संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ * नविच्छिन्नश्चिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
रेचकके अभ्यासरूप योगसे कुण्डलिनीरूप घरसे बाहर निकलकर ज्यों ही दूसरे शरीरमें जीवका सम्बन्ध करता है, त्यों ही यह शरीर परित्यक्त हो जाता है। जीव-रहित यह देह चेष्टाओंसे रहित होकर काठ और मिट्टीके ढेलेके सदृश पड़ा रहता है। जैसे सिंचन करनेवाला पुरुष जलपूर्ण कुम्भसे वृक्ष और लताको सींचनेकी इच्छा करता है, उसे ही सींचता है, वैसे ही अपनी रुचिके अनुसार देह, जीव, बुद्धि, स्थावर और जङ्गम सबमें उनकी सम्पत्तिका भोग करनेके लिये जीवको प्रविष्ट किया जाता है।
उक्त प्रणालीसे परदेहमें सिद्धिश्रीका उपभोग कर स्थित हुआ योगी यदि अपना पहला शरीर विद्यमान रहा तो उसमें पुनः प्रविष्ट हो जाता है और यदि न रहा तो दूसरे शरीरमें जबतक उसकी रुचि रहती है, तबतक उसमें प्रविष्ट होकर स्थित रहता है। अथवा देहादि सम्पूर्ण कल्पित पदार्थोंको और जगत्को सर्वव्यापी ज्ञानसे परिपूर्ण करके पूर्णरूपसे स्थित रहता है। श्रीराम ! योगरूप ऐश्वर्यसे सम्पन्न चेतन जीवात्मा सदा प्रकट दोषशून्य परमात्म-तत्त्वको जानकर जो भी कुछ जैसा चाहता है, वैसा ही उसे तत्काल प्राप्त कर लेता है। वास्तवमें अनावरणतारूप उत्तम पद ही यथार्थ पद है, यों अनुभवी लोग कहते हैं। (सर्ग ८२)
चूड़ालाकी सिद्धिका वैभव, गुरूपदेशकी सफलतामें किरातका आख्यान, शिखिध्वजका वैराग्य, चूड़ालाका उन्हें समझाना, राजा शिखिध्वजका आधी रातके समय राजमहलसे निकलकर चल देना और मन्दराचलके काननमें कुटिया बनाकर निवास करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार निरन्तर योगका अभ्यास करनेवाली वह राजरानी सती-साध्वी चूड़ाला अणिमा आदि अष्ट सिद्धियोंके गुणोंके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गयी। मोह आदि दोषों तथा त्रिविध तापोंका उपशम हो जानेसे उसका हृदय गङ्गाजीकी भाँति निर्मल और शीतल हो गया। वह कभी आकाशमार्गसे गमन करती थी, कभी समुद्रके भीतर द्वीपोंमें पहुँच जाती थी और कभी स्वेच्छानुसार भूतलपर विचरण करती थी। यों बिजलीकी प्रभाके समान चमकीले आभूषणोंसे विभूषित वह सुन्दरी चूड़ाला आकाशगामिनी होकर यत्र-तत्र घूमने-फिरने लगी। वह मोतियोंमें प्रविष्ट हुए धागेकी भाँति काष्ठ, तृण, पत्थर, भूत, आकाश, वायु, अग्नि, जल आदि सभी पदार्थोंमें निर्विघ्नतापूर्वक प्रवेश कर जाती थी। इस प्रकार उसने मेरुगिरिके शिखरोंपर, लोकपालोंके नगरोंमें और दिशा एवं आकाशके मध्यमें स्थित सारे भुवनोंमें सुखपूर्वक विचरण किया तथा पशु-पक्षी, भूत-पिशाच आदि एवं नाग, देवता, असुर, विद्याधर, अप्सरा और सिद्धोंके साथ सम्भाषण आदि व्यवहार भी किया।