भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 750 में से

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पृष्ठ 432

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भुशुण्डकी वास्तविक स्थितिका निरूपण * ३२१

सुने। मेरे मनकी चञ्चलता शान्त हो गयी है। मेरा मन शोकसे रहित, स्वस्थ, समाहित एवं शान्त हो चुका है। इसलिये मैं विकार-रहित हुआ चिरकालसे जी रहा हूँ। 'लकड़ी, रमणी, पर्वत, तृण, अग्नि, हिम, आकाश—इन सबको मैं समभावसे देखता हूँ। जरा और मरण आदिसे मैं भयभीत नहीं होता एवं राज्य-प्राप्ति आदिसे हर्षित नहीं होता। इसलिये मैं अनामय होकर जीवित हूँ। ब्रह्मन् ! यह मेरा बन्धु है, यह मेरा शत्रु है, यह मेरा है एवं यह दूसरेका है—इस प्रकारकी भेद-बुद्धिसे मैं रहित हूँ। ग्रहण और विहार करनेवाला, बैठने और खडा रहनेवाला, श्वास तथा निद्रा लेनेवाला यह शरीर ही है, आत्मा नहीं—यह मैं अनुभव करता हूँ। इसलिये मैं चिरजीवी हूँ। मैं जो कुछ किया करता हूँ, जो कुछ खाता-पीता हूँ, वह सब अहंता-ममतासे रहित हुआ ही करता हूँ। मैं दूसरोंपर आक्रमण करनेमें समर्थ हुआ भी आक्रमण नहीं करता, दूसरोंके द्वारा खेद पहुँचाये जानेपर भी दुःखित नहीं होता एवं दरिद्र होनेपर भी कुछ नहीं चाहता; इसलिये मैं विकार-रहित हुआ बहुत कालसे जी रहा हूँ। मैं आपत्तिकालमें भी चलायमान नहीं होता, वरं पर्वतकी तरह अचल रहता हूँ। जगत्-आकाश, देश-काल, परम्परा-क्रिया—इन सबमें चिन्मयरूपसे मैं ही हूँ, इस प्रकारकी मेरी बुद्धि है; इसलिये मैं विकाररहित हुआ बहुत कालसे स्थित हूँ। ज्ञानके पारंगत ब्रह्मन् ! एकमात्र आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही धृष्टतापूर्वक मैंने, जो और जैसा हूँ, वह सब आपसे यथार्थरूपसे बता दिया है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—'ऐश्वर्यपूर्ण पक्षिराज ! यह बड़े हर्षका विषय है, जो आपने कानोंके लिये भूषण-स्वरूप यह अत्यन्त आश्चर्यमयी अपनी अलौकिक स्थिति मुझसे कही है। वे महात्मा धन्य हैं, जो ब्रह्माजीके समान स्थित अत्यन्त दीर्घजीवी आपके दर्शन करते हैं। ये मेरे नेत्र भी धन्य हैं, जो बराबर आपके दर्शन कर रहे हैं। आपने मुझसे बुद्धिको पवित्र करनेवाला अपना सम्पूर्ण जीवन-वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों ठीक-ठीक कहा है। मैंने सब दिशाओंमें भ्रमण किया और देवताओं एवं बड़े-बड़े तत्त्ववेत्ताओंकी ज्ञान आदि विभूतियोंको देखा, परंतु इस जगत्‌में आपके समान दूसरे किसी महान् ज्ञानीको नहीं देखा। इस संसारमें भ्रमण करनेपर किसी-को किसी महान् पुरुषकी प्राप्ति हो भी सकती है; परंतु आप-जैसे ज्ञानी महात्माओंका प्राप्त होना तो इस जगत्में कहीं भी सुलभ नहीं है अर्थात् दुर्लभ है। पुण्य-देह एवं विमुक्तात्मा आपका अवलोकन करके मैंने तो आज अत्यन्त कल्याणकर एक बहुत बडा कार्य सम्पादन कर लिया है। पक्षिराज ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी शुभ गुफामें प्रवेश करो; क्योंकि मध्याह्न कर्तव्यके लिये मेरा समय हो गया है; अतः मैं भी देवलोकमें जा रहा हूँ।' श्रीराम ! यह सुनकर चिरंजीवी भुशुण्डने वृक्षसे उठकर अर्घ्य, पाद्य और पुष्पोंसे त्रिनेत्रधारी महादेवजीके समान मेरी पैरसे लेकर मस्तकपर्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा की। तदनन्तर 'आप मेरे पीछे चलनेके लिये अधिक श्रम न करें' इस प्रकार कहता हुआ मैं आसनसे उठकर आकाशमार्गसे चला गया। भुशुण्डका स्मरण करते हुए

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