भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५८४* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रूपी सूर्यके तपते रहनेपर भूमिमें, जलमें और आकाशमें भी ऐसी कोई अभिलषित वस्तु नहीं है, जो सिद्ध नहीं हो सकती। भूमण्डलमें तथा पर्वतकी समस्त निर्जन गुफाओंमें जितने भयके कारण हैं, वे सब अभ्यासशाली पुरुषके लिये अभयदायक बन जाते हैं।

(सर्ग ६६-६७)


श्रीवसिष्ठजीके द्वारा आतिवाहिक शरीरमें आधिभौतिकताके भ्रमका निराकरण

विद्याधरीने कहा—अतः मुने! अब हम दोनों निर्मल परमात्मामें सर्वबोधानुकूल समाधिरूप धारणा-द्वारा अपने प्राचीन आतिवाहिक भावका पुनः अभ्यास करें। ऐसा करनेसे ही इस शिलाके भीतरका जगत् प्रकट होगा।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! उस पर्वतपर विद्याधरीने जब यह युक्तियुक्त बात कही, तब मैं पद्मासन लगाकर बैठ गया और समाधिमें स्थित हो गया। उस समय सम्पूर्ण बाह्य पदार्थोंकी भावनाका त्याग हो जानेपर चिन्मात्रस्वरूप होकर मैंने उस पूर्वके अर्थकी—आधिभौतिक देहादिकी भावना एवं उसके संस्कार-मलका भी सर्वथा त्याग कर दिया। तत्पश्चात् चेतनाकाशरूपताको प्राप्त हो मैंने उसी तरह उत्तम दृष्टि प्राप्त कर ली, जैसे शरत्काल आनेपर आकाश निर्मलताको धारण कर लेता है। तदनन्तर सत्यस्वरूप परमात्माके शुद्ध ध्यानाभ्याससे मेरी देहमें आधिभौतिकताकी भ्रान्ति निश्चय ही दूर हो गयी तथा तत्काल ही उदय एवं अस्तसे रहित होनेपर भी नित्य उदित रहनेवाली और अत्यन्त निर्मल महाचेतनाकाशरूपता प्रकट-सी हो गयी। इसके बाद जब मैं साक्षीरूप अपने ही निर्मल तेजसे देखने लगा, तब वास्तवमें मुझे न तो वह आकाश दीख पड़ा और न वह पाषाणशिला ही कहीं दिखायी दी। सब कुछ केवल परमतत्त्वमय ही दृष्टिगोचर हुआ। मैंने स्वरूपबोधके पहले कभी जिसकी आकृति शिलामयी देखी थी, बोधके पश्चात् उसे स्वच्छ चिद्घन ब्रह्माकाशरूप ही देखा, पृथ्वी आदि विकारोंके रूपमें उस सद्-वस्तुको कहीं नहीं देखा। प्रिय श्रीराम! यह जो वर्तमान-कालका दृश्य-प्रपञ्च मनको प्रत्यक्ष दिखायी दे रहा है, यह आधिभौतिक देह आदिकी कल्पनाद्वारा अत्यन्त असद्रूपसे ही प्रकट हुआ है। अतः इसे तुम प्रत्यक्ष ही असत् समझो और उस योगिप्रत्यक्षको ही मुख्य प्रत्यक्ष जानो; क्योंकि उसमें सद्रूप परमात्माके यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार होता है। अहो! परमेश्वरकी माया कैसी विचित्र है, जिससे प्राक्-प्रत्यक्षमें (अर्थात् पहलेसे ही जो प्रत्यक्ष है, उस साक्षी चेतनमें) तो परोक्षताका निश्चय हो रहा है और इस परोक्ष मनमें प्रत्यक्षभावकी कल्पना आ गयी है। यद्यपि सुवर्णसे कड़ा बनता है—इसका सभीको अनुभव है, तथापि यह निश्चय है कि सुवर्ण कड़ा नहीं है। उसी प्रकार सूक्ष्मशरीरमें आधिभौतिकता नहीं है। यह जीव विचार न करनेके कारण भ्रमको यथार्थ और यथार्थको भ्रम समझ रहा है। अहो! यह कैसी मूढ़ता है। जै