संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 480, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू०] * शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ * ४३७
आप दया कीजिये। बिना इच्छाके प्राप्त हुए राज्यका त्याग करना उचित नहीं।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! इस प्रकार प्रजावर्गके प्रार्थना करनेपर राजा भगीरथने उनकी बात मान ली और वे सात समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीके स्वामी हो गये। राजा भगीरथ सर्वत्र समभाव रखनेवाले, शान्तचित्त, मननशील, वीतराग एवं मत्सर-रहित थे। जिन्होंने अश्वका अन्वेषण करनेके लिये भूमि खोदकर सागरके सदृश गर्त निर्माण किया था और जो कपिलकी क्रोधाग्निसे पातालतलमें भस्मीभूत हो चुके थे, उन अपने पितामहोंको तारनेमें गङ्गाजल ही समर्थ है, जब यह बात राजाने सुनी; तब भूतलपर गङ्गाजीको लानेके लिये जितेन्द्रिय पृथ्वी-पति भगीरथ मन्त्रियोंके सिरपर समस्त राज्यभार छोड़कर तपके लिये निर्जन अरण्यमें चले गये। उस अरण्यमें हजार वर्षतक ब्रह्माजी, शंकरजी और जह्नु मुनिकी बार-बार आराधना करके वे इस पृथ्वीतलपर गङ्गाजीको ले आये। तभीसे ये पुण्यतोया त्रिपथगा गङ्गाजी, जो निर्मल तरङ्ग-मालाओंसे रक्षित जगत्पति शशिभूषण शिवजीके मस्तकमें सुशोभित तथा महात्माओंके महान् पुण्योंकी राशि हैं, आकाशतलसे पृथ्वीपर गिरती हैं। चञ्चल तरङ्गमालाओंसे सुशोभित, अपने फेनपुञ्जरूप हाससे युक्त, प्रसन्न पुण्यरूपा मञ्जरीसे समन्वित तथा धर्मकी संततिस्वरूप यह त्रिमार्गगामिनी गङ्गा उसी समयसे इस पृथ्वी-पर पृथ्वीपति भगीरथकी समुद्रपर्यन्त कीर्ति विस्तार करनेके लिये एक तरहकी वीथिका ही बन गयी हैं। (सर्ग ७५-७६)
शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ, शिखिध्वजके गुणोंका तथा चूडालाके साथ विवाह और क्रीडाका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन! अब तुम अविचल राजा शिखिध्वजकी तरह शान्तिपूर्वक अपने स्वरूपमें स्थित रहो।
श्रीरामजीने पूछा—महान्! यह शिखिध्वज कौन था और उसने परमपद कैसे प्राप्त किया? गुरुवर! उसका चरित्र मुझसे कहिये, जिससे मैं उसे अच्छी प्रकार जान सकूँ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम! अतीतकालीन सातवें मन्वन्तरकी चतुर्थ चतुर्युगीके द्वापर युगमें कुरुवंशमें इसी महासर्गमें शिखिध्वज नामका राजा हुआ था। जम्बूद्वीपमें प्रसिद्ध विन्ध्याचलके समीपवर्ती मालवदेशकी उज्जयिनी नगरीमें वह राजा राज्य करता था। वह धैर्य, औदार्य आदि गुणोंसे युक्त था। उसमें क्षमा, शम, दम विद्यमान थे। वह वीरतासे पूर्ण था। शुभ कर्मोंके अनुष्ठानमें लगा रहता था। मितभाषी था। इस प्रकार वह अनेक गुणोंका खजाना था। समस्त यज्ञोंका निरन्तर अनुष्ठान