संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उन्मेषकी क्रिया करती है। उसीकी कोई एक शक्ति स्पर्शका ग्रहण करती है, दूसरी कोई शक्ति नासिकाद्वारा श्वास-उच्छ्वासका निर्वाह करती है, कोई एक दूसरी शक्ति अन्नका परिपाक करती है तो कोई अन्य शक्ति वाक्योंका उच्चारण करती है। महाराज ! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ । शरीरमें जो कुछ क्रिया या व्यापार होता है, वह सब शक्तिसम्पन्न वायु ही कराती है, जिस प्रकार यन्त्रचालक कठपुतलीसे नृत्यादि चेष्टा कराता है। उसमें ऊर्ध्वगमन और अधोगमन—ये दो प्रकारके संकेतवाले जो दो वायु प्रसूत होते हैं, वे दोनों श्रेष्ठ वायु प्राण एवं अपान नामसे प्रसिद्ध एवं प्रकट हैं। मुने ! मैं उनकी गतिका सदा अनुसरण करता हुआ स्थित रहता हूँ। उनका स्वरूप सदा शीतल और उष्ण रहता है एवं वे दोनों निरन्तर शरीरके भीतर आकाश-मार्गकी यात्रा करते रहते हैं। उन प्राण और अपान नामक वायुओंकी—जो शरीरमें सदा संचरण करते हैं तथा जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्तिमें सदा समानरूप हैं—गतिका अनुसरण करते हुए मेरे दिन सुषुप्ति-अवस्थामें स्थित मनुष्यकी भाँति व्यतीत हो रहे हैं। एक हजार अंशोंमें विभक्त कमलतन्तुके लेशमात्रकी अपेक्षा भी अत्यन्त दुर्लक्ष्य ये नाड़ियाँ हैं, अतः उनमें विद्यमान इन प्राण और अपान दोनों वायुओंकी भी गति दुर्बोध है। महात्मन् ! हृदय आदि स्थानोंमें निरन्तर विचरण करनेवाले प्राण और अपान वायुओंकी गतिके तत्त्वको जानकर उसका अनुसरण करनेवाला प्रसन्नचित्त पुरुष जन्म-मरणरूपी फाँसीसे छूटकर सदाके लिये मुक्त हो जाता है। वह फिर इस संसारमें लौटकर नहीं आता। ('सर्ग २४)
पूरक, रेचक, कुम्भक प्राणायामका तत्त्व जानकर अभ्यास करनेसे मुक्ति और सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासनाकी महिमा
भुशुण्डने कहा—ब्रह्मन् ! इस प्राणमें स्पन्दन-शक्ति तथा निरन्तर गतिक्रिया रहती है। यह प्राण बाह्य एवं आन्तर सर्वाङ्गोंसे परिपूर्ण देहमें ऊपरके स्थानमें—हृदय-देशमें स्थित रहता है। अपानवायुमें भी निरन्तर स्पन्द-शक्ति तथा सततगति रहती है। यह अपानवायु भी बाह्य एवं आन्तर समस्त अङ्गोंसे परिपूर्ण शरीरमें नीचेके स्थानमें—नाभिदेशमें स्थित रहता है। मुनिवर ! किसी प्रकारके यत्नके बिना प्राणोंकी हृदय-कमलके कोशसे होने-वाली जो स्वाभाविक बहिर्मुखता है, विद्वान्लोग उसे 'रेचक' कहते हैं। बारह अंगुलपर्यन्त बाह्य प्रदेशकी ओर नीचे गये हुए प्राणोंका लौटकर भीतर प्रवेश करते समय जो शरीरके अङ्गोंके साथ स्पर्श होता है, उसे 'पूरक' कहते हैं। अपानवायुके शान्त हो जाननेपर जबतक हृदयमें प्राणवायुका अभ्युदय नहीं होता, तबतक वह वायुकी कुम्भकावस्था (निश्चल स्थिति) रहती है, जिसका योगीलोग अनुभव करते हैं। इसीको आभ्यन्तर कुम्भक कहते हैं। ब्रह्मन् ! मृत्तिकाके अंदर असिद्ध घटकी स्थितिके सदृश बाहर नासिकाके अग्रभागसे लेकर बराबर सामने बारह अंगुलपर्यन्त आकाशमें जो अपानवायुकी निरन्तर स्थिति है, उसे पण्डितलोग 'बाह्य कुम्भक' कहते हैं। अतः बाहर प्राण-वायुके अस्तंगत होनेपर जबतक अपान-वायुका उद्गम नहीं होता, तबतक एकरूपसे स्थित पूर्ण (दूसरा) बाह्य कुम्भक रहता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। प्राण और अपानवायुके स्वभावभूत ये जो बाह्य और आभ्यन्तर कुम्भकादि प्राणायाम हैं, उनका भली प्रकार तत्त्व-रहस्य जानकर निरन्तर उपासना करनेवाला पुरुष पुनः इस संसारमें उत्पन्न नहीं होता। प्राणायामके तत्त्व-रहस्यको जाननेवाले योगीके स्वभावतः अत्यन्त चञ्चल ये वायु चलते, बैठते, जागते या सोते—सभी अवस्थाओंमें उसके इच्छानुसार निरुद्ध हो जाते हैं। मनुष्य अपने भीतर बुद्धिपूर्वक सम्यक् प्रकारसे इन कुम्भक आदि प्राणायामोंका स्मरण करता हुआ जो कुछ करता है या