संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू०] * ज्ञानसाध्य वस्तु और योगियोंकी परकाय-प्रवेश-सिद्धिका वर्णन * ५४७
हैं। जिस प्रकार स्वप्नमें पदार्थोंका अवलोकन होता है, उसी प्रकार सिद्धोंके भी दर्शन होते हैं। केवल स्वप्नकी अपेक्षा विशेषता यही है कि सिद्धोंकी प्राप्तिमें संवाद, वरदान आदि फलरूप पदार्थोंकी प्राप्ति होती है।
रेचक प्राणायामके अभ्यासरूप युक्तिसे मुखसे बारह-बारह अंगुलपरिमित देशमें प्राणको चिरकालतक स्थित रखनेपर योगी अन्य शरीरमें प्रवेश कर सकता है। सारे शरीरमें प्रदीप्त उस जाठराग्निसे स्वभावतः शीत-वातात्मक वह शरीर ऐसे ही उष्णताको प्राप्त होता है जैसे सूर्यसे तीनों लोक। तारोंके आकारके समान तथा हृदयपद्ममें सुवर्ण-भ्रमरके सदृश वह तेज इस शरीरमें चारों ओर विचरता है, जो योगियोंकी—चिन्त्य दशाको प्राप्त है अर्थात् योगी लोग जिसकी उपासना करते हैं। इस प्रकारसे उपासित वह तेज प्रकाशस्वरूप ज्ञान प्रदान करता है, जिससे लाख योजनकी दूरीपर स्थित वस्तु भी सदा आँखोंके सामने दिखायी देती है। उष्ण-प्रकृति प्राणवायु अग्निरूप हैं तथा शीतल-प्रकृति अपान वायु चन्द्र-स्वरूप हैं। छाया और घामकी भाँति ये दोनों मुखरूप मार्गमें स्थित रहते हैं। (सर्ग ८१)
ज्ञानसाध्य वस्तु और योगियोंकी परकाय-प्रवेश-सिद्धिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! योगके द्वारा साध्य अणिमादि पदार्थोंका साधन तुम सुन चुके। अब श्रवण-मनन ज्ञानके द्वारा साध्य विषयको सुनो। इस संसारमें एक, अद्वितीय, शुद्ध, सौम्य, अनिर्देश्य, सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर और शान्तिमय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही है। न यह दृश्य जगत् है, न इसकी कोई क्रिया है। यह जीव इस मिथ्या शरीरको सङ्कल्प-भ्रमसे उसी प्रकार देखता है, जिस प्रकार बालक उद्दण्ड प्रेतको। जब प्रज्वलित ज्ञानदीपसे उत्तम प्रकाश हो जाता है, तब इस जीवका सङ्कल्पमोह उसी तरह विनष्ट हो जाता है, जिस तरह शरत्कालमें मेघ। जागनेपर जैसे प्राणी स्वप्नके संसारको नहीं देखता, वैसे ही सच्चिदानन्द परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर जीवात्मा देहको आत्मबुद्धिसे नहीं देखता। अनात्त्विक शरीर आदिमें तात्त्विक भावनासे यह जीव देहसे आवृत होकर स्थित रहता है; किंतु एक ब्रह्मतत्त्वकी भावनासे देहसे रहित, श्रीमान् और परम सुखी हो जाता है। अनात्म शरीर आदिमें जो आत्माकी भावना है, वह हृदयका बड़ा भारी अन्धकार है। वह सूर्य आदिके प्रकाशसे दूर नहीं किया जा सकता। वह अज्ञान-अन्धकार तो परमात्मामें ही आत्म-भावनासे—'सर्वव्यापक निरञ्जन और निर्मल सच्चिदानन्द ब्रह्म मैं ही हूँ'—इस यथार्थ ज्ञानरूपी सूर्यसे ही नष्ट होता है।
अन्य तत्त्वज्ञानी योगी लोग जिस पदार्थकी जिस रीतिसे भावना करते हैं, वे उस पदार्थको उसी रीतिसे शीघ्र अपनी उस दृढ़भावनाके बलसे देख लेते हैं किंतु राघव ! दृढ़भावनाके अनुसन्धानसे विमूढ़ अज्ञानी प्राणी तो विष-को अमृतके समान और अमृतको भी विषके समान समझ लेते हैं। इस प्रकार दृढ़ भावनासे जिस विमूढ़ अज्ञानी प्राणीके द्वारा जिस पदार्थकी जिस रीतिसे भावना की जाती है, उसी समय वह प्राणी वही बन जाता है, यह संसारमें देखा भी जाता है। जैसे स्वप्नका संसार स्वप्नमें प्रत्यक्षकी ज्यों दीखता है, वैसे ही सत्यकी भावनासे देखा गया यह शरीर हो जाता है और असत्यकी भावनासे विवेकपूर्वक देखा गया यह शरीर शून्यताको—अभावको प्राप्त हो जाता है।
साधुस्वभाव श्रीराम ! अणिमादि पदकी प्राप्तिमें तुमने इस प्रकारसे ज्ञानयुक्ति तो सुन ली। अब तुम वह दूसरी युक्ति सुनो। जिस तरह वायु पुष्पमेंसे गन्ध खींचकर उसको घ्राणेन्द्रियके साथ सम्बन्ध कर देता है, उसी तरह योगी