भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य * ९३३


अपने महान् शुद्ध आत्मस्वरूपको नहीं छोड़ता। जैसे केलेका खंभा ज्यों-ज्यों छीला जाता है त्यों-त्यों उसके भीतर-भीतर केवल पत्ता ही मिलता जाता है, वैसे ही परिणामशील यह विश्व ज्यों-ज्यों भीतर-भीतर देखा जाता है त्यों-त्यों उसमें ब्रह्म ही मिलता जाता है। वह आकाश-के तुल्य निराकार, अनिर्वचनीय परमात्मा सत्, ब्रह्म, आत्मा आदि शब्दोंसे कहा जाता है। सूक्ष्म मन और इन्द्रियोंके द्वारा अप्राप्य होनेके कारण परमात्मा परमाणु कहा गया है। अनन्त होनेके कारण परमात्मा ही मेरु आदि पर्वतोंका मूल है। परमाणुस्वरूप होते हुए भी इस परमपुरुष अनन्त परमात्मामें ब्रह्माण्ड, आकाश, भुवन, सूर्यमण्डल और मेरु—ये सब पदार्थ परमाणुकी तरह प्रतीत होते हैं। यह परमात्मा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ग्राह्य न होनेसे परमाणु कहा गया है और सब ओर परिपूर्ण होनेसे महापर्वत कहा गया है। वास्तवमें यह परम पुरुष परमात्मा अवयवरहित है, किंतु दृश्यके सम्बन्धसे अवयव-युक्त दिखायी पड़ता है। अज्ञानी वेताल ! ये सब जगत् उस विज्ञानस्वरूप परमात्माके संकल्पसे कल्पित हैं। अतः तुम उस अनन्त, शान्त स्वभाव अपार परमपदको अनुभव करो और शान्त हो जाओ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! राजाके मुखसे इस प्रकार प्रश्नोंका समाधान सुनकर शुद्धान्तःकरण वेताल विचारयुक्त बुद्धिसे परम शान्तिको प्राप्त हो गया। निर्दोष आत्माको तत्त्वसे समझकर और भयंकर क्षुधाको भूलकर वह शान्तमन वेताल परमात्माके ध्यानमें अचल स्थिर हो गया। ( सर्ग ७१—७३ )

भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य और अपने गुरु त्रितलके साथ संवाद

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देहयात्रार्थ प्रारब्धवश प्राप्त हुए अर्थसे संतुष्ट रहनेवाले प्रयत्नशील पुरुषके दुःसाध्य अर्थ भी भगीरथ राजाकी तरह सिद्ध हो जाते हैं। जिसका पूर्णरूपसे मन शान्त हो गया है, जिसकी वृत्तियाँ पर्याप्तरूपसे तृप्त हो गयी हैं, जिसकी आनन्दघनस्वरूप सम ब्रह्ममें निरन्तर निष्ठा है, उस महापुरुषके दुर्लभतर अभीष्ट कार्य भी उसी प्रकार सिद्ध हो जाते हैं, जिस प्रकार भगीरथका सगरपुत्रोंके उद्धारके लिये संजीवन गङ्गावतरणरूप अत्यन्त दुर्लभ कार्य सिद्ध हो गया था।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—प्रभो ! राजा भगीरथके चित्त-कौशलसे गङ्गावतरणरूप दुःसाध्य कार्य किस रीतिसे सिद्ध हुआ था, वह मुझसे कहिये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! समुद्रोंसे युक्त पृथ्वी-का एक अत्यन्त धार्मिक भगीरथ नामका राजा हो चुका है। वह राजमण्डलमें सबसे श्रेष्ठ था। चन्द्रमाकी तरह प्रसन्न-मुख एवं चिन्तामणिके सदृश अभीष्ट अर्थोंको देनेवाले इस राजासे याचकगण अपने संकल्पके अनुसार ही अभीष्ट अर्थ प्राप्त करते थे। वह श्रेष्ठ पुरुषोंकी रक्षाके लिये निरन्तर धन देता था। न्यायसे प्राप्त तृण भी ले लेता था। वह याचकोंकी अभीष्ट-सिद्धिके लिये चिन्ता-मणिके सदृश था। मृदु और शीतल स्पर्शवाला वह ब्रह्म-तत्त्वज्ञानियोंकी संनिधिमें उनके चित्तको आह्लादित करता हुआ उसी प्रकार द्रवीभूत हो जाता था, जिस प्रकार चन्द्रमाकी संनिधिमें चन्द्रकान्तमणि। उसने अगस्त्य-मुनिद्वारा शोषित सागरको गङ्गाके प्रवाहसे उसी तरह पूरा कर दिया, जिस तरह याचकोंके समूहको धनसे पूरा किया था। पातालवासी अपने पूर्वजोंको उस लोकबन्धुने गङ्गारूपी सीढ़ी लगाकर ब्रह्मलोकमें पहुँचाया। गङ्गाजीको यहाँ लानेके उद्देश्यसे अपनी तपस्यासे ब्रह्मा, शंकर और जहुकी आराधना करते हुए उस दृढ़ निश्चयसे युक्त भगीरथने बार-बार क्लेश सहन किया। श्रीराम ! इस लोकयात्राका खूब विचार करते हुए उस राजाको युवा-वस्थामें ही तीव्र वैराग्यकी चिनङ्गारियोंने विवेकयुक्त विचार