संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अरुन्धतीसे पूजित मैंने भी सप्तर्षि-मण्डलको प्राप्तकर मुनियोंका दर्शन किया।
श्रीराम ! सत्ययुगके प्रथम दो शतक जब व्यतीत हो चुके थे, तब मेरु पर्वतके उस कल्पवृक्षपर भुशुण्डके साथ मैंने पहले-पहल भेंट की थी। इस समय सत्ययुगके क्षीण हो जानेपर त्रेतायुग चल रहा है और इस त्रेतायुगके मध्यमें आप प्रकट हुए हैं। आजसे आठ वर्ष पहले सुमेरु पर्वतके उसी शिखरके ऊपर ज्यों-का-त्यों अजररूपधारी वह भुशुण्ड मुझसे फिर मिला था। इस प्रकारका विचित्र उत्तम भुशुण्ड-वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा, इसका श्रवण और विचार करके जैसा उचित समझो, वैसा करो।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! बुद्धिमान् भुशुण्डकी इस उत्तम कथाका जो विशुद्धबुद्धि मनुष्य भली प्रकार विवेक-पूर्वक विचार करेगा, वह इसी शरीरमें जन्मादि भयोंसे परिपूर्ण इस माया-नदीको पार कर जायगा। (सर्ग २६-२७)
शरीर और संसारकी अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपताका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप श्रीराम ! इस प्रकार यह भुशुण्ड-वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। इस विवेक-युक्त यथार्थ बुद्धिसे भुशुण्ड मोह-संकटसे तर गया था। पूर्वोक्त प्राण और अपानकी उपासना करनेवाले सभी अनासक्तबुद्धि मनुष्य भुशुण्डकी तरह परमपदरूप परमात्मामें स्थिति प्राप्त करते हैं । श्रीराम ! इन सब विचित्र विज्ञानोपासनाओंका तुमने श्रवण किया। अब बुद्धिका अवलम्बन करके जैसा उचित समझो, वैसा करो।
श्रीरामजीने कहा—भगवन् ! आपने जो भुशुण्डका उत्तम, यथार्थ तत्त्वका बोधक और आश्चर्यजनक श्रेष्ठ चरित्र कहा, उससे मुझे अत्यन्त हर्ष हुआ। ब्रह्मन् ! मांस, चर्म और अस्थिसे निर्मित शरीररूपी घरका जो आपने वर्णन किया है, उसकी किसने रचना की, कहाँसे वह उत्पन्न हुआ, किस तरहसे स्थित हुआ और उसमें कौन रहता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! परब्रह्मरूप परमार्थ-तत्त्वको जाननेके लिये तथा संसारके कारणरूप अनेक दोषोंके विनाशके लिये मेरे द्वारा तत्त्वतः कहे जानेवाले इस उपदेशको तुम सुनो । श्रीराम ! इस शरीररूपी घरका—जिसमें हड्डियाँ ही खंभे हैं, मुख आदि नौ दरवाजे हैं और जो रक्त और मांससे लीपा गया है—वास्तवमें किसीने भी निर्माण नहीं किया है। यह शरीर केवल आभासरूप (झलकमात्र) ही है—बिना निर्माताके ही अज्ञानसे भासित होता है। यह देह प्रतीत होता है, इसलिये इसे सत् कहा गया है और वास्तवमें यह नहीं है, इसलिये असत् कहा गया है । जैसे स्वप्नकालमें ही स्वाप्निक पदार्थ सत्-से प्रतीत होते हैं, किंतु जाग्रत्कालमें वे असत् हैं—उनका अत्यन्त अभाव है, तथा जैसे मृगतृष्णिकाका जल भी मृगतृष्णिकाकी प्रतीति होनेपर ही सत्-सा रहता है, अन्य विचारकालमें वह असत् रहता है, वैसे ही देहकी प्रतीति होनेपर देह सत्य-सी है और आत्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर असत्य है, अर्थात् उसका अत्यन्त अभाव है। इसलिये ये शरीर आदि, जो केवल आभासरूप ही हैं, अज्ञानकालमें ही प्रतीत होते हैं।
श्रीराम ! भला, बतलाओ तो सही कि सुख-शय्यापर सोये हुए तुम जिस स्वप्न-देहसे विविध दिशाओंमें परिभ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह किस स्थानमें स्थित है। स्वप्नमें भी जो दूसरा स्वप्न आता है, उस स्वप्नमें जिस देहसे बड़े-बड़े पृथिवी-तटोंपर तुम परिभ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह कहाँ स्थित है ? मनोराज्यके भीतर कल्पित दूसरे मनोराज्यमें बड़े-बड़े वैभवपूर्ण स्थानोंमें