भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 628

[ निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोक पर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना * ५८३


( धारणाभ्यास-जनित मनोमयदेहरूपता ) का विस्मरण हो गया। प्रभो ! जो अभ्यासजनित संस्कार शुद्ध चेतन आकाशके रससे उद्बुद्ध होकर प्रकाशित होता है, उसीके आकारका आन्तरिक चित्त भी हो जाता है। बाल्यावस्थासे लेकर अबतक वही वस्तुस्थिति देखी जाती है। भगवन् ! यह जो आपके साथ संवाद हुआ है, इसने अपने जगत्‌के निरन्तर अभ्यासके कारण पूर्व जगत्‌के भ्रमसे युक्त हुई मुझको निश्चय ही वशमें कर लिया। इसीलिये वह संस्कार लुप्त-सा हो गया। भूत और वर्तमानकालके दो धर्मोंमेंसे वर्तमानकालका भ्रम ही बलवान् होनेके कारण विजयी हुआ।

मैं एक पाषाण-शिलामें निवास करनेवाली अबला हूँ, बाला एवं आपकी शिष्या हूँ; फिर भी मैं तो इस शिलाके भीतर स्थित हुई सृष्टिको देखती हूँ और आप सर्वज्ञ होकर भी नहीं देखते। देखिये, यह अभ्यासका विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है। अभ्याससे अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी चूर्ण हो जाता है और बाण अपने महान् लक्ष्यको भी वेध डालता है। देखिये, यह अभ्यासकी प्रबलता कैसी है ? मुने ! अभ्याससे कटु पदार्थ भी मनको प्रिय लगने लगता है—अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्याससे ही किसीको नीम अच्छा लगता है और किसीको मधु। निकट रहनेका अभ्यास होनेपर जो भाई-बन्धु नहीं है, वह भी भाई-बन्धु ( आत्मीय ) बन जाता है और दूर रहनेके कारण बारंबार मिलनेका अभ्यास न होनेसे भाई-बन्धुओंका स्नेह भी घट जाता है। भावनाके अभ्याससे ही यह आतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणाके अभ्यासकी भावनासे पक्षियोंके समान आकाशमें उड़नेकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिये, अभ्यासकी कैसी महिमा है ! निरन्तर अभ्यास करनेसे दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध ( सुलभ ) हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने इष्ट वस्तुके लिये अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्योंमें अधम है। वह कभी उस वस्तुको नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वन्ध्या स्त्री अपने गर्भसे पुत्र नहीं पाती। जो नराधम अपनी अभीष्ट वस्तुके लिये अभ्यास ( बारंबार प्रयत्न ) नहीं करता, वह अनिष्ट वस्तुमें ही रत रहता है; इसलिये वह अनिष्टको ही प्राप्त होता है और एक नरकसे दूसरे नरकमें गिरता रहता है। जिससे संसार असार बन जाता है। पर विवेकका सेवन करनेवाले जो श्रेष्ठ पुरुष आत्म-विचार नामक अभ्यासको नहीं छोड़ते, वे निश्चय ही इस बढ़ी-चढ़ी विस्तृत माया-नदीको पार कर जाते हैं। इष्ट वस्तुके लिये किया गया चिरकालिक अभ्यासरूपी सूर्य प्रजाजनोंके समक्ष ऐसा प्रकाश फैलाता है, जिससे वे देहरूपी भूतलपर रहकर जन्म-मरण आदि सहस्रों अनर्थोंको पैदा करनेवाली इन्द्रियरूपिणी रात्रिको नहीं देखते। बारंबार किये जानेवाले प्रयत्नको अभ्यास कहते हैं, उसीका नाम पुरुषार्थ है। उसके बिना यहाँ कोई गति नहीं है। अपने विवेकसे उत्पन्न हुए दृढ़ अभ्यास नामक अपने कर्मको यत्न कहते हैं। उसीसे यहाँ सिद्धि प्राप्त होती है, और किसी उपायसे नहीं। इन्द्रियोंपर विजय पानेमें समर्थ वीरपुरुषके लिये अभ्यास-