संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
नहीं ग्रहण करता; क्योंकि उसका शरीर सत्यसंकल्पमय होता है। निर्मल अन्तःकरणवाला सूक्ष्म शरीरधारी पुरुष भी लौकिक व्यवहारोंमें मग्न होनेपर क्षणभरमें ही अपना सूक्ष्म शरीर भूल जाता है। उस समय मैंने यह संकल्प किया था कि यह सिद्धपुरुष मुझे देखे। इसलिये उसने मुझे देखा; क्योंकि वह मेरे संकल्पित अर्थका भाजन था। परस्पर सिद्ध एवं विरुद्ध मनोरथवाले दो सिद्धोंमें जो अधिक शुद्ध अन्तःकरणवाला और पुरुषोचित प्रयत्नसे युक्त होता है, वही अपने अभीष्ट-साधनमें विजयी होता है। जब मैं सिद्धसमूहों तथा लोकपालोंकी पुरियोंमें भ्रमण कर रहा था, उस समय व्यवहार-समूहोंके प्राप्त होनेसे मुझे अपनी आतिवाहिकता विस्मृत हो गयी थी—मैं अपने सूक्ष्म शरीरको भूल गया था। जब ऐसी स्थिति आ गयी, तब मैं उस महाकाशमें दूसरोंके साथ व्यवहार करनेमें प्रवृत्त हुआ। परंतु मेरा रूप ऐसा चञ्चल था कि वहाँ मुझे कोई देख नहीं पाता था। उस समय न तो मुझे सूर्य, चन्द्रमा तथा इन्द्र आदि देख पाते थे और न देवता, सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर एवं अप्सराओंकी ही मुझपर दृष्टि पड़ती थी। वे लोग मेरी बाततक नहीं सुन पाते थे। यह सब सोचकर किसीके हाथ बिके हुए सत्पुरुषकी भाँति मैं मोहमें पड़ गया—किंकर्तव्यविमूढ-सा हो गया। इसके बाद मैंने सोचा, 'मैं तो सत्यकाम हूँ। जो भी संकल्प करूँगा—सत्य होगा', यह बात ध्यानमें आते ही मैंने संकल्प किया—'ये देवतालोग मुझे देखें'। ऐसा संकल्प होते ही उस देवलोकमें मेरे सामने रहनेवाले सभी देवता मुझे तत्काल देखने लगे, जैसे नगरमें आये हुए इन्द्रजालमय वृक्षको सभी दर्शक शीघ्र ही देखने लगते हैं। तत्पश्चात् देवताओंके घरोंमें मेरा सब व्यवहार चलने लगा। मैं अपने यथोचित आचारका पालन करता हुआ निःसंकोच वहाँ रहने लगा जिन लोगोंको मेरे वृत्तान्तका ज्ञान नहीं था, उनमेंसे जिन्होंने सर्वप्रथम मुझे अपने आँगनमें आविर्भूत हुआ देखा, उन लोगोंने
पृथ्वीसे ही मेरी उत्पत्तिकी कल्पना करके मुझे 'पार्थिव वसिष्ठ' कहा—फिर इसी नामसे लोकमें मेरी प्रसिद्धि हुई। जो लोग आकाशमें रहते थे, उनमेंसे जिन महानुभावोंने मुझे आकाशमें भगवान् सूर्यदेवकी किरणोंसे प्रकट हुआ देखा, उन्होंने लोकमें 'तैजस् वसिष्ठ' नाम देकर मुझे प्रसिद्ध किया तथा जिन आकाशवासी सिद्धोंने वायुसे मेरा प्राकट्य देखा, उन्होंने मुझे 'वात-वसिष्ठ' की संज्ञा दी तथा जिन मुनीश्वरोंने मुझे जलसे उठते देखा, उन्होंने मुझे 'वारिवसिष्ठ' नाम दिया। इस प्रकार दृष्टिभेदसे मेरी यह जन्मपरम्परा कल्पित हुई है। तभीसे लोकमें मैं कहीं पार्थिव, कहीं जलमय, कहीं तैजस् और कहींपर मारुत-वसिष्ठ नामसे विख्यात हुआ।
इस तरह कहीं आकाश आदि पञ्चभूतरूपसे स्फुरित होनेपर भी मैं एकमात्र चिन्मय स्वभाववाला निराकार, चेतनाकाशरूप परब्रह्म ही हूँ तथा तुमलोगोंके बीच उपदेश आदि व्यवहारकी सिद्धिके लिये स्थूल आकारसे युक्त भी दिखायी देता हूँ। जैसे जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानी पुरुष सारा व्यवहार करता हुआ भी ब्रह्माकाशरूपसे ही स्थित रहता है, उसी तरह विदेहमुक्त भी ब्रह्मरूपसे ही स्थित होता है। किंतु जिस पुरुषकी बुद्धि संसारवासनावश देह और इन्द्रियके द्वारा भोगनेयोग्य अयोग्य वस्तु—विषयभोगमें आसक्त होती है तथा जिसके मनमें कभी मोक्षकी आकाङ्क्षा नहीं जाग्रत् होती, वह मन्दबुद्धि मानव मनुष्य नहीं, कुत्ता अथवा कीड़ा है* (क्योंकि वह भोगरूपी गंदी चीजको पसंद करता है, मनुष्य तो वही है जो मोक्षके लिये प्रयत्नशील है)। श्रीराम ! चित्तका सर्वथा शान्त एवं शीतल होना मोक्ष है तथा उसका संतप्त होना ही बन्धन है। ऐसे मोक्षमें भी लोगोंकी
* ससारवासनामावरूपे सक्ता नु यस्य धीः ।
मन्दो मोक्षे निराकाङ्क्षी स श्वा कीटोऽथवा जनः ॥
(नि० प्र० उ० ९५ । २६)