भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

४५० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ-

समुदाय भी शरीरावयवरूप ही है, इसलिये वह भी जड ही दीख पड़ता है। संकल्पात्मक शक्ति रखनेवाला जो मन है, उसे भी मैं जड ही मानती हूँ; क्योंकि ज्ञानेन्द्रियाँ मनसे ही प्रेरित होती हैं। जैसे गोफनसे पाषाण प्रेरित होता है, वैसे ही मन भी बुद्धिके निश्चयोंसे प्रेरित होता है; इस तरह निश्चयरूपा बुद्धि भी जड ही है, यह अटल निश्चय है। अहंकार भी सारशून्य तथा मुर्देके सदृश है, इसलिये जड ही है; क्योंकि बुद्धि अहंकारसे प्रेरित होती है। अहंकार भी जड ही है, क्योंकि वह जीवात्मासे अध्यस्त है। यह चेतन जीव प्राणवायुरूप उपाधिसे उपहित हुआ हृदयमें रहता है। वह परमात्माका अंश होनेके कारण परमात्माकी सत्तासे ही सत्तावान् है। चेतनस्वरूप आत्मा मिथ्या जड विषयोंके साथ तादात्म्य एवं संसर्गका अभ्यास करके ही जड-जैसा बन जाता है और अपने असली शुद्ध चिन्मय स्वरूपको भूल जाता है। चेतन जीवात्माकी विषयोंके साथ एकाग्रता होनेपर वह एक क्षणमें अपने स्वरूपको भूलकर तत्स्वरूप हो जाता है। इस प्रकार जब विषयोंके सम्मुख होनेसे यह चेतन जीवात्मा जड, शून्य, मिथ्याके समान हो जाता है, तब चिन्मय परमात्माके द्वारा प्रबोधित किया जाता है।'

इस प्रकार विचारकर फिर उस चूडालाने यह सोचा कि किस उपायसे यह जीवात्मा प्रबुद्ध हो। बहुत समयके बाद उसने आत्मतत्त्वको जान लिया और वह कहने लगी—'अहो! बड़े आनन्दका विषय है कि दीर्घकालके बाद मुझे उस निर्विकार जानने योग्य परमात्माके स्वरूपका अनुभव हो गया, जिसे जान लेनेपर पुरुष फिर उससे च्युत नहीं होता। वास्तवमें एक महान् चेतन परमात्मा ही इस संसारमें सत्यरूपसे विराजमान है। उसको महासत्ता भी कहते हैं। यह निष्कलङ्क, समरूप, विशुद्ध और अहंकाररहित है। उसका स्वरूप शुद्ध विज्ञान ही है। वह परम मङ्गलमय केवल सत्यस्वरूप है। वह अपने परमानन्द-स्वरूपसे कभी विचलित नहीं होता। एक बार उसका साक्षात्कार हो जानेपर वह फिर सदा प्रत्यक्ष रहता है, उसका कभी अभाव नहीं होता। वह ब्रह्म, परमात्मा आदि नामोंसे कहा गया है। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयरूप त्रिपुटी इस परमात्मासे भिन्न कोई वस्तु नहीं है। वह चेतन परमात्मा ही मन, बुद्धि, आदि इन्द्रिय पदार्थोंके रूपमें प्रकट होकर क्रियाशील होता है। जैसे समुद्रके जलमें तरङ्ग आदि वास्तवमें उत्पन्न न हुए भी उत्पन्न हुए-से प्रतीत होते हैं, वैसे ही महाचेतनमें जगत् वास्तवमें उत्पन्न न होते हुए भी उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता है। इस नित्य चिन्मय परमात्माके जन्म, मरण, सद्गति, असद्गति या नाशकी कहीं सम्भावना ही नहीं है। यह परमात्मा अच्छेद्य, अदाह्य और परम विशुद्ध है। अहा! मैं बहुत कालके बाद शान्त होकर सब ओरसे परम निर्वाणपदको प्राप्त हुई हूँ। कुम्हार आदिके द्वारा बनायी गयी मृत्तिकाकी सेना जैसे मृत्तिकारूप ही है, वैसे ही सुर, असुर आदिसे युक्त यह विश्व स्वभावतः परब्रह्मस्वरूप ही है तथा द्रष्टा एवं दृश्यरूप सत्ता भी एक चैतन्य-स्वरूप ही है। यह ऐक्य है, यह द्वैत है; यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ इत्यादि भ्रमजनित मोह क्या चीज है और वह किस तरह, किसको, कहाँसे और कहाँ हुआ है? अर्थात् किसीको कहीं नहीं। यह सब मिथ्या है। अतः मैं अपने अंदर अनन्त पारमार्थिक स्वरूपको अनायास प्राप्तकर अब शान्तरूपसे स्थित हूँ। न तो इदं है, न अहं है और न दूसरा है एवं न भाव है ओर न अभाव ही है। सब कुछ शान्त, निरालम्ब केवल परब्रह्मस्वरूप परमात्मा ही है।' इस प्रकार परमात्माके मननमें परायण वह चूडाला यथार्थ ज्ञानके द्वारा उस परमात्माके वास्तविक स्वरूपको तत्त्वसे जानकर राग, भय, मोह आदि अज्ञान-विकारोंके शान्त होनेसे उसी प्रकार शान्त हो गयी, जैसे शरत्-कालमें आकाश बादलोंसे रहित हो जाता है। (सर्ग ७८)