संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 475, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें४३२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भीतर और उसके भी भीतर बार-बार देखनेसे केवल छिलकामात्र ही रहता है, उसी प्रकार सबके भीतर-के भीतर और उसके भी भीतर ऐसा कौन अणु है, जो प्रकाशक स्वच्छ आत्मस्वरूप है। ब्रह्माण्ड, आकाश, भूतोंके आधारभूत भुवन, सूर्यमण्डल तथा मेरु—ये सब जो बड़े-बड़े महान् पदार्थ प्रसिद्ध हैं—ये अणुत्व धर्म न छोड़नेवाले ऐसे किस अणुके परमाणु हैं ? किस अवयव-रहित परमाणुरूप महागिरिकी शिलाके भीतर ये भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों जगत् हैं ? दुष्ट राजन्! यदि तुम इन प्रश्नोंका उत्तर मुझे न दे सकोगे तो तुम्हें खाकर फिर तुम्हारे नगरके प्राणियोंको बलपूर्वक पकड़कर उन्हें यमराजकी तरह निगल जाऊँगा । ( सर्ग ७० )
वेतालकृत छः प्रश्नोंका राजाद्वारा समाधान
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रामभद्र ! जब ऐसा कहकर वेताल चुप हो गया, तब वह राजा हँसकर यह कहने लगा।
राजाने कहा—वेताल ! यह चराचर जगत्रूपी फल उत्तरोत्तर दशगुण पञ्चभूतोंकी परतसे घिरा हुआ है—अर्थात् इस जगत्के सब ओर पृथ्वीका घेरा है। उसके बाद पृथ्वीसे दसगुना जल, जलसे दसगुना तेज, तेजसे दस-गुना वायु और वायुसे दसगुना आकाश है। ऐसे हजारों फल जहाँ विद्यमान हैं, ऐसी बहुत ऊँची एक शाखा है। उस प्रकारकी बड़ी-बड़ी हजारो शाखाएँ जहाँ विद्यमान हैं, ऐसा बड़े आकारवाला एक महान् वृक्ष है । इसी प्रकारके हजारों वृक्ष जिसमें हैं, ऐसा एक वन है। उसी प्रकारके हजारों वन जहाँपर हैं, ऐसा उन्नत शिखरोंसे युक्त चारों ओरसे परिपूर्ण आकारवाला एक विशाल पर्वत है। जहाँपर वैसे हजारों पर्वत हैं, ऐसा अत्यन्त विस्तीर्ण विशाल खोहोंवाला एक देश है। वैसे हजारो देश जहाँपर विद्यमान हैं, ऐसा बड़े-बड़े हृद और नदियोंसे युक्त एक बहुत बड़ा द्वीप है। वैसे अनन्त द्वीप जिसमें हैं, ऐसी चित्र-विचित्र रचनाओंसे युक्त एक पृथ्वी है। उस प्रकारके हजारों पृथ्वीमण्डल जिसमें विद्यमान हैं, ऐसा एक अत्यन्त विस्तृत महान् भुवन है । उस तरहके असंख्य महान् भुवन जिसमें विद्यमान हैं, ऐसा विस्तृत आकाशके सदृश एक महान् प्रचण्ड ब्रह्माण्ड है। इस-इस तरहके असंख्य ब्रह्माण्ड जिसमें विद्यमान हैं ऐसा एक चञ्चलतारहित असीम जलनिधि है । उस तरहके लाखों सागर जिसमें कोमल तरङ्गरूप है, ऐसा एक अपने स्वरूपमें विश्राम करनेवाला निर्मल महार्णव है। उस प्रकारके हजारों महार्णव जिसके उदरके जलरूप हैं, ऐसा एक कोई बड़ा भारी परिपूर्णाकृति पुरुष है। ऐसे-ऐसे लाखों पुरुषोंकी माला जिसके वक्षःस्थलमें स्थित हैं, ऐसा एक परम पुरुष है, जो सब सत्ताओंका प्रधान है। इस प्रकारके असंख्य महापुरुष जिसके मण्डलमें स्फुरित हो रहे हैं, ऐसा एक महान् आदित्य है। ये सब कल्पनाएँ ही इस आदित्यरूप ब्रह्मकी रश्मियाँ हैं । ब्रह्माण्ड ही इस आदित्य ( ब्रह्म ) की दीप्तियोंके त्रसरेणु हैं । मैंने तुमसे जिस सूर्यका कथन किया था, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही वह सूर्य है; इसीके प्रभावसे सारा जगत् प्रकाशित होता है। वेताल ! पूर्वोक्त असंख्य पदार्थ जिससे प्रकाशित होते हैं, ऐसा विज्ञानस्वरूप परम सूर्य है और ये जो विस्तृत ब्रह्माण्ड हैं, वे उसी सूर्यकी किरणोंमें स्फुरित होनेवाले त्रसरेणु हैं । इस प्रकार यह तुम्हारे प्रथम प्रश्नका उत्तर दिया गया ।
वेताल ! कालकी सत्ता, आकाशकी सत्ता, जीवात्मा-की सत्ता तथा शुद्ध चेतन आत्माकी सत्ता—इत्यादि-सब सूक्ष्म होनेसे निर्दोष रज हैं । वे परमात्मारूपी महावायुमें कल्पित अनेक विकारोंसे चञ्चल होकर स्फुरित होते हैं। 'जगत्' नामक महास्वप्नमें एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें जाता हुआ जीवात्मा परम शान्तिको बढ़ानेवाले