संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ०] ❖ श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोकपर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना ❖ ५८१
पूर्वापर भागघटित (नीचे-ऊपरके सम्पूर्ण) आकारको भलीभाँति देखनेकी इच्छासे तदाकार भावनामयी धारणा बाँधकर स्थित हुई। वह धारणा भी मेरे लिये सिद्ध हो गयी। फिर मैं अपने उस ब्रह्माण्डके अंदरकी सभी वस्तुओंको देखकर जब बाहर निकली, तब वह लोकालोक पर्वतकी स्थूल शिला मुझे दिखायी दी। मेरे पतिदेव केवल शुद्ध वेदार्थके एकान्तचिन्तनमें ही लगे रहते हैं। उनकी सारी एषणाएँ दूर हो चुकी हैं। वे न तो किसीका आना जानते हैं न जाना—उन्हें न तो भूतकालका पता रहता है, न वर्तमान और भविष्यका ही। अहो ! उनकी कैसी अद्भुत स्थिति है ? परन्तु वे मेरे पति विद्वान् होते हुए भी अबतक परमपदको प्राप्त न कर सके। अब वे और मैं दोनों ही परमपदको पानेकी इच्छा रखते हैं। ब्रह्मन् ! आपको हमारी यह प्रार्थना सफल करनी चाहिये; क्योंकि महापुरुषोंके पास आये हुए कोई भी याचक कभी विफलमनोरथ नहीं होते। दूसरोंको मान देनेवाले महर्षे ! मैं आकाशमण्डलमें सिद्ध-समूहोंके बीच सदा घूमती रहती हूँ; परंतु यहाँ आपके सिवा दूसरे किसी ऐसे महात्माको नहीं देखती जो अज्ञानके गहन वनको दग्ध करनेके लिये दावानलके तुल्य हो। ब्रह्मन् ! करुणासागर ! संत-महात्मा अकारण ही प्रार्थीजनोंकी मनोवाञ्छा पूर्ण किया करते हैं, इसलिये आपकी शरणमें आयी हुई मुझ अबलाका आप तिरस्कार न करें। तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर मुझे और मेरे पतिको कृतार्थ करें।
(सर्ग ६५)
श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोकपर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना, उस शिलामें उन्हें विद्याधरीकी बतायी हुई सृष्टिका दर्शन न होना, विद्याधरीका इसमें उनके अभ्यासाभावको कारण बताकर अभ्यासकी महिमाका वर्णन करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! ब्रह्माण्डके पूर्ववर्णित ऊर्ध्व आकाशमें संकल्पद्वारा कल्पित आसनपर बैठे हुए मैने, उसी आकाशमें कल्पित आसनपर स्थित हुई वह नारी जब मेरे पूछनेपर उपर्युक्त बातें कह चुकी, तब पुनः उससे प्रश्न किया—'बाले ! शिलाके पेटमें तुम-जैसे देहधारियोंकी स्थिति कैसे हो सकती है ? उसमें हिलना-डुलना कैसे होता होगा ? तथा तुमने वहाँ किस लिये घर बनाया ?'
विद्याधरी बोली—मुने ! जैसे आपलोगोंका यह संसार बहुत ही विस्तृतरूपसे प्रकाशित हो रहा है, उसी प्रकार उस शिलाके उदरमें सृष्टि और संसारसे युक्त हम-लोगोंका जगत् भी स्थित है। वहाँ भी यहाँकी भाँति ही देवता, असुर, गन्धर्व, पृथ्वी, पर्वत, पाताल, समुद्र, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब वस्तुएँ हैं।
मुने ! यदि आप मेरी बातको असम्भव समझते हों तो आइये, उस सृष्टिको अच्छी तरह देख लीजिये, मेरे साथ चलनेके लिये कृपा कीजिये; क्योंकि बड़े लोगोंको आश्चर्ययुक्त वस्तुएँ देखनेके लिये बड़ा कौतूहल होता है। रघुनन्दन ! तब मैने 'बहुत अच्छा' कहकर उसकी बात मान ली और शून्य (आकाश)-रूप हो, शून्यरूपधारिणी उस नारीके साथ शून्य आकाशमें उसी तरह उड़ना आरम्भ किया, जैसे आँधी या ववंडरके साथ फूलोंकी सुगन्ध उड़ती है। तदनन्तर दूरतकका रास्ता तय करनेके बाद आकाशकी शून्यताको लाँघकर मैं उस नारीके साथ