संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमाम्स्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जीवात्माका परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे वासनासे छूट जाना ही उसका 'मोक्ष' है। महाबाहु अर्जुन ! वासनारूप रज्जुके बन्धनसे छूटा हुआ पुरुष 'मुक्त' कहा जाता है। अतः तुम वासनासे रहित होकर जीते-जी ही उस वास्तविक यथार्थ तत्त्वका अनुभव करो। जो वासनासे रहित नहीं है,—भले ही वह समस्त धर्मोंके परायण क्यों न हो, सर्वज्ञ यानी समस्त सांसारिक विषयोंका पण्डित ही क्यों न हो—फिर भी वह पिंजरेमें स्थित पंछीकी भाँति सब ओरसे वासना-जालसे बँधा हुआ है। क्योंकि वासना ही बन्धन है और वासनाका क्षय ही मोक्ष है। (सर्ग ५५)
श्रीभगवान्के द्वारा अर्जुनके प्रति जीवन्मुक्त अवस्था और जगद्रूप चित्रका वर्णन एवं वासनारहित और ब्रह्मस्वरूप होकर स्थित रहनेका उपदेश तथा इस उपदेशको सुनकर तत्त्वज्ञानके द्वारा अर्जुनकी अविद्यासहित वासनाका और मोहका नाश हो जाना
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन ! इस प्रकार वासना-निवृत्तिरूप जीवन्मुक्तिके द्वारा तुम आन्तरिक शान्ति प्राप्तकर बन्धुवधप्रयुक्त दुःखका निःशेषरूपसे परित्याग कर दो। निष्पाप अर्जुन ! जरा और मरणसे रहित, आकाशकी तरह विशाल चित्तवाले तथा इष्ट एवं अनिष्ट विषयोंके संकल्पोंसे रहित होकर तुम वीतराग हो जाओ। सदासे चला आनेवाला स्वधर्मरूप कर्म जो समभावसे किया जाता है, वह तो जीवन्मुक्तोंके लिये स्वाभाविक ही है और वही जीवन्मुक्तता है। 'यह कर्म मैं छोड़ता हूँ' और 'इस कर्मको मैं अङ्गीकार करता हूँ'—इस प्रकार जो त्याग और ग्रहणका निर्णय है, वह एकमात्र अज्ञानियोंके मनका स्वरूप है; ज्ञानियोंकी तो उनमें सम स्थिति रहती है। जिसकी इन्द्रियाँ कछुएके अङ्गोंकी भाँति इन्द्रियोंके विषयोंसे हटकर अन्तःकरणमें स्थिर हो जाती हैं, वही स्थितप्रज्ञ और जीवन्मुक्त है। कमलनयन ! वास्तवमें यह संसार आकाशसे भी बढ़कर वैसे ही शून्यरूप है, जैसे स्वप्नमें क्षणमात्रमें चित्तमें होनेवाले तीनों लोकोंका नाश और उत्पत्ति—यह तुम जानो। क्योंकि आत्मा, मन और उसका कार्य यह बाह्य और आभ्यन्तर सम्पूर्ण जगत् स्वप्नकी तरह शून्य है (असत् ही हैं)। यह सब चिरकालिक मनोराज्य है, इसलिये अज्ञानी मनुष्योंको इसमें सत्यत्वकी प्रतीति होती है। किंतु वह सत्यत्वकी प्रतीति तत्त्व-ज्ञानरूप आलोकसे नष्ट हो जाती है। चित्तरूपी चितेरेके चित्रमें अवस्थित त्रिभुवन आदि विचित्र मूर्तियों आधारभूत भीतके न रहनेसे बाहर आकार-रहित यानी मिथ्या ही हैं। अर्जुन ! वास्तवमें न तो उन चित्त-कल्पित मूर्तियोंका अस्तित्व है और न तुम्हारे शरीरका ही अस्तित्व है; इसलिये कौन किससे मारा जाता है ? अतः नाश्य-नाशकका मोह छोड़कर तुम निर्मल बनकर ब्रह्मरूप परमपदमें स्थित हो जाओ। अर्जुन ! जैसे एकमात्र चित्तमें रहनेवाला मनोराज्यरूप चित्र आकारवाला प्रतीत होता हुआ भी वास्तवमें शून्यस्वरूप होनेसे असत् ही है, वैसे ही यह जगत् भी शून्यस्वरूप है—यह तुम जानो। अर्जुन ! मन ही क्षणको कल्प कर देता है और असत्को उत्पन्न कर देता है—यह जो मनके विषयमें आश्चर्य है, वह तो बहुत ही थोड़ा है; उससे भी बढ़कर तो आश्चर्य यह है कि वह असत् जगत्को भी शीघ्र सद्रूप कर देता है। इसलिये यह जगद्रूप भ्रान्ति इस प्रकारके आश्चर्य पैदा करनेवाले मनसे ही उत्पन्न हुई है। क्षणभरके लिये ही अज्ञानवश चित्र-विचित्रस्वरूप प्रतीत हुआ जो यह मनोराज्य है, वही दृश्यमान इस प्रपञ्च-जालके रूपमें प्रतीत होता है। यद्यपि ज्ञानियोंकी दृष्टिमें स्वतः नित्यमुक्त आत्मामें