भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीभगवान्‌के द्वारा अर्जुनके प्रति जीवन्मुक्त अवस्थाका वर्णन ४२५


अध्यस्त और एकमात्र कल्पनासे उत्पन्न होनेके कारण प्रतीतिकालमात्रस्थायी यह तुच्छ जगत् क्षणिक ही है, तथापि इसी क्षणिक जगत्‌के विषयमें इसके वास्तविक स्वरूपसे अपरिचित अज्ञानी लोगोंने वज्रसारकी तरह दृढ़ कल्पना कर रक्खी है अर्थात् इस असत् जगत्‌को सत्य मान रक्खा है। अहो ! अत्यन्त आश्चर्य है कि यह उज्ज्वल चित्र आधारके बिना ही उत्पन्न होकर सामने दिखलायी दे रहा है। यह जगद्रूप चित्र भलीभाँति लोगोंका अनुरञ्जन करनेवाला है और दृष्टि, मन आदिको भी लुभानेवाला है। यह नाना प्रकारके प्राणियोंसे युक्त है, अद्भुत है, आकाशके समान शून्यरूप है और नाना प्रकारके विलासोंसे वेष्टित भी है। इस प्रकारके इस जगतरूप चित्रका शीघ्र ही अद्भुत चित्रोंका निर्माण करनेमें समर्थ चित्तरूप चित्रकारने आकाशमें ही चित्रण किया है।

अर्जुन ! चेतन आकाशस्वरूप ब्रह्मसे निर्मित सब कुछ ब्रह्म ही है। ब्रह्ममें ब्रह्मके द्वारा ब्रह्म विलीन होता है। ब्रह्ममें ही ब्रह्मके द्वारा ब्रह्मका उपभोग किया जाता है और ब्रह्मद्वारा ब्रह्ममें ब्रह्मका ही विस्तार हुआ है। जैसे प्रतिबिम्ब अपने आधार दर्पणमें प्रतीत होता है, वैसे ही यह जगत् भी अपने आधार ब्रह्ममें ही प्रतीत होता है। अर्जुन ! जब ब्रह्ममें प्रतिभासित छेदन-भेदन आदि सम्पूर्ण व्यवहार और उनका विषय जगत्—ये सब ब्रह्मसे अभिन्न होकर एकमात्र चिन्मय आकाश-स्वरूप ही हैं, तब किस कर्ता या करणसे किस प्रकारसे किस देश या किस कालमें क्या छिन्न-भिन्न किया जा सकता है। इसलिये बोधसे तुम्हारी वासनाओंका अभाव सिद्ध ही है। जो वासनासे रहित नहीं है, भले ही वह समस्त शास्त्रीय कर्मोंके परायण हो और समस्त सांसारिक विषयोंका ज्ञाता हो; फिर भी वह वैसे ही अत्यन्त बद्ध है, जैसे पिंजरेमें स्थित सिंह। जिसकी चित्तरूपी भूमिमें अणुमात्र भी वासनारूप बीज पड़ा रहता है, उसका संसाररूप जंगल पुनः बढ़ जाता है। जब सत्यस्वरूप परमात्माका यथार्थ ज्ञान अभ्यासके द्वारा हृदयमें दृढ़ हो जाता है, तब वासना पूर्णतया नष्ट हो जाती है और वह फिर उत्पन्न नहीं होती। वासनाओंके पूर्णतया नष्ट हो जानेपर विशुद्ध जीवात्मा सांसारिक सुख-दुःखादि वस्तुओंमें वैसे ही लिप्त नहीं होता, जैसे पानीमें कमलका पत्ता। अर्जुन ! असङ्ख्य वासनाओंसे रहित तुम मुझसे सुने हुए पवित्र उपदेशको भलीभाँति समझकर परमात्मामें चित्त-को विलीनकर भय और मोहसे रहित एवं शान्त निर्वाण ब्रह्मस्वरूप हुए स्थित रहो।

अर्जुनने कहा—अच्युत ! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है। अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन ! यदि परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे तुम्हारे हृदयमें रागादि वृत्तियाँ अशेषरूपसे शान्त हो चुकीं तो तुम जान लो कि तुम्हारा सवासनात्मक चित्त भी भीतर शान्त होकर निर्वासनताको प्राप्त हो गया। इस सत्त्वावस्थामें सर्वस्वरूप जीवात्मा सम्पूर्ण वासनाओं और विषयोंसे मुक्त हो जाता है। उस जीवात्माके यथार्थ स्वरूपको कोई भी उसी प्रकार नहीं देख सकते, जिस प्रकार भूमिसे आकाशमें उड़कर दूर देशमें गये हुए पक्षीको। पार्थ ! मन-इन्द्रियोंके प्रकाशक, शुद्धस्वरूप, संकल्परहित, निर्विषय इस जीवात्माको मन-इन्द्रियोंसे दूर समझो। जैसे अग्निके पर्वतपर पहुँचकर हिमकण सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे अविद्या भी नष्ट हो जाती है। नाना प्रकारके आकार और विकारोंवाली यह अविद्या तभीतक रहती है, जबतक जीवात्मा अपने वास्तविक स्वरूप—विशुद्ध विज्ञानानन्दघन परमात्माको भलीभाँति नहीं जान लेता। जो समग्र परमात्मा अपने आपसे परिपूर्ण है, समस्त