संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * क्रमसे उन दोनोंकी वैराग्य एवं अध्यात्मज्ञानमें निष्ठा * ४३९
बस जानेके कारण मानो एकरूप ही हो गये थे । जैसे ब्रह्मचारी नियतकालतक गुरुमुखसे अध्ययन करके समस्त शास्त्रोंका पण्डित हो जाता है, वैसे ही कुछ नियतकाल-तक अपने स्वामीके मुखसे सुन-सुनकर समस्त शास्त्रोंके तात्पर्यमें और चित्रकला आदिमें भी चातुर्य प्राप्तकर चूडाला समस्त विषयोंकी पण्डिता हो गयी थी तथा चूडालाके द्वारा इस शिखिध्वजने भी नृत्य, वाद्य आदि जितने कला-कौशल हैं, उन सबका शिक्षण ग्रहण किया और वे कलाओंके पारंगत विद्वान् हो गये । उन दोनोंकी बुद्धि चातुर्यसे युक्त तथा सुन्दर थी । वे दोनों स्नेहसे प्रसन्न और मधुर लगते थे । ज्ञानतत्त्वका कथन करनेमें भी वे समान थे । श्रेष्ठ पुरुषोंका अनुकरण करते थे । सदाचार-परायण थे । प्रजाजनोंके वृत्तान्तका भी ज्ञान रखते थे । वे समस्त कलाओंके पण्डित एवं शृङ्गारादि नवरसरूपी रसायनोंसे सुशोभित थे ।
(सर्ग ७७)
क्रमसे उन दोनोंकी वैराग्य एवं अध्यात्मज्ञानमें निष्ठा तथा चूडालाको यथार्थ ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इसी प्रकार अनेक वर्षोंतक दृढ़ प्रेमसे सम्पन्न उस दम्पतीने प्रतिदिन यौवनकी आनन्द लीलाओंद्वारा रमण किया । यों एकके बाद एक करके अनेक वर्ष बीत गये और फूटे हुए घड़ेसे जलके क्षय होनेकी भाँति धीरे-धीरे तारुण्यका क्षय होते देख उन दोनोंने विचार किया—'समुद्रकी तरङ्गोंके समान चञ्चल, क्षणभङ्गुर शरीरसे व्यवहार करनेवाले जीवका पके हुए फलके पतनकी तरह मरण अवश्यम्भावी है । अब इस देहमें वृद्धावस्था आनेकी तैयारी कर रही है; क्योंकि आयु निरन्तर क्षीण होती जाती है । यह जीर्ण जीवन इन्द्रजालके सदृश असत्य ही है । यह शरीर वर्षाकालमें जलके बुद्बुदकी भाँति क्षणभरमें ही विलीन हो जानेवाला है । विचार -करनेसे जगत्का यह व्यवहार कदली-गर्भके सदृश निस्सार ही सिद्ध होता है । इस संसारमें ऐसी कौन वस्तु है, जो शुभ, सुस्थिर एवं अत्यन्त सुन्दर हो, अर्थात् कोई भी नहीं है ।' उस दम्पतीने इस प्रकार निश्चय करके संसाररूपी व्याधिकी असली औषध अध्यात्मशास्त्रका दीर्घकालतक विवेकपूर्वक विचार किया । केवल आत्मज्ञानसे ही संसाररूपी महामारी शान्त हो जाती है, यह निर्णयकर वे दोनों आत्माका ज्ञान सम्पादन करनेमें तत्पर हो गये । अध्यात्मज्ञानमें ही उनका चित्त लग गया था । प्राण भी उसीमें लगे थे । उसीमें उनकी निष्ठा थी । अध्यात्मज्ञानका ही उन्होंने आश्रय लिया था । वे उसीकी अर्चनामें लगे रहते थे । उनकी इच्छा भी अध्यात्म-ज्ञानकी ही रहती थी और उस समय इस संसारसे वे दोनों विरक्त हो गये थे । उन्होंने अध्यात्मज्ञानमें ही दृढ़ अभ्यास बढ़ा लिया था । वे एक दूसरेको अध्यात्मज्ञानका ही प्रबोध कराते थे । उनकी प्रीति उसी ज्ञानमें थी एवं परस्पर उनका समस्त आरम्भ उसीमें होता था ।
तदनन्तर वह चूडाला अध्यात्मविषयको जाननेवाले महात्माओंके मुखसे संसार-दुःखसमुद्रसे पार करनेमें समर्थ आत्मज्ञानोपयोगी मनोहर पदक्रमोंसे संयुक्त शास्त्रार्थोंका निरन्तर श्रवण करके बाह्य शरीरके व्यापारोंसे उपरत और उज्ज्वल प्रबुद्धबुद्धिसे युक्त हो अपनी आत्माके विषयमें इस प्रकार अहर्निश विचार करने लगी ।
'अब मैं स्वयं विवेचन करके अपने आपका पता लगाती हूँ कि मैं क्या हूँ तथा यह संसाररूप मोह किसको, कैसे, कहाँसे प्राप्त हुआ है । यह देह तो जड़ है; इसलिये देह मैं नहीं हूँ, यह अटल निश्चय है । हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रिय-समुदाय भी इस शरीरसे अभिन्न अवयवरूप ही हैं । कभी अवयव और अवयवीमें भेद नहीं होता, इसलिये वे भी जड़ ही हैं । ज्ञानेन्द्रिय-