भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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६३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जीवन्मुक्त पुरुषोंका शरीर आदि आत्मस्वभावसे कभी पृथक् नहीं है। इसीलिये जीवन्मुक्त पुरुष मरा हुआ भी मरता नहीं, रोता हुआ भी रोता नहीं और हँसता हुआ भी हँसता नहीं अर्थात् वह मरणादि अवस्थाओंमें हर्ष-शोकसे युक्त नहीं होता। तथापि व्यवहारकालमें अज्ञानी और ज्ञानी जीवन्मुक्तके आचरण प्रायः एक-से ही होते हैं। प्रह्लाद, बलि, वृत्र आदि यद्यपि वीतराग जीवन्मुक्त ही थे पर उनके व्यवहार रागियोंके-से होते थे। हाँ, बन्धन तथा मोक्षका कारण तो वासना और वासनाशून्यता ही है।

(सर्ग १२४-१२५)


मरे हुए विपश्चितोंके संसारभ्रमणका तथा उत्तरदिशागामी विपश्चित्‌के भ्रमणका विशेषरूपसे वर्णन

श्रीरामजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर वे विपश्चित् उन दिगन्तोंमें तथा द्वीपों, सागरों, काननों और पर्वत-भूमियोंमें जाकर क्या करते हुए निवास करते रहे ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—वत्स राम ! उनमेंसे एक विपश्चित् क्रौञ्चद्वीपके सीमा-भूत पर्वतके पश्चिमी तटपर एक हाथीद्वारा दाँतों एवं गण्डस्थलोंसे उस पर्वतकी शिलापर कमलकी तरह पीस डाला गया। दूसरे विपश्चित्‌को, जिसका शरीर क्षत-विक्षत हो गया था, एक राक्षसने आकाशमार्गसे ले जाकर समुद्रवर्ती वडवानलमें झोंक दिया, जिससे वह वहीं जलकर भस्म हो गया। तीसरेको एक विद्याधर इन्द्र-सभामें ले गया। वहाँ उसने इन्द्रको प्रणाम नहीं किया, जिससे इन्द्रने कुपित होकर उसे शाप दे दिया। उस शापसे वह जलकर भस्म हो गया। चौथा कुशद्वीपकी सीमापर स्थित पर्वतकी तलहटीमें बहनेवाली नदीके कछारमें बड़ी सावधानीसे जा रहा था, परंतु किसी महाबली मगरने उसके आठ टुकड़े कर दिये, जिससे वह मर गया। इस प्रकार वे चारों भूपाल (विपश्चित् ) दिगन्तोंमें जाकर मृत्युको प्राप्त हो गये। मृत्युके पश्चात् उन विपश्चितोंकी संवित्‌ने पूर्व-संस्कारवश आकाशात्मा बनकर आकाशमें ही पृथ्वीमण्डलको देखा फिर दृश्य और दर्शनके मध्यमें, भूमण्डलका अनुभव ही जिसकी आकृति है, उस अविद्याकी निष्ठा—इयत्ताको देखनेके लिये वे द्वीप-द्वीपान्तरोंमें भटकते रहे।

राघव ! उनमें जो विपश्चित् पश्चिम दिशाकी ओर चला था, वह सातों द्वीपों तथा सातों महासागरोंको लाँघकर घनभूमि (पूर्वोक्त स्वर्णमयी भूमि) में जा पहुँचा। वहाँ उसे भगवान् जनार्दनके दर्शन हुए। फिर उन्हीं भगवान्‌से अनुपम ज्ञान (ब्रह्मविद्या) प्राप्त करके वह उसी स्थानमें पाँच वर्षतक समाधिस्थ हुआ बैठा रहा। तदनन्तर वह देहका परित्याग करके निर्वाणको प्राप्त हो गया। पूर्व दिशामें गया हुआ विपश्चित् पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलके निकट अपने शरीरको स्थापित करके उसमें चन्द्रत्वकी भावना करता रहा। चिरकालके बाद जब उसका पूर्वशरीर नष्ट हो गया, तब वह चन्द्रलोकमें स्थित हो गया। राजकुमार राम ! दक्षिण दिशागामी विपश्चित् शाल्मलीद्वीपमें जाकर अपने शत्रुओंकी जड़ उखाड़ करके आज भी वहाँ राज्य कर रहा है। और उत्तर दिशाको प्रस्थान करनेवाला विपश्चित् सप्तमाम्बुधि—स्वादूदक-सागरमें जा पहुँचा, जिसमें चञ्चल एवं विशाल तरङ्गें किलोल कर रही थीं। वहाँ उसने एक मगरके पेटमें एक हजार वर्षतक निवास किया। उस समय वह उसी मगरके पेटका मांस खाकर जीवन-निर्वाह करता था। इस प्रकार जब वह मगरराज मर गया, तब वह उसके पेटसे निकलकर दूसरे मगरकी तरह समुद्रसे बाहर आया। तदनन्तर हिमके समान स्वच्छ जलसे भरे हुए उस सागरकी अस्सी हजार योजनकी विस्तारवाली घनी भूमिको लाँघकर वह दस हजार योजनके विस्तारवाले एक विशाल मैदानमें जा पहुँचा, जिसकी भूमि स्वर्णमयी थी और मध्यभाग बहुत बड़ा