संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ * अविच्छिन्नश्चिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *
श्रीगुरुवर-वसिष्ठ-स्तवन
( रचयिता—पं० श्रीरामनारायणजी त्रिपाठी 'मित्र' शास्त्री )
तप-तेज-पुंज जगदाभिराम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
चारों वेदोंका रस वरिष्ठ।
वेदान्त विषय जो था गरिष्ठ ॥
कर सरल कथाओंमें प्रविष्ट।
कर दिया उसे लघुतम सुमिष्ट ॥
यह देख तुम्हारा कलित काम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
यह युक्ति दिखाकर तुम न्यारी।
बन गये विश्वके हितकारी ॥
अतएव ज्ञानके अधिकारी।
हैं सभी तुम्हारे आभारी ॥
गा रहे तुम्हारे गुणग्राम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
जिस समय सूर्यवंशी नरेश।
संचालित करते थे स्वदेश ॥
उस समय उन्हें दे सदुपदेश।
हरते थे तुम मानसिक क्लेश ॥
पाते थे वे जगसे विराम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
श्रीरामचन्द्रको पात्र जान।
जो दिया उन्हें था महाज्ञान ॥
मुनि वाल्मीकिने अमृत मान।
वह भर सुछन्दोंमें निदान ॥
रच ग्रन्थ योगवासिष्ठ नाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
यह ग्रन्थ मिटा विष-विषय चाव।
अध्यात्म ओर करता झुकाव ॥
हर जीव ब्रह्मका भेदभाव।
बन रहा भवाम्बुधि हेतु नाव ॥
यह श्रेय तुम्हींको है ललाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
हैं इसमें वर्णित वे सुयोग।
हरते हैं जो भवजनित रोग ॥
जिनका समयोचित कर प्रयोग।
पाते हैं शुभगति साधु लोग ॥
खण्डित कर माया मोह दाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
उपदेश तुम्हारा है विचित्र।
जो करता है हियको पवित्र ॥
जिससे जन बनकर सच्चरित्र।
हो जाते हैं ब्रह्मज्ञ 'मित्र' ॥
मिलता है उनको परम धाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥