भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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४३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

'प्रभो! आप अपना राज्य ले लीजिये, इस प्रकार शत्रु-द्वारा प्रार्थना किये जानेपर भी उस मननशील राजाने, जिसने सर्वत्याग कर दिया था, भोजनके सिवा तृणमात्र भी ग्रहण नहीं किया। कुछ दिन वहींपर बिताकर वह अन्यत्र चला गया। लोगोंने उस समय 'क्या ये ही भगीरथ राजा हैं? ये ही हमलोगोंको छोड़कर चले गये? अहो! महान् कष्ट है।' इस प्रकार उसके विषयमें शोक किया। तदनन्तर दूसरे स्थानोंमें विचरण करते हुए शान्तचित्त, स्थिरबुद्धि एवं परम सुखी वह नरेश किसी समय अपने आत्माराम त्रितल नामक गुरुके पास गया। प्रणाम आदिसे अपने गुरुका स्वागत-सत्कार करके उनके साथ कुछ कालतक पर्वत, वन, गाँव और नगरमें तथा अनेक सत्पुरुषोंके बीच निवास किया। वे दोनों उत्तम मुनि अपने पूर्वकृत कर्मोंके फलस्वरूप प्राप्त हुए सुख और दुःख, दोनोंका आदर करते थे। वे समस्त इच्छाओंसे रहित थे और सबके भी समरूप सच्चिदानन्द ब्रह्ममें एकरस होकर परम शान्तिको प्राप्त हो गये थे।

किसी एक अन्य देशमें विद्यमान उत्तम नगरमें पुत्र-रहित राजाकी मृत्यु हो गयी थी। शासकके अभावके कारण जिनके देशकी प्रजा-पालन-मर्यादा नष्ट हो चुकी थी, उस देशके उदास मन्त्री आदि प्रजावर्ग प्रजा-पालनयोग्य उदार गुण-लक्ष्मीसे युक्त किसी एक सुन्दर राजाकी खोजमें थे। वे मन्त्री आदि प्रजावर्ग भिक्षाचर्यामें रत, विरक्त, तपस्वी भगीरथ मुनिके पास पहुँचे। वे उनको प्रजापालन-योग्य समस्त शुभ गुणोंसे युक्त जानकर आदर-सत्कार-पूर्वक ले आये और उनको सेनासहित गन्धपपर अभिषिक्त करके राजा बना दिया। तदोत्तर उस राज्यका परिपालन करते हुए राजा भगीरथके पास पहले आदर पाये हुए कोशल देशके मन्त्री, पुरोहित आदि प्रजावर्ग भी आये और राजाधिराज भगीरथसे यों कहने लगे।

प्रजावर्गने कहा—राजन् ! अयोध्याका राज्य छोड़ते समय आपने सीमाके पासमें स्थित अपने जिस शत्रु राजाको राज्यदानसे पुरस्कृत किया था, उसको मृत्युने निगल लिया है। इस कारण अपने पूर्वराज्यकी रक्षा करनेकी