भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 477

४३४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


उत्पन्न हुआ। वह राजा एकान्तमें असमञ्जसमें पड़कर व्याकुल हो इस संसारयात्राका प्रतिदिन यों विचार करने लगा—'इस संसारमें, जिसके प्राप्त हो जानेसे दूसरा कोई प्राप्य पदार्थ अवशिष्ट नहीं रहता, मैं उसी कर्मको सुकृत समझता हूँ। शेष कर्म तो विषूचिका (हैजेकी बीमारी) है। पुनः-पुनः पर्युषित कर्म करता हुआ मूढ-बुद्धि प्राणी लज्जित नहीं होता। कोई मूर्ख प्राणी तो अवश्य ही बालककी तरह बार-बार एक ही कर्म करता रहता है।' इस तरह चिन्ता करनेके अनन्तर संसारसे अत्यन्त भयभीत उद्विग्न-मन राजा भगीरथने एक दिन अपने गुरु त्रितलसे पूछा।

भगीरथने कहा—विभो! बहुत कालसे इन सारहीन सांसारिक वृत्तिरूप बड़े-बड़े जंगलोंमें भटकते हुए हम सब अत्यन्त खिन्न हो गये हैं। भगवन्! संसारमें फँसानेवाले जरा-मरण-मोहादिरूप सब दुःखोंका अन्त कैसे होता है?

त्रितल बोले—निष्पाप राजन्! चिरकालसे अभ्यस्त अन्तःकरणकी समतासे उत्पन्न, निर्विशेष, अखण्ड और व्यापक ज्ञेय परमात्माके ज्ञानसे सब दुःख नष्ट हो जाते हैं, सारी ग्रन्थियाँ सब ओरसे टूट जाती हैं, सारे संशय तथा कर्म शान्त हो जाते हैं। राजन्! तत्त्वज्ञानियोंने शुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्माको ही ज्ञेय बतलाया है और वह परमात्मा सर्वव्यापी तथा नित्य है। वह उत्पत्ति-विनाशसे रहित है।

भगीरथने कहा—मुनीश्वर! यह तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि चिन्मय, निर्गुण, शान्त, निर्मल और अच्युत परमात्मा है तथा देह आदि अन्य कुछ भी नहीं है—कल्पनामात्र है। किंतु भगवन्! ज्ञेयरूप परमात्माके स्वरूपमें मेरी अचल स्थिति (समाधि) नहीं हो रही है। इसमें क्या कारण है? मैं किस उपायसे उसे प्राप्त करूँ?

त्रितल बोले—हृदयाकाशमें यह चित्त जब ज्ञानके द्वारा ज्ञेयरूप परमात्मामें स्थिर हो जाता है, तब यह जीव सर्वात्मरूप परमात्माको प्राप्त होकर पुनः संसारमें उत्पन्न नहीं होता। पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्तिका अभाव, ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना, अनन्ययोगसे—आत्मा ही ब्रह्म है, ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई पदार्थ है ही नहीं, इस प्रकारकी अभेदभावनासे निरन्तर आत्मामें ब्रह्म-भावना, एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और विषयासक्त मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना, अध्यात्म-ज्ञानमें नित्य-स्थिति और तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना—यह सब ज्ञान है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है, ऐसा कहा गया है। राजन्! अहम्भावकी शान्ति हो जानेपर राग-द्वेषका विनाश कर देनेवाला तथा जन्म-मरणरूप संसार-व्याधिकी औषध परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जाता है।

भगीरथने कहा—महाभाग! पर्वतमें दीर्घकालसे सुदृढ हुए वृक्षकी तरह अपने शरीरमें दीर्घकालसे सुदृढ हुए अहम्भावका मैं कैसे त्याग करूँ?