भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विद्याधरीका वैराग्य और अपने तथा पतिके लिये तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेके हेतु उसकी वसिष्ठ मुनिसे प्रार्थना

विद्याधरी बोली— मुने ! तदनन्तर जैसे शरत्काल बीतनेपर रसहीन हुए पल्लवोंकी लाली मिट जाती है, उसी प्रकार दीर्घकालके पश्चात् मेरा वह अनुराग वैराग्यके रूपमें परिणत हो गया। मैं सोचने लगी—'मेरा स्वामी बूढ़ा होनेके कारण एकान्तवासका रसिक, नीरस और स्नेहशून्य हो गया। यद्यपि उसकी बुद्धिमें कुटिलता नहीं है, तो भी वह मेरी ओरसे सदा मौन ही रहता है; अतः मैं समझती हूँ कि मेरे जीवनका कोई फल नहीं है, इसलिये अब इसे रखनेसे क्या लाभ। बचपनसे ही विधवा हो जाना अच्छा है, मर जाना भी अच्छा है अथवा रोगोंका आक्रमण तथा दूसरी-दूसरी विपत्तियोंका टूट पड़ना भी अच्छा है; परंतु जिसका स्वभाव मनके अनुकूल न हो, ऐसे पतिका मिलना अच्छा नहीं। उसी स्त्रीका जीवन सफल है, जिसका पति सदा उसके अनुकूल चलता हो; वही धन-सम्पत्ति सार्थक है, जिसका साधु-पुरुष उपयोग करते हैं तथा वही बुद्धि, वही साधुता और वही समदर्शिता उत्तम है, जो मधुर एवं उदार है। यदि पति और पत्नी एक-दूसरेके प्रति पूर्ण अनुराग रखते हों तो उनके मनको आधि-व्याधियाँ, विपत्ति-समूह तथा दुर्भिक्ष लानेवाले उपद्रव भी कष्ट नहीं पहुँचा सकते। जिन स्त्रियोंके पति प्रतिकूल स्वभाववाले हों अथवा जो स्त्रियाँ विधवा हो गयी हों, उनके लिये फूलोंसे भरी हुई पुष्प-वाटिकाएँ तथा नन्दनवनकी भूमियाँ भी मरुभूमिके समान दुःखद हो जाती हैं। संसारके सारे पदार्थ स्त्रियोंद्वारा स्वेच्छानुसार त्याग दिये जाते हैं, परंतु वे किसी भी दशामें पतिको नहीं त्याग सकतीं।

मुनीश्वर ! अब मेरा वह पतिविषयक अनुराग वैसे ही विरागरूपमें परिणत हो गया है, जैसे पालेकी मारी या जलायी कमलिनीका राग क्रमशः नीरस हो जाता है। मुने ! अब मुझे समस्त पदार्थोंके प्रति वैराग्य हो गया है, इसलिये मैं इस समय आपके उपदेशसे अपनी मुक्ति चाहती हूँ। जिन्हें मनोवाञ्छित वस्तुओंकी प्राप्ति नहीं हुई, जिनकी बुद्धि परमात्मपदमें विश्राम न पा सकी तथा जो मरणतुल्य दुःखोंके प्रवाहमें बहे जा रहे हैं, ऐसे लोगोंके लिये जीनेकी अपेक्षा मर जाना अच्छा है। मेरे पतिदेव भी अब मोक्ष पानेके लिये ही दिन-रात चेष्टा करते रहते हैं। जैसे राजा किसी राजाकी सहायतासे दूसरे राजापर विजय पानेके लिये सचेष्ट होता है, इसी प्रकार मेरे पति भी मनके द्वारा ही मनको जीतनेके प्रयत्नमें सावधानीके साथ लगे हुए हैं। महान् ! आप मेरे उन पतिका और मेरा भी अज्ञान दूर करनेके लिये न्याययुक्त वाणीद्वारा उपदेश देकर आत्मतत्त्वका ज्ञान कराइये। जब मेरे पति मेरी उपेक्षा करके ही परमात्म-तत्त्वके चिन्तनमें लग गये, तब वैराग्यने मेरे लिये संसारकी स्थितिमें नीरसता पैदा कर दी।

मैं संसारकी वासनाके आवेशसे शून्य हूँ, इसलिये आकाशमें विचरनेकी शक्तिरूप सिद्धि प्रदान करनेवाली खेचरी मुद्रानामक तीव्र एवं अभीष्ट धारणाको बाँधकर सुस्थिरचित्त हो गयी हूँ। उक्त धारणाके द्वारा आकाशमें विचरनेकी शक्ति पाकर मैने पुनः दूसरी धारणाका अभ्यास किया, जो सिद्ध पुरुषोंका सङ्ग एवं उनके साथ सम्भाषणरूप फल देनेवाली है। (इसीलिये आज यहाँ आकर आपके साथ वार्तालाप करनेका सौभाग्य प्राप्त कर सकी।) तत्पश्चात् मैं अपने निवासभूत ब्रह्माण्डके