प्रकार परमात्माके मननमें परायण वह चूडाला यथार्थ ज्ञानके द्वारा उस परमात्माके वास्तविक स्वरूपको तत्त्वसे जानकर राग, भय, मोह आदि अज्ञान-विकारोंके शान्त होनेसे उसी प्रकार शान्त हो गयी, जैसे शरत्-कालमें आकाश बादलोंसे रहित हो जाता है। (सर्ग ७८)
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चूडालाको अपूर्व शोभासम्पन्न देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना * ४४१
चूडालाको अपूर्व शोभासम्पन्न देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना और उससे वार्तालाप करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! चूडाला संसारके सम्बन्धों, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों, राग और इच्छाओंसे रहित हो गयी थी। वह न किसी पदार्थका ग्रहण करती थी और न किसीका त्याग करती थी। केवल न्यायसे प्राप्त आचरण करती थी। संसाररूपी महासमुद्रको वह पार कर गयी थी। संदेहरूपी जालसे मुक्त हो गयी थी। वह परमात्माके महान् लाभसे परिपूर्ण हो गयी थी। इस प्रकार सुन्दर वर्णवाली शिखिध्वजकी श्रेष्ठ धर्मपत्नी वह चूडाला थोड़े ही कालमें जाननेयोग्य परमात्माको यथार्थ जान गयी। अपने विवेकके दृढ़ अभ्यास-बलसे परमात्माका यथार्थ अनुभव हो जानेपर वह परम शोभा पाने लगी। किसी समय उस सुन्दर अङ्गोंवाली चूडालाको अपूर्व शोभासे युक्त देख राजा शिखिध्वजने हँसते हुए कहा—'प्रिये ! इस समय तुम वैसे ही अत्यन्त सुशोभित हो रही हो, जैसे तुमने अमृतका सार पी लिया हो या अलभ्य परमात्मपदकी प्राप्ति कर ली हो अथवा आनन्दप्रवाहसे तुम परिपूर्ण हो गयी हो। इस समय मैं तुम्हारे चित्तको भोग लालसासे रहित, शान्त, विवेकसे बलिष्ठ, समताको प्राप्त, गम्भीर और चञ्चलतारहित देख रहा हूँ। तुम्हारे मनके साथ किसी भी विभ्रमानन्दकी वस्तुसे उपमा नहीं दी जा सकती। भद्रे ! क्या तुमने अमृत पी लिया है या किसी साम्राज्यकी प्राप्ति कर ली है या मन्त्रके प्रयोग या योगके साधनसे अमरता प्राप्त कर ली है? नीलकमलके सदृश नेत्रोंवाली ! क्या तुमने राज्य, चिन्तामणि और त्रैलोक्यसे भी बढ़कर किसी अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति कर ली है?'
चूडालाने कहा—आर्य ! इस समस्त विनाशशील संसारका त्यागकर इससे भिन्न सत्-असत्-स्वरूप सर्वात्मक परमात्माका मैंने आश्रय लिया है, इसीलिये मैं परम श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। एकमात्र आकाश-सदृश विमल अद्वितीय केवल हृदयरूप चिन्मय हृदमें अकेली ही मैं रमण करती हूँ, राजलीलाओंमें मैं कभी रमण नहीं करती; इसलिये मैं परम श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। मूल्यवान् आसन, उद्यान और घरोंमें रहकर भी मैं परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहती हूँ तथा विषय-भोगोंसे दूर हूँ; इसीलिये मैं परम शोभायुक्त हुई स्थित हूँ। मैं सुख-सम्पत्ति नहीं चाहती, न अर्थ और अनर्थको ही चाहती हूँ; दूसरी किसी प्रकारकी स्थिति भी नहीं चाहती। जो कुछ न्यायसे प्रारब्धानुसार प्राप्त होता है, उसीसे संतुष्ट रहती हूँ। इसीसे मैं परम श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। राग और विद्वेषको विनष्ट कर देनेवाली आत्मविषयक बुद्धि और शान्तदृष्टिरूपी सखियोंके साथ मैं रमण करती हूँ; इसलिये मैं परम शोभासम्पन्न होकर स्थित हूँ।
(सर्ग ७९)
४३२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
राजा शिखिध्वजका चूडालाके वचनोंको अयुक्त बतलाना, चूडालाका एकान्तमें योगाभ्यास करना एवं श्रीरामचन्द्रजीके पूछनेपर श्रीवसिष्ठजीके द्वारा कुण्डलिनीशक्तिका तथा विभिन्न शरीरोंमें जीवात्माकी स्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परमात्माके स्वरूपमें स्थित उस चूडालाके इस प्रकार कहनेपर उसके वचनोंका रहस्य न जाननेके कारण राजा शिखिध्वज हँसते हुए कहने लगे।
शिखिध्वजने कहा—सुन्दरी राजपुत्रि ! तुम बालबुद्धि हो। तुम्हारा वचन युक्तिसंगत नहीं है। तुम जिस प्रकार राजलीलाओंमें रमण करती आयी हो, उसी प्रकार रमण किया करो। भद्रे ! बतलाओ तो सही जो वस्तु आकार-सामान्यका परित्याग करके कभी भी प्रत्यक्ष न होनेवाली निराकारताको प्राप्त हो चुकी है, वह प्रत्यक्ष और अस्तित्वसे शून्य वस्तु कैसे शोभित हो सकती है ? धनादि समस्त भोग-वस्तुओंका परित्याग करके जो एक शून्य आकाशमें ही रमण करता है, वह शोभित होता है—यह कहना कैसे संगत हो सकता है ? जो धीरबुद्धि पुरुष वस्त्र, भोजन, शय्या आदि सारे साधनोंका परित्याग करके अकेला स्वरूपमें ही स्थित रहता है, वह कैसे शोभित हो सकता है ? इसलिये सुन्दरी ! तुम बाला हो, मुग्धा हो और चपल हो । विलासिनि ! अनेक प्रकारके आलाप-विलासोंसे जिस तरह मैं क्रीड़ा करता हूँ, उसी तरह तुम भी क्रीडा करो।
राजा शिखिध्वजने इस प्रकार अपनी प्रिया चूडालाके प्रति कहकर अट्टहास करते हुए मध्याह्नमें स्नान करनेके लिये उठकर चूडालाके महलसे प्रस्थान किया । 'बड़े दुःखका विषय है कि अभीतक राजा अपने स्वरूपमें स्थित नहीं हुए हैं। मेरे वचनोंको भी वे न समझ सके— इस प्रकारके विचारसे खिन्न हुई वह चूडाला अपने कार्यमें संलग्न हो गयी । रामभद्र ! तदनन्तर वहींपर उस प्रकारके भिन्न-भिन्न आशयसे युक्त उन दोनोंका उस समय भी पहलेकी सांसारिक क्रीड़ाओंमें उसी तरह बहुत काल चला गया । एक समयकी बात है, नित्यतृप्त और इच्छारहित चूडालाको लीलावश आकाशमें गमनागमन करनेकी स्फुरणा हुई । तब वह राजपुत्री आकाशमें गमनागमनकी सिद्धिके लिये सम्पूर्ण भोगोंकी अवहेलना करके और निर्जन स्थानमें आकर अकेली ही एकान्तमें आसन लगाकर ऊर्ध्वगामी प्राणवायुका निरोध करनेके लिये अभ्यास करने लगी ।
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा शिखिध्वजका चूडालाके वचनोंको अयुक्त बतलाना * ४५३
श्रीरामजीने कहा—प्रभो ! जो-अनात्मज्ञ पुरुष हैं, वे अपनी सफलताके लिये अथवा जो आत्मज्ञ हैं, वे केवल लीलाके लिये किस क्रमसे इन सिद्धियोंको सिद्ध करते हैं, वह मुझसे कहिये ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—प्रिय राघव ! इस जगत्में सभी जगह ग्राह्य वस्तु तीन तरहकी होती है—उपादेय (ग्रहण करनेयोग्य), हेय (त्याज्य) और उपेक्षाके योग्य । सद्बुद्धे ! जो वस्तु साक्षात् या परम्परासे सुखदायक होती है, वह उपादेय होती है; जो सुख-विघातक होती है, वह हेय होती है एवं जो वस्तु इन दोनोंके बीचकी होती है, वह उपेक्ष्य होती है—ऐसा अनुभवी लोगोंका कहना है । परमात्मतत्त्वको जाननेवाले श्रेष्ठबुद्धि विद्वान्की दृष्टिमें जब यह सब परमात्मस्वरूप हो जाता है, तब इन तीनों पक्षोंमेंसे कोई भी पक्ष नहीं रहता । किसी समय ज्ञानी व्यवहारकालमें लीलासे ही इस समस्त जगत्को
उपेक्षा-बुद्धिसे केवल देखता है और समाधिकालमें नहीं देखता । ऐश्वर्यादि एक ही वस्तु ज्ञानीकी दृष्टिमें उपेक्षाके योग्य, मूढ़की दृष्टिमें उपादेय और उत्तम वैराग्यसम्पन्न पुरुषकी दृष्टिमें हेय हो जाती है । श्रीराम ! आकाशगमन आदि सिद्धियोंका क्रम कैसा है, उसे तुम अब सुनो । देश, काल, क्रिया एवं द्रव्यकी अपेक्षा रखनेवाली सब तरहकी सिद्धियों यहाँ जीवको मोहित करती हैं । मणि, ओषधि, तप, मन्त्र और क्रियासे होनेवाली सिद्धिके क्रमका निरूपण अनावश्यक, है; क्योंकि यह अध्यात्मविषयमें विघ्न ही है । कृतार्थ श्रीराम ! सिद्धदेशके नामसे प्रसिद्ध श्रीशैल अथवा मेरु पर्वत-पर निवास करनेवाले पुरुषको सिद्धि होती है—उसका भी विस्तारपूर्वक वर्णन करना अध्यात्मविषयमें हानिकर है । इसलिये शिखिध्वजकी कथाके प्रसङ्गसे प्राप्त सिद्धिरूपी फलसे युक्त इस प्राणादि वायुकी अभ्यास-क्रियाको तुम श्रवण करो । साध्य अर्थसे भिन्न पदार्थोंकी वासनाओंका त्याग करके गुदा आदि द्वारोंके संकोचसे; सिद्धादि आसन, काया, मस्तक और गर्दनकी समता, निश्चलता तथा नासिकाके अग्रभागमें दृष्टिको स्थिर करना आदि योगशास्त्रोक्त क्रियाओंसे; भोजन और आसनकी पवित्रतासे, भलीभाँति योगशास्त्रके परिशीलनसे, उत्तम आचरणसे, सज्जनोंके सङ्गसे, सर्वत्यागसे, सुखासनसे बैठकर कुछ कालतक प्राणायामके दृढ़ अभ्याससे, क्रोध-लोभ आदिके सर्वथा त्यागसे तथा भोगोंके त्यागसे एवं रेचक, पूरक और कुम्भकका अच्छी तरह अभ्यास हो जानेपर प्राणोंपर पूर्ण प्रभुत्व हो जानेसे योगीके पाँचों प्राण उसी तरह उसके अधीन हो जाते हैं, जिस तरह राजाके सेवक राजाके वशमें होते हैं ।
राघव ! प्राणायामके द्वारा देहमें स्थित प्राण-समान वायुके अपने अधीन हो जानेपर राज्यसे लेकर मोक्षपर्यन्त सभी सम्पत्तियाँ सुखसाध्य हो जाती हैं । मण्डलाकार (गोल कुण्डलाकार) से युक्त, मर्म (नाभि) स्थानमें
| ५४४ | * अविच्छिन्नविचारैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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समाश्रित, सौ नाड़ियोंकी आश्रय आन्त्रवेष्टनिका (सुषुम्ना) नामकी नाड़ी है। श्रीराम ! देव, असुर, मनुष्य, मृग, नक्र, खग, कीट, पतङ्ग आदि सब प्रकारके प्राणियोंमें वह नाड़ी स्थित है। गुदासे लेकर भौंहके बीचतक सब छिद्रोंका स्पर्श करती हुई वह सुषुम्ना नाडी मनकी वृत्तियोंसे भीतर चञ्चल और बाहर प्राणादिसे स्पन्दयुक्त होकर सदा स्थित रहती है। वह कुण्डलाकार वाहिनी है, इसलिये कुण्डलिनी नामसे कही गयी है। वह सब प्राणियोंकी परमा शक्ति है तथा प्राण, इन्द्रिय, बुद्धि आदि सभी शक्तियोंकी सत्तास्फूर्तिकी निर्वाहक होनेसे सबको वेग प्रदान करनेवाली है। वही अपने मुखसे प्राणवायुको ऊपर फेंकती है और अपानको नीचे खींचती है, इसलिये सदा साँस खींचती हुई स्पन्दनमें हेतु बनी वह ऊपरकी ओर मुँह करके कुपित सर्पिणीकी तरह स्थित रहती है। यह कोमल स्पर्शवाली कुण्डलिनी कमलमें भ्रमरकी तरह देहमें जैसे-जैसे स्फुरित होती है, वैसे-वैसे अन्तःकरणमें ज्ञान होता है। उस कुण्डलिनीमें हृदयकोशकी समस्त नाड़ियाँ सम्मिलित हैं। वे सब नाड़ियाँ सागरमें नदियोंकी तरह उसीसे बारंबार उत्पन्न होती हैं तथा उसीमें विलीन होती जाती हैं। प्राणरूपसे उसके ऊर्ध्वगमनमें उत्सुक होने तथा अपानरूपसे अधःप्रवेशकी ओर उन्मुख होनेसे एक वही सम्पूर्ण ज्ञानोंकी साधारण बीज कही गयी है।
निष्पाप श्रीराम ! पशुओंसे लेकर स्थावर आदि देहोंमें तथा मनुष्यादि शरीरोंमें जिस तारतम्यसे जीवात्मा रहता है, यह मैं तुमसे क्रमशः कहता हूँ, सुनो। यह सत्य, नित्य चेतन, विकारशून्य और अनामय जीवात्मा अपनी कल्पनासे पञ्चभूतोंके रूपसे स्थित होता है। पूर्वकृत कर्मोंके अनुसार जीवात्माकी कल्पनासे पञ्चभूत मनुष्यादि देहभावकी, तिर्यग् देहभावकी, सुवर्णभावकी, देशादिभावकी और द्रव्यादिभावकी प्राप्ति होती है। रघुनन्दन ! इस तरह यह संसार केवल पञ्चभूतका विकासमात्र ही है और वह चेतन जीवात्मा ही यहाँ सर्वत्र विद्यमान है। वही जीवात्मा केवल पञ्चभूतोंके सम्बन्धसे मनुष्यादि देहोंमें बौद्धिक ज्ञानकी विशेषताके कारण चेतन-प्रधान, कहीं (तिर्यगादिमें) जड-चेतन उभय-प्रधान और वृक्ष, पहाड़ आदि स्थावर योनियोंमें जड-प्रधान रहता है। निष्पाप श्रीराम ! देहादि आकारमें परिणत पञ्चभूत जीवका संकल्प होनेके कारण जीव कहलाता है और पहाड़ आदि तो केवल जड ही हैं एवं वृक्षादि स्थावर बाहरकी वायुसे स्पन्दनशील (चेष्टावान्) होते हैं।। पञ्चभूतसमूहात्मक मेरु पर्वत आदि तो तृणकी भाँति जड हैं; किंतु ये वृक्ष, कीट आदि स्थावर-जंगम प्राणी चेतन हैं। इनमें वृक्ष आदि स्थावर जातिकी वासना निद्राग्रस्त मनुष्यकी वासनाकी भाँति प्रसुप्त है तथा मनुष्य और देवता आदिमें बुद्धिकी अधिकताके कारण उनकी वासना प्रबुद्ध है। पशु, पक्षी आदि मलिन वासनासे युक्त हैं, किंतु मनुष्योंमें कुछ मोक्षमार्गी मनुष्य वासनाओंसे रहित हैं; क्योंकि वे विवेकको प्राप्त हो गये हैं। अतः वे इस संसारमें पुनः जन्म-धारण नहीं करते; किंतु इनसे भिन्न अविवेकी मनुष्य बार-बार संसारमे भ्रमण करते रहते हैं।
(सर्ग ८०)
आधि और व्याधिके नाशका तथा सिद्धिका और सिद्धोंके दर्शनका उपाय
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—मुनीश्वर ! इस शरीरमें आधि (मानसिक) और व्याधि (शारीरिक) रोग किससे उत्पन्न होते हैं तथा किससे विनष्ट होते हैं ! यह मुझको समझाकर कहिये।
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * आधि और व्याधिके नाशका तथा सिद्धिका और सिद्धोंके दर्शनका उपाय * ४५५
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! आधि और व्याधि—ये दोनों दुःखके कारण हैं। औषधादिके द्वारा इनकी निवृत्तिसे सुख प्राप्त होता है तथा ज्ञानके द्वारा इनका समूल नाश होता है। वही मोक्ष कहलाता है। शरीरके अंदर आधि और व्याधियाँ कभी परस्पर एक दूसरेकी कारण बनकर उत्पन्न होती हैं अर्थात् कभी आधिसे व्याधि हो जाती है और कभी व्याधिसे आधि हो जाती है। कभी आधि-व्याधि—दोनों एक साथ हो जाती हैं और कभी सुखके अनन्तर दुःखरूप ये आधि-व्याधि क्रमसे उत्पन्न होती हैं। शारीरिक दुःखको व्याधि कहते हैं और वासनामय मानसिक दुःखको आधि। श्रीराम ! यह जान लेना चाहिये कि अज्ञान ही इन दोनोंका मूल कारण है। यथार्थ ज्ञान होनेपर इनका अवश्य विनाश हो जाता है। यथार्थ परमात्म-ज्ञान और इन्द्रिय-निग्रहके अभावसे, राग-द्वेषमें फँस जानेसे तथा यह प्राप्त हो गया, यह प्राप्त होना शेष है—इस तरह रात-दिन चिन्ता करनेसे जड़ताके कारण महामोहदायिनी आधियाँ (मानसिक व्यथाएँ) उत्पन्न होती हैं। प्रबल इच्छाओंके पुनः-पुनः स्फुरित होनेसे, मूर्खतासे, चित्तके न जीतनेसे, दुष्ट अन्न खानेसे तथा श्मशान आदि निकृष्ट स्थानोंमें निवास करनेसे शरीरमें व्याधियाँ (शारीरिक रोग) उत्पन्न होती हैं। आधी रातमें तथा प्रदोषादि कालमें भोजन एवं मैथुनादि व्यवहारसे, दुष्कर्म करनेसे, दुर्जनोंकी सङ्गतिरूप दोषसे तथा विष, सर्प, व्याघ्र और चोर आदिका मनमें भय होनेसे शरीरमें व्याधि उत्पन्न होती हैं। नाड़ियोंके छिद्रोंमें अन्नके रसका प्रवेश न होनेके कारण नाड़ियोंके क्षीण होनेसे अथवा उन छिद्रोंमें अन्नके रस एवं वायु आदिके अधिक प्रवेश हो जानेके कारण नाड़ियोंके एकदम भर जानेसे, कफ, पित्त आदिके प्रकोपसे, प्राण तथा शरीरके व्याकुल हो जाने आदि अनेक दोषोंके द्वारा रोग उत्पन्न होता है।
अभिमतपदार्थोंकी प्राप्ति होनेसे व्यावहारिक व्याधियाँ तथा आधि (अज्ञान) के क्षयसे आधिसे उत्पन्न मानसिक व्याधियाँ भी भलीभाँति नष्ट हो जाती हैं। राघव ! आत्मज्ञानके बिना जन्मादि विकारोंकी जड़ व्याधि (अज्ञान) नष्ट नहीं होती, क्योंकि रज्जुके यथार्थ ज्ञानसे ही रज्जुमें प्रतीत होनेवाला सर्प नष्ट होता है। जैसे वर्षाकालकी नदी अपने तटके सभी वृक्षोंको जड़से उखाड़ फेंकती है, वैसे ही सम्पूर्ण आधि और व्याधियोंको जड़से उखाड़ फेंकनेवाला जन्मादि विकारोंकी मूल अज्ञानरूपी व्याधिका क्षय ही है, जो परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे होता है। सामान्य व्याधियाँ तो आयुर्वेदोक्त ओषधियों तथा मन्त्रादि शुभ कर्मोंसे अथवा वृद्धोंकी परम्परासे कथित औषधोंसे नष्ट हो जाती हैं। श्रीराम ! तीर्थोंमें स्नान, मन्त्र, औषध आदि उपाय, वृद्धजनोंसे प्राप्त हुई ओषधियाँ तथा आयुर्वेदशास्त्रको तो आप स्वयं खूब जानते हैं। इनसे अतिरिक्त और मैं क्या आपको उपदेश दूँ।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—गुरुवर ! आधिसे व्याधि कैसे उत्पन्न होती है और औषधके अतिरिक्त मन्त्र, पुण्य आदिरूप युक्तिसे वह कैसे नष्ट होती है ?
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! मानसिक पीड़ाओंसे चित्तके व्याकुल हो जानेपर शरीरमें क्षोभ हो जाता है; इसलिये क्रोधी मनुष्य अपने आगेका उचित मार्ग नहीं देख पाता। वह उचित मार्गको न देखकर कुमार्गकी ओर उसी प्रकार दौड़ता है, जिस प्रकार बाणसे घायल हुआ हरिण अपने स्वाभाविक मार्गको छोड़कर अन्य मार्गकी ओर दौड़ता है। प्राण-वायुके विषम चलनेपर कफ, पित्त आदिके भर जानेसे नाड़ियाँ विषम स्थितिको प्राप्त हो जाती हैं, जैसे राजाके अव्यवस्थित हो जानेपर वर्णाश्रमकी मर्यादा विषम-स्थितिको—विप्लवदशाको प्राप्त हो जाती है। प्राण-वायुके संचारका क्रम बिगड़ जानेसे खाया हुआ अन्न कुजीर्णता, अजीर्णता
४५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
या अजीर्णतारूप दोषको ही प्राप्त होता है । इस तरह आधिसे व्याधि उत्पन्न होती है और आधिके अभावसे व्याधि भी नष्ट हो जाती है । जिस प्रकार मन्त्रोंसे व्याधियाँ विनष्ट होती हैं—वह भी क्रम तुम सुनो। जिस तरह हर्रेका फल खानेसे स्वाभाविक ही दस्त लग जाते हैं, उसी तरह वायु, अग्नि, पृथ्वी, जल आदिके बीजरूप यँ रँ लँ वँ आदि मन्त्रोंके वर्ण भी मान्त्रिक भावनाके वशमें नाड़ियोंमें रोगाकारमें परिणत अन्नरसोंका उत्सारण, पाचन आदि कार्य करते हैं । साधु-सेवारूप पवित्र पुण्यक्रियासे मन निर्मलताको प्राप्त होता है । चित्तके शुद्ध हो जानेपर शरीरमें आनन्द बढ़ता है । अन्तः-करणकी शुद्धिसे ये प्राणवायु अपने क्रमसे बहते हैं और अन्नका उचित परिपाक करते हैं। इससे सब व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं । श्रीराम ! इस प्रकार आधि और व्याधिके नाश तथा उत्पत्तिके क्रमका वर्णन मैंने तुमसे कर दिया । अब तुम प्रकृत प्रसंगको सुनो ।
राघव ! पुर्यष्टक नामक लिङ्गात्मक जीवकी आधार-भूत कुण्डलिनीको तुम सुगन्धकी आधारभूत पुष्पमञ्जरीकी भाँति जानो । पूरकके अभ्याससे जब प्राणी कुण्डलिनीको भर करके यानी कूर्माकार नाड़ीमें प्राणवायुको रोक-कर समरूपसे स्थित होता है, तब मेरु पर्वतके समान स्थिरता अर्थात् भैरवी सिद्धि तथा कायाकी गुरुता ( गरिमा नामक सिद्धि ) उसे प्राप्त होती है । जिस समय पूरकसे पूर्ण शरीरके भीतर मूलाधारसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त लंबा करके प्राणवायुको ऊपर खींचकर प्राणवायुके निरोधसे उत्पन्न गरमी और तद्युक्त शारीरिक और मानसिक कष्ट सहन करनेके लिये संवित् ( कुण्डलिनी ) ऊपरकी ओर पहुँचायी जाती है । उस समय प्राणवायुको ऊपर खींचनेसे दण्डके सदृश लंबी होकर वह कुण्डलिनी देहमें बँधी हुई लताके समान सब नाड़ियोंको अपने साथ लेकर अधिक अभ्यास होनेके कारण सर्पिणीकी भाँति शीघ्र ऊपर चली जाती है । उस समय नाड़ियोंमें वायु भर जानेसे पैरसे लेकर मस्तकतक बिल्कुल हलके हुए इस शरीरको कुण्डलिनी इस प्रकार ऊपर उठा ले जाती है, जिस प्रकार पवनमें पूर्ण जलगत भारी मनुष्यको जलके ऊपर उठा ले जाती है, यही योगियोंका आकाशगमन है । इस प्रकार अभ्याससे युक्त आकाशगामी योगसे* अर्थात् आकाशके साथ शरीरका सम्बन्ध रखनेके लिये किये गये संयमरूप योगसे योगी लोग ऊर्ध्व गतिको प्राप्त हो जाते हैं । जिस समय दूसरी नाड़ियोंके व्यापारको रोक देनेवाले रेचक प्राणायामके प्रयोगसे ऊपरकी ओर खींच ली गयी कुण्डलिनीरूपा प्राणशक्ति सुषुम्ना नाड़ीके भीतर प्राणवायुके प्रवाहसे मस्तकके दोनों कपालोंकी संधिरूप कपाट ( किवाड़ ) के बारह-बारह अंगुल स्थानमें मुहूर्तभरके लिये स्थित रहती है, उस समय आकाशगामी सिद्धोंके दर्शन होते हैं;† किंतु अज्ञानका आश्रय करनेवाला मलिन पुरुष इन्द्रियोंसे या दूसरे किसी अदिव्य उपायसे या इस पृथ्वीपर विचरण करनेवाला कोई भी पुरुष वायुरूप आकाशगामी सिद्धोंको कभी नहीं देख सकता । परंतु राघव ! योगके अभ्याससे मनके संस्कृत हो जानेपर विषयोंसे दूर संस्थित बुद्धिरूपी नेत्रसे स्वप्नकी भाँति आकाशगामी सिद्ध दिखायी देते हैं और वे अभीष्ट अर्थोंको भी देते
* इसका वर्णन योगदर्शनमें इस प्रकार आया है—
'कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतू-
लसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ।'
( योग० विभूति० ४२ )
'शरीर और आकाशके सम्बन्धमें संयम करनेसे अथवा हल्की वस्तु ( रूई आदि ) में संयम करनेसे आकाशमें चलनेकी शक्ति आ जाती है ।'
† योगदर्शनमें बतलाया गया है—
'मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ।' ( योग० विभूति० ३२ )
'सिरके कपालमें एक छिद्र है, इसीको ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं, वहाँ जो प्रकाशमयी ज्योति है उसमें संयम करनेवालेको पृथ्वी और स्वर्गके बीचमें विचरण करनेवाले सिद्धोंके दर्शन होते हैं ।'
निर्वाण-प्रकरण पू०] * ज्ञानसाध्य वस्तु और योगियोंकी परकाय-प्रवेश-सिद्धिका वर्णन * ५४७
हैं। जिस प्रकार स्वप्नमें पदार्थोंका अवलोकन होता है, उसी प्रकार सिद्धोंके भी दर्शन होते हैं। केवल स्वप्नकी अपेक्षा विशेषता यही है कि सिद्धोंकी प्राप्तिमें संवाद, वरदान आदि फलरूप पदार्थोंकी प्राप्ति होती है।
रेचक प्राणायामके अभ्यासरूप युक्तिसे मुखसे बारह-बारह अंगुलपरिमित देशमें प्राणको चिरकालतक स्थित रखनेपर योगी अन्य शरीरमें प्रवेश कर सकता है। सारे शरीरमें प्रदीप्त उस जाठराग्निसे स्वभावतः शीत-वातात्मक वह शरीर ऐसे ही उष्णताको प्राप्त होता है जैसे सूर्यसे तीनों लोक। तारोंके आकारके समान तथा हृदयपद्ममें सुवर्ण-भ्रमरके सदृश वह तेज इस शरीरमें चारों ओर विचरता है, जो योगियोंकी—चिन्त्य दशाको प्राप्त है अर्थात् योगी लोग जिसकी उपासना करते हैं। इस प्रकारसे उपासित वह तेज प्रकाशस्वरूप ज्ञान प्रदान करता है, जिससे लाख योजनकी दूरीपर स्थित वस्तु भी सदा आँखोंके सामने दिखायी देती है। उष्ण-प्रकृति प्राणवायु अग्निरूप हैं तथा शीतल-प्रकृति अपान वायु चन्द्र-स्वरूप हैं। छाया और घामकी भाँति ये दोनों मुखरूप मार्गमें स्थित रहते हैं। (सर्ग ८१)
ज्ञानसाध्य वस्तु और योगियोंकी परकाय-प्रवेश-सिद्धिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! योगके द्वारा साध्य अणिमादि पदार्थोंका साधन तुम सुन चुके। अब श्रवण-मनन ज्ञानके द्वारा साध्य विषयको सुनो। इस संसारमें एक, अद्वितीय, शुद्ध, सौम्य, अनिर्देश्य, सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर और शान्तिमय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही है। न यह दृश्य जगत् है, न इसकी कोई क्रिया है। यह जीव इस मिथ्या शरीरको सङ्कल्प-भ्रमसे उसी प्रकार देखता है, जिस प्रकार बालक उद्दण्ड प्रेतको। जब प्रज्वलित ज्ञानदीपसे उत्तम प्रकाश हो जाता है, तब इस जीवका सङ्कल्पमोह उसी तरह विनष्ट हो जाता है, जिस तरह शरत्कालमें मेघ। जागनेपर जैसे प्राणी स्वप्नके संसारको नहीं देखता, वैसे ही सच्चिदानन्द परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर जीवात्मा देहको आत्मबुद्धिसे नहीं देखता। अनात्त्विक शरीर आदिमें तात्त्विक भावनासे यह जीव देहसे आवृत होकर स्थित रहता है; किंतु एक ब्रह्मतत्त्वकी भावनासे देहसे रहित, श्रीमान् और परम सुखी हो जाता है। अनात्म शरीर आदिमें जो आत्माकी भावना है, वह हृदयका बड़ा भारी अन्धकार है। वह सूर्य आदिके प्रकाशसे दूर नहीं किया जा सकता। वह अज्ञान-अन्धकार तो परमात्मामें ही आत्म-भावनासे—'सर्वव्यापक निरञ्जन और निर्मल सच्चिदानन्द ब्रह्म मैं ही हूँ'—इस यथार्थ ज्ञानरूपी सूर्यसे ही नष्ट होता है।
अन्य तत्त्वज्ञानी योगी लोग जिस पदार्थकी जिस रीतिसे भावना करते हैं, वे उस पदार्थको उसी रीतिसे शीघ्र अपनी उस दृढ़भावनाके बलसे देख लेते हैं किंतु राघव ! दृढ़भावनाके अनुसन्धानसे विमूढ़ अज्ञानी प्राणी तो विष-को अमृतके समान और अमृतको भी विषके समान समझ लेते हैं। इस प्रकार दृढ़ भावनासे जिस विमूढ़ अज्ञानी प्राणीके द्वारा जिस पदार्थकी जिस रीतिसे भावना की जाती है, उसी समय वह प्राणी वही बन जाता है, यह संसारमें देखा भी जाता है। जैसे स्वप्नका संसार स्वप्नमें प्रत्यक्षकी ज्यों दीखता है, वैसे ही सत्यकी भावनासे देखा गया यह शरीर हो जाता है और असत्यकी भावनासे विवेकपूर्वक देखा गया यह शरीर शून्यताको—अभावको प्राप्त हो जाता है।
साधुस्वभाव श्रीराम ! अणिमादि पदकी प्राप्तिमें तुमने इस प्रकारसे ज्ञानयुक्ति तो सुन ली। अब तुम वह दूसरी युक्ति सुनो। जिस तरह वायु पुष्पमेंसे गन्ध खींचकर उसको घ्राणेन्द्रियके साथ सम्बन्ध कर देता है, उसी तरह योगी