भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चितोंके विहारका तथा जीवन्मुक्तोंकी सर्वात्मरूप स्थितिका वर्णन * ६३७


श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघवेन्द्र ! जैसे स्वप्नावस्थामें चित्त स्वयं अपनेमें ही स्वप्न-दृष्ट पदार्थोंके रूपमें नाना प्रकारका हो जाता है, उसी तरह एक चैतन्य घनाकाश सर्वव्यापी अखण्ड होते हुए भी मायावश भिन्न-सा बन जाता है । इसलिये जिस विपश्चित्‌के समक्ष जो वस्तु आयी, वह उसीमे तन्मयताको प्राप्त होकर उसीके वशमें हो गया । एक देशमें स्थित रहते हुए भी योगी सर्वत्र व्याप्त होकर तीनों कालोंमें सब काम करते और सब पदार्थोंका अनुभव करते हैं। दसों दिशाओंमें स्थित वे विपश्चित् यद्यपि वास्तवमें एक चैतन्यमय थे, तथापि उन्होंने अज्ञानवश वैसा ही व्यवहार किया, जिससे उन्हें सुख-दुःख आदिकी प्राप्ति हुई । जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने भूमिपर शयन किया, द्वीप-द्वीपान्तरोंमें सुख-दुःखका उपभोग किया, वन-श्रेणियोंमें विहार किया, मनुष्यलोकी यात्रा की, पर्वतनात्राओंमें निवास किया, सागर-कुक्षियोंमें भ्रमण किया, अनेक द्वीपोंमें विश्राम किया, मेघमालाओंसे आच्छादित पर्वत-शिखरोंपर गुप्तरूपसे वास किया, सागरमालाओंमें जन्म धारण किया तथा ओषधियोंमें, जलतरङ्गोंमें, पर्वतों और समुद्रोंके तटोंपर एव नगरोंमें विविध क्रीड एँ कीं ।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! एक देशमें स्थित रहते हुए भी योगीलोग चारों ओर व्याप्त होकर तीनों कालोंमें सम्पूर्ण कार्य कैसे करते हैं ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! इस जगत्‌में अज्ञानियोंकी दृष्टिमें जो स्थूल वस्तु है, उससे हम ज्ञानियोंका कोई प्रयोजन नहीं है; किंतु ज्ञानियोंकी दृष्टिसे जो चिन्मात्र वस्तु है, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो । तत्त्वज्ञोंकी दृष्टिसे चिन्मात्र सत्तासामान्यके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु है ही नही । दृश्यके अत्यन्ताभावका ज्ञान होनेपर सृष्टि और प्रलयकी दृष्टिका विनाश होनेके पश्चात् चिन्मात्र सत्तासामान्यमें निरन्तर विश्रामको प्राप्त हुए सर्वेश्वरका यहाँ सर्वदा सर्वत्व और सर्वात्मत्व ही वर्तमान है । ऐसी दशामें भला बताओ तो सही, कौन कैसे कहाँ कब और क्योंकर उसका निरोध कर सकता है ? वह सर्वव्यापी सर्वात्मा जब जहाँ जिस रूपमें प्रकट होना चाहता है, तब वहाँ उसी रूपमें प्रकट हो जाता है; क्योंकि उस सर्वात्मामें कौन-सी वस्तु नहीं है ? तुम ऐसा समझो कि अतीत, वर्तमान और भविष्य, स्थूल-सूक्ष्म, दूर निकट तथा निमेष और कल्प आदि जितनी वस्तुएँ हैं, वे सब की सब अपने स्वरूपका त्याग किये बिना ही सत्तासामान्य-स्वरूप सर्वात्मामें सर्वदा ही वर्तमान हैं । किंतु वास्तवमें मायासे उल्लासको प्राप्त हुआ यह दृश्य-प्रपञ्च न उत्पन्न हुआ है और न निरुद्ध हुआ है; बल्कि ज्यों-का-त्यों स्थित है ।

महाबाहु श्रीराम ! वे विपश्चित् पूर्णतया प्रबुद्ध नही थे, बल्कि बोधदृष्टि तथा अबोध-दृष्टिके मध्यमें वे दोलायमान-से स्थित थे । उन अर्धबुद्ध विपश्चितोंमें चारों ओरसे नित्य मोक्ष तथा बन्धनके लक्षण दृष्टिगोचर होते थे । उस पूर्वोक्त संशयग्रस्त धारणासे युक्त होनेके कारण वे विपश्चित् परब्रह्म-प्राप्त योगी न थे, किंतु धारणासे प्राप्त हुए सिद्धिवाले धारणा-योगी थे । राजीवनोचन राम ! जिन्हें परम ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है तथा जिनमें अविद्याका लेशमात्र भी नहीं है, वे विपश्चित् यदि ऐसे ज्ञानयोगी होते तो क्या वे अविद्याकी ओर दृष्टिपात करते ? वे तो अग्निदेवके वरदानसे सिद्धिप्राप्त धारणा-योगी थे । उनमें अविद्या वर्तमान थी, इसी कारण वे आत्मविचारहीन थे । जीवन्मुक्तोंका भी शरीर देहधर्मसे युक्त रहता है; किंतु उस शरीरके भीतर जो उनका चित्त है वह अचल ही रहता है अर्थात् उसमें देहधर्म नहीं व्याप्त होते । अतः जीवन्मुक्त पुरुषके शरीरको चाहे टुकड़े-टुकड़े करके काट डाला जाय अथवा उसे राजसिंहासनपर बैठाया जाय—इस प्रकारकी रोने और हँसनेकी दोनों अवस्थाओंमें उसे न तो कुछ दुःखका अनुभव होता है और न सुखका ही ।