भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना * ६११


अपवर्गसे भी विरक्ति प्राप्त की है। इस कारण मै भी आपकी ही भाँति चिरकालतक एकान्तमें विश्रामके लिये आकाशके इस स्थानतक आया और यहाँ मुझे आपकी कुटी दिखायी दी। आपकी ही यह कुटी है और आप पुनः यहाँ पधारेंगे, यह बात उस समय मैंने नहीं सोची थी। यह सब तो मुझे आज ही ज्ञात हुआ है।

उस समय तो अनुमानसे मैंने यही जाना था कि यह कोई सिद्धपुरुष था, जो यहाँ अपना शरीर त्यागकर निर्वाण पदको प्राप्त हो गया है। भगवन् ! यही मेरा वृत्तान्त है और यह मै आपके सामने उपस्थित हूँ। मैंने सब बातें आपको बता दीं। अब आप जैसा उचित समझें, करें। (सर्ग ९३)


श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना, वसिष्ठजीका मनोमय देहसे सिद्धादि लोकोंमें भ्रमण करना, श्रीवसिष्ठजीका अपनी सत्य-संकल्पताके कारण सबके दृष्टिपथमें आना, व्यवहारपरायण होना तथा 'पार्थिव वसिष्ठ' आदि संज्ञाओंको प्राप्त करना, पाषाणोपाख्यानकी समाप्ति और सबकी चिन्मयब्रह्मरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तत्पश्चात् मैंने सिद्धसे इस प्रकार कहा—'महात्मन् ! मैंने भी तो आपके विषयमें कोई विचार नहीं किया, इसीसे उस कुटीको आकाशमें स्थिर नहीं कर दिया। उसे स्थिर कर दिया होता तो आपकी स्थिति भी सुस्थिर हो गयी होती। आपको इस प्रकार नीचे नहीं गिरना पड़ता (अतः हम दोनोंसे परस्पर अपराध हुए हैं, इसलिये दोनों ही दोनोंको क्षमा कर दें)। उठिये, अब हम दोनों सिद्धलोकोंमें चलकर पूर्ववत् निवास करें।' तदनन्तर हम दोनों गुलेलसे फेंके गये दो पत्थरकी गोलियोंके समान एक साथ ही तीव्र गतिसे आकाशमें उड़े। उस समय हमारी स्थिति दो तारोंके समान हो रही थी। ऊपर जाकर हम दोनोंने एक दूसरेको प्रणामपूर्वक विदा किया। फिर वे सिद्ध महात्मा अपने अभीष्ट स्थानको चले गये और मैं अपने अभीष्ट स्थानमें आ गया।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! आपका वह शरीर तो पृथ्वीपर गिरकर धूलके परमाणुओंमें मिल गया होगा ! फिर आप किस शरीरसे सिद्ध लोकोंमें विचरे ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! हाँ, मुझे याद आ गया। उसके बादका मेरा वृत्तान्त सुनो। जगत्रूपी गृहमें, सिद्धोंके समूहोंमें तथा लोकपालोंकी पुरियोंमें भ्रमण करते हुए मुझ वसिष्ठकी आत्मकथा इस प्रकार है—एक दिन मैं इन्द्रपुरीमें गया, परंतु वहाँ स्थूल शरीरसे रहित हो आतिवाहिक (सूक्ष्म) देहसे गये हुए मुझको न तो किसीने देखा और न पहचाना ही। मनका मनन ही एकमात्र मेरा स्वरूप था। मैं पृथ्वी आदिसे सर्वथा रहित था। संकल्प-कल्पित पुरुषकी भाँति मेरा कोई दृश्य आकार नहीं था। मुझसे किसीका स्पर्श न होनेके कारण मैं घट-पट आदि पदार्थोंका अवरोधक नहीं था। जगत्के पदार्थ-समुदाय भी मुझे कहीं आने-जानेसे रोक नहीं पाते थे। मैं अपने अनुभवकी ओर ही उन्मुख था अर्थात् अपना अनुभव ही मेरा शरीर था तथा अपने समान स्थितिवाले मनोमय पुरुषोंके साथ ही मै व्यवहार करता था।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! यदि देहरहित एवं आकाशस्वरूप होनेके कारण आप किसीको दिखायी नहीं देते थे तो उस सिद्धने आपको उस सुवर्णमयी भूमिमें कैसे देखा था ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! मुझ-जैसा ज्ञानयोग-से सिद्ध हुआ पुरुष संकल्पकल्पित पदार्थोंका जिस तरह अवलोकन करता है, उस तरह असंकल्पित पदार्थोंको