संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * चूडालाको अपूर्व शोभासम्पन्न देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना * ४४१
चूडालाको अपूर्व शोभासम्पन्न देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना और उससे वार्तालाप करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! चूडाला संसारके सम्बन्धों, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों, राग और इच्छाओंसे रहित हो गयी थी। वह न किसी पदार्थका ग्रहण करती थी और न किसीका त्याग करती थी। केवल न्यायसे प्राप्त आचरण करती थी। संसाररूपी महासमुद्रको वह पार कर गयी थी। संदेहरूपी जालसे मुक्त हो गयी थी। वह परमात्माके महान् लाभसे परिपूर्ण हो गयी थी। इस प्रकार सुन्दर वर्णवाली शिखिध्वजकी श्रेष्ठ धर्मपत्नी वह चूडाला थोड़े ही कालमें जाननेयोग्य परमात्माको यथार्थ जान गयी। अपने विवेकके दृढ़ अभ्यास-बलसे परमात्माका यथार्थ अनुभव हो जानेपर वह परम शोभा पाने लगी। किसी समय उस सुन्दर अङ्गोंवाली चूडालाको अपूर्व शोभासे युक्त देख राजा शिखिध्वजने हँसते हुए कहा—'प्रिये ! इस समय तुम वैसे ही अत्यन्त सुशोभित हो रही हो, जैसे तुमने अमृतका सार पी लिया हो या अलभ्य परमात्मपदकी प्राप्ति कर ली हो अथवा आनन्दप्रवाहसे तुम परिपूर्ण हो गयी हो। इस समय मैं तुम्हारे चित्तको भोग लालसासे रहित, शान्त, विवेकसे बलिष्ठ, समताको प्राप्त, गम्भीर और चञ्चलतारहित देख रहा हूँ। तुम्हारे मनके साथ किसी भी विभ्रमानन्दकी वस्तुसे उपमा नहीं दी जा सकती। भद्रे ! क्या तुमने अमृत पी लिया है या किसी साम्राज्यकी प्राप्ति कर ली है या मन्त्रके प्रयोग या योगके साधनसे अमरता प्राप्त कर ली है? नीलकमलके सदृश नेत्रोंवाली ! क्या तुमने राज्य, चिन्तामणि और त्रैलोक्यसे भी बढ़कर किसी अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति कर ली है?'
चूडालाने कहा—आर्य ! इस समस्त विनाशशील संसारका त्यागकर इससे भिन्न सत्-असत्-स्वरूप सर्वात्मक परमात्माका मैंने आश्रय लिया है, इसीलिये मैं परम श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। एकमात्र आकाश-सदृश विमल अद्वितीय केवल हृदयरूप चिन्मय हृदमें अकेली ही मैं रमण करती हूँ, राजलीलाओंमें मैं कभी रमण नहीं करती; इसलिये मैं परम श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। मूल्यवान् आसन, उद्यान और घरोंमें रहकर भी मैं परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहती हूँ तथा विषय-भोगोंसे दूर हूँ; इसीलिये मैं परम शोभायुक्त हुई स्थित हूँ। मैं सुख-सम्पत्ति नहीं चाहती, न अर्थ और अनर्थको ही चाहती हूँ; दूसरी किसी प्रकारकी स्थिति भी नहीं चाहती। जो कुछ न्यायसे प्रारब्धानुसार प्राप्त होता है, उसीसे संतुष्ट रहती हूँ। इसीसे मैं परम श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। राग और विद्वेषको विनष्ट कर देनेवाली आत्मविषयक बुद्धि और शान्तदृष्टिरूपी सखियोंके साथ मैं रमण करती हूँ; इसलिये मैं परम शोभासम्पन्न होकर स्थित हूँ।
(सर्ग ७९)