भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६१० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जैसे समुद्रपत्नी सरिताएँ भूतलपर अपने शरीरको आन्दोलित करती हुई समुद्रकी ओर दौड़ रही हैं, उसी प्रकार जनता विषयोंकी ओर दौड़ी जा रही है। यहाँ आयु ही उत्पात-वायु है। मित्र ही बड़े भारी शत्रु हैं। बन्धु ही बन्धन हैं और धन ही बड़ी भारी मौत है। सुख ही अत्यन्त दुःख है। सम्पत्तियाँ ही भारी विपत्तियाँ हैं। भोग ही संसारके महान् रोग हैं तथा रति ही भारी अरति (दुःख) है। यहाँका सुख केवल दुःख देनेके लिये है और जीवन भी मृत्युकी धरोहर है। अहो ! यह मायाका विस्तार कितना दुःखद है !* विषय-सेवनरूप जो भोग हैं, उन्हें सर्पोंका फन ही समझना चाहिये; क्योंकि वे थोडा-सा भी स्पर्श होनेपर डँस ही लेते हैं। किंतु विचार-दृष्टिसे देखनेपर प्रतिक्षण विनाश-शील ही हैं। जो भोगोंकी अभिलाषासे उनके प्रति तृष्णा बाँधे बैठे हैं, उन लोगोंका उसी तरह पग-पगपर अपमान होता है, जैसे बन्धन-स्तम्भमें बँधे हुए जंगली हाथियोंका हुआ करता है।

'सम्पत्तियाँ और युवती स्त्रियाँ ये तरङ्गोंकी गोदके समान क्षणभङ्गुर हैं। इतना ही नहीं, वे सर्पके फनकी छाया हैं। कौन विवेकी पुरुष उनमें आसक्त होगा ? जो आरम्भमें रमणीय प्रतीत होनेवाले किंतु अन्तमें अत्यन्त नीरस सिद्ध होनेवाले विषयभोगोंमें रमते हैं, वे नरकोंमें ही गिरते हैं†। धन राग-द्वेषादि द्वन्द्व दोषोंसे आक्रान्त हैं। उनका उपार्जन करना भी अत्यन्त कठिन होता है तथा प्राप्त हो जानेपर भी वे स्थिर नहीं रहते हैं। अतः वे अधम पुरुषोंके लिये ही सेवन करने योग्य हैं। जो आरम्भमें मधुर लगती है, परंतु अन्तमें दुःख ही देनेवाली है, वह लक्ष्मी (लौकिक सम्पत्ति) जगत्‌को मोहमें ही डालती है*। उसका विलास क्षणभरके लिये ही होता है। कोई महान्-से-महान् पुरुष क्यों न हों, उनके जीवनमें भी एक दिन मृत्यु अवश्य उपस्थित होगी। देहधारियोंकी आयु शाखाके अग्रभागमें लटकी हुई ओसकी बूँदके समान शीघ्र ही नष्ट होनेवाली है। जरा अवस्थाको प्राप्त होते हुए पुरुषके केश पक जाते हैं, दाँत भी टूट जाते हैं। उसकी और सब वस्तुएँ भी जीर्ण होकर क्षीण हो जाती हैं। परंतु एकमात्र तृष्णा ही ऐसी है जो जीर्ण नहीं होती है, वह नित्य नयी ही बनी रहती है।† हाथकी अञ्जलिमें रखे हुए जलकी भाँति यह जीवन शीघ्र ही स्खलित हो जाता है। वह नदीके प्रवाहकी भाँति चला जाता है और लौटता नहीं है। इस जगत्‌में जो रमणीय जान पड़ते हैं, उन पदार्थोंमें मैंने अरमणीयता देखी है। स्थिर वस्तुओंमें भी अस्थिरताका दर्शन किया है और सत्य दीखनेवाले पदार्थोंमें भी मुझे असत्यता दिखायी दी है। इसीलिये मैं यहाँसे विरक्त हो उठा हूँ। मनके सर्वथा वासनाशून्य हो जानेपर जब परमात्मामें विश्रान्ति प्राप्त होती है, उस समय जो आनन्द मिलता है, वह पाताल, भूतल और स्वर्गके भी किन्हीं भोगोंमें नहीं मिल सकता।'

मुने ! इस तरह दीर्घकालतक विचार करनेसे अब अहंकारशून्य हो मैंने अपनी बुद्धिके द्वारा स्वर्ग और


* उत्पातवायुरेवायुर्मित्राण्येवातिशत्रवः ।
बान्धवो बन्धनान्येव धनान्येवातिनैधनम् ॥
सुखान्येवातिदुःखानि सम्पदः परमापदः ।
भोगा भवमहारोगा रतिरेव परारतिः ॥
आपदः सम्पदः सर्व्वाः सुखं दुःखाय केवलम् ।
जीवितं मरणायैव बत मायाविजृम्भितम् ॥
(निर्वाणप्रकरण उ० ९३ । ७१-७३)

† आपातरमणीयेषु रमन्ते विषयेषु ये ।
अत्यन्तविरमान्तेषु पतन्ति निरयेषु ते ॥
(नि० प्र० उ० ९३ । ८०)

* आपातमात्रमधुरा दुःखपर्यवसायिनी ।
मोहनायैव लोकस्य लक्ष्मीः क्षणविलासिनी ॥
(नि० प्र० उ० ९३ । ८२)

† जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।
क्षीयते जीर्यते सर्वं तृष्णैवैका न जीर्यते ॥
(नि० प्र० उ० ९३ । ८६).