संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आकाशवर्ती भूतसमुदायके पास जा पहुँचा। चिरकालके बाद आकाशमें प्राणियोंके संचारमार्गको पारकर मैं लोकालोक पर्वतके शिखरके ऊपर आकाशभागमें पहुँच गया, उस शिखरके पूर्वोत्तर भागमें स्थित चन्द्रतुल्य उज्ज्वल बादलके पीठभागसे नीचे उतरकर वह नारी मुझे उस ऊँची शिलाके पास ले गयी, जो तपाये हुए सुवर्णकी बनी जान पड़ती थी। मैंने उस शुभ्र शिलाको जब अच्छी तरह देखना आरम्भ किया, तब उसमें वह जगत् मुझे नहीं दिखायी दिया। केवल वह सुवर्णमयी शिला ही अग्निलोक (सुमेरु) के उच्चतम तटकी भाँति दृष्टिगोचर हुई। तब मैंने उस कान्तिमती नारीसे पूछा—'तुम्हारी वह सृष्टिभूमि कहाँ है? उस लोकके रुद्र, सूर्य, अग्नि और तारे आदि कहाँ हैं तथा भूर्भुवः आदि सातों भिन्न-भिन्न लोक कहाँ हैं? समुद्र, आकाश और दिशाएँ कहाँ हैं? प्राणियोंके जन्म और नाश कहाँ हो रहे हैं? बड़े-बड़े मेघोंकी घटाएँ कहाँ घिरी हुई हैं? ताराओंकी तड़क-भड़कसे युक्त आकाश यहाँ कहाँ दिखायी देता है? कहाँ हैं शैलशिखरोंकी वे श्रेणियाँ? कहाँ है महासागरोंकी पङ्क्तियाँ? कहाँ हैं मण्डलाकार सातों द्वीप और कहाँ है तपाये हुए सुवर्णके सदृश वह भूमि? कार्य और कारणकी कल्पनाएँ कहाँ हैं? भूतों और उनके भवनोंका भ्रम कहाँ हो रहा है? कहाँ हैं विद्याधर और गन्धर्व? कहाँ हैं मनुष्य, देवता और दानव तथा कहाँ हैं ऋषि, राजा और मुनि? नीति-अनीतिकी रीतियाँ कहाँ चलती हैं? हेमन्त ऋतुकी पाँच पहरवाली रातें यहाँ कहाँ हो रही हैं? स्वर्ग और नरकके भ्रम कहाँ हैं? पुण्य और पापकी गणना कहाँ हो रही है? कल्प और कालकी क्रीड़ाएँ कहाँ होती हैं? देवताओं और असुरोंमें कहाँ वैर देखे जाते हैं तथा द्वेष और स्नेहकी रीतियाँ कहाँ उपलब्ध होती हैं?' मेरे इस प्रकार पूछनेपर निर्मल नेत्रवाली उस सुन्दरीने आश्चर्यचकित दृष्टिसे मेरी ओर देखकर इस प्रकार कहा।
विद्याधरी बोली—सर्वस्वरूप ब्रह्मर्षे! मैं भी अब पहलेकी भाँति अपने उस सम्पूर्ण जगत्को तो इस शिलाके भीतर नहीं देख रही हूँ; परंतु मैंने जिन मनुष्य, गन्धर्व आदिका पहले वर्णन किया है, उन सबको दर्पणमें स्थित प्रतिबिम्बकी भाँति इस शिलामें प्रतिबिम्बित देखती हूँ। इस समय जो कुछ दीखता है, वह पहले देखे गये नगरसे भिन्न-सा है। मुने! मुझे जो उस जगत्का कुछ-कुछ दर्शन हो रहा है, उसमें नित्यका मेरा अनुभव ही कारण है। आपको यह अनुभव नहीं है, इसीलिये आपको उसका दर्शन नहीं हो रहा है। इसके सिवा चिरकालतक हमलोगोंमें जो यह एक अद्वैतकी चर्चा चलती रही है, उससे विशुद्ध आतिवाहिक (सूक्ष्म मनोमय) देहका विस्मरण हो गया है। इसके कारण भी आपको वह जगत् नहीं दीखता और मुझको स्फुटरूपसे उसका दर्शन होता है। मैंने चिरकालसे जिसका अत्यन्त अभ्यास किया था, मेरा वह जगत् भी आकाश-लताके समान अदृश्य हो गया है; क्योंकि मैं स्पष्टरूपसे उसे नहीं देख पा रही हूँ। जो संसार पहले मेरे लिये अत्यन्त प्रकट था, उसीको इस समय मैं दर्पणमें प्रतिबिम्बितकी भाँति अस्पष्टरूपसे देख रही हूँ। नाथ! हम दोनोंमें परस्पर दीर्घकालतक जो सम्भाषण हुआ, उससे अपने अत्यन्त विशुद्ध एवं व्यापक स्वास्थ्य