भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 750 में से

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पृष्ठ 478

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा भगीरथका सर्वस्वत्याग, भिक्षाटन और गुरु त्रितलके साथ निवास * ४२५


त्रितल बोले—राजन् ! पौरुष-प्रयत्नसे विषय-भोगोंकी भावनाका त्याग कर फिर परमात्माकी सत्ताका अनुभव करनेसे अहंकारका विनाश हो जाता है । जबतक सम्पूर्ण पदार्थोंका सर्वथा त्याग नहीं किया जाता, तबतक यह अहंकार बना रहता है । यदि विवेकपूर्वक विचार-बुद्धिसे सबका परित्याग करके तुम निश्चल होकर स्थित हो जाओ तो अहंकारका अभाव होकर तुम परमपद-स्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाओगे । यदि तुम्हारे सम्पूर्ण राजचिह्न आदि विक्षेपोंका त्याग हो जाय, यदि तुम भयने रहित हो जाओ, यदि तुम समस्त धनादिकी इच्छाओंका त्याग कर दो, यदि तुम शत्रुओंके लिये ही सम्पूर्ण ऐश्वर्यका त्याग करके और अकिञ्चनभावको प्राप्तकर अहंभावसे निवृत्त हो जाओ, यदि तुम अपने देहके अभिमानसे रहित होकर उन सब शत्रुओंमें ही भिक्षाटन करने लगो तो तुम उच्च-से-उच्च स्थितिको प्राप्त होकर परमपदरूप परमात्माको प्राप्त हो जाओगे ।

( सर्ग ७४ )


राजा भगीरथका सर्वस्वत्याग, भिक्षाटन और गुरु त्रितलके साथ निवास, भगीरथको पुनः राज्यप्राप्ति और ब्रह्मा, रुद्र आदिको आराधना करनेसे गङ्गाजीका भूतलपर अवतरण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तदनन्तर उन गुरुजीके मुखसे इस प्रकारका उपदेश सुनकर राजा भगीरथ मनमें कर्तव्य निश्चित कर उसके अनुष्ठानमें तत्पर हो गया । कुछ ही दिन व्यतीत होनेपर राजा भगीरथने एकमात्र सर्वत्यागकी सिद्धिके लिये अग्निष्टोम यज्ञका अनुष्ठान किया । उसमें उसने ब्राह्मणों तथा अपने बन्धुओंको गौ, पृथ्वी, घोड़े, सुवर्ण आदि समस्त धन दे दिया । तदनन्तर उसने सम्पूर्ण धनसे खाली तथा चिन्तामग्न मन्त्री, नागरिक, प्रजा आदिसे युक्त अपने राज्यको तृणके समान समझकर सीमाके पासके अपने शत्रुको दे दिया । जब महल, मण्डल एवं राज्यपर शत्रुने अधिकार कर लिया, तब मननदीन राजा भगीरथ एकमात्र कटिवस्त्र धारण किये अपने मण्डलसे निकल गया । अपने मण्डलसे निकलकर धैर्यवान् राजा भगीरथने अपनी राजधानीसे बहुत दूरके गाँवों और वनोंमें निवास किया, जहाँ लोग उसके नाम-रूपको नहीं पहचान सकते थे । इस प्रकार व्यवहार करते हुए राजा थोड़े ही समयमें समस्त एषणाओंसे रहित हो उत्तम उपरतिके कारण परमात्मामें परम विश्रामको प्राप्त हो गया ।

किसी समय राजा भगीरथ घूमता हुआ अपने नगरमें ही चला आया और वहाँ उसने अनेक घरों, नागरिकों और मन्त्रियोंसे भिक्षाकी याचना की । उन नागरिकों और मन्त्रियोंने राजा भगीरथको पहचान लिया और उन विषादयुक्त लोगोंने पूजन-सामग्रीसे विधिवत उसकी पूजा की

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