भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 750 में से

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पृष्ठ 654

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * कुटीमें लौटकर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन * ६०९


यौवनका उल्लास ही इसकी कीचड है। वृद्धावस्थाके सफेद केश ही इसके धवल फेन हैं। कभी काकतालीय संयोगसे इसमें सुखके बुद्बुद भी उठ जाते हैं। व्यवहार ही इसके महाप्रवाहकी रेखा है। इसमें नाना प्रकारके जड-रव (मूर्खोंके कोलाहल) ही जलरव (जलकी ध्वनि) हैं। राग-द्वेषरूपी बादल इसे बढ़ाते रहते हैं तथा भूतलपर इसका शरीर सदा ही चञ्चल रहता है। लोभ और मोहके महान् आवर्त इसमें उठते रहते हैं। पात और उत्पातसे इसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार यह जीवन नामक नदी शब्दमात्रसे तो अत्यन्त शीतल है; परंतु वास्तवमें त्रिविध तापोंसे अत्यन्त संतप्त रहा करती है। यह महान् खेदका विषय है। संसाररूपी नदीके जलस्थानीय जो इष्ट, मित्र, पुत्र आदिके समागम और धन है, उनमें पहले-पहलेके तो चले जाते हैं और नये-नये आते रहते हैं। (इस प्रकार यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है।) यहाँ जो पदार्थ प्राप्त हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। अतः उन क्षणभङ्गुर पदार्थोंसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। जब प्राप्त हुई वस्तुओंकी यह दशा है, तब जो नये पदार्थ प्राप्त होते हैं, उनपर भी यहाँ कैसे आस्था हो सकती है? संसारमें जितनी नदियाँ हैं, उन सबका जल उद्गमस्थानसे आता और समुद्रकी ओर जाता रहता है। परंतु इस शरीररूपी नदीका जो आयुरूपी जल है, वह केवल जाता ही है, फिर आता नहीं । भयंकर शत्रुभूत विषयरूपी चतुर चोर चारों ओर विचरते रहते हैं, वे विवेकरूपी सारा धन हर ले जाते हैं। अत मुझे निरन्तर जागते रहना चाहिये। यहाँ मैं सो कैसे रहा हूँ? आज यह हुआ, कल यह होगा, यह इसका है और यह मेरा है—इस प्रकार संकल्प-विकल्प करता हुआ मनुष्य बीती हुई आयु और आयी हुई मौतको नहीं जान पाता है। यह कैसी आश्चर्यकी बात है! खूब खा-पी लिया, अनन्त वनभूमियोंमें विचरग कर लिया और बहुत-से सुख-दुःख भी देख लिये। अब यहाँ और क्या करना या पाना शेष रह गया है? मैंने ऊँचे शिखरोंवाले मेरु पर्वतकी उद्यान-भूमियोंमें अच्छी तरह भ्रमण किया। लोकपालोंके श्रेष्ठ नगरोंमे भी मैं घूम लिया। परंतु वहाँ भी कौन-सा स्वाभाविक सुख प्राप्त हुआ?

'धन, मित्र, सुख और भाई-बन्धु कोई भी कालग्रस्त मनुष्यकी रक्षा नहीं कर सकते। मनुष्यका जीवन धूलि-राशिके समान अस्थिर है, उसकी स्थिति सुदृढ नहीं है। जैसे पर्वतशिखरोपर गिरा हुआ वर्षाका जल प्रतिक्षण व्यर्थ नष्ट होता है, वैसे ही भीतरसे विषयोंमें आसक्त मनुष्य क्षण-क्षणमें क्षीण हो अन्तमें पुरुषार्थशून्य रहकर ही अस्त (मृत्युको प्राप्त) हो जाता है। कोई भी भोग मेरे मनको नहीं लुभा रहे हैं। यहाँके वैभव भी मुझे सुन्दर नहीं लगते हैं। यह जीवन भी मदमत्त युवतीके कटाक्षपातकी भाँति चञ्चल एव क्षणभङ्गुर है। मुने! यहाँ कहाँ, किसको, किस तरह और किस उपायसे आश्वासन प्राप्त हो। पापिनी मृत्यु आज या कल मस्तकपर पैर रख ही देगी अथवा माथेपर विपत्तिका पहाड़ डाल ही देगी। यह शरीर एक दिन पत्तेके समान झड़ जानेवाला है। जीवनकी स्थिति भी जीर्ण-शीर्ण ही है। बुद्धि अधीरतासे ग्रस्त हैं और विषयोंके रस नीरस हो गये हैं। नीरस विषय और उनके मनोरथ मेरी विस्तृत आयुको ले बीते। इनसे मेरे लिये कोई चमत्कारजनक पुरुषार्थ नहीं सिद्ध हुआ। आज मेरा मोह मन्द पड गया है। इस शरीरका इस जगत्मे कोई उपयोग नहीं है। विषयोंमें आस्था या आसक्ति न करना ही ऊँची स्थिति है और जीवनके प्रति आस्था रखना ही सबसे अधम अवस्था है। अहो! यह सम्पत्ति क्या मिली, विपत्ति ही सिरपर आ पडी है, जो भारी मोहमे डालनेवाली है। विवेकी पुरुषको सदा ऐसा ही मानना चाहिये और इस संसारमे कभी आसक्त नहीं होना चाहिये।

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