संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * मरे हुए विपश्चितोंके संसार-भ्रमणका वर्णन * ६३९
था। उसमें देवतालोग विहार करते थे। वहीं उसकी मृत्यु हो गयी। उस भूमिमें देवगणोंके मध्य मरनेसे उस विपश्चित्को उसी प्रकार उत्तम देवत्वकी प्राप्ति हो गयी, जैसे अग्निके बीच पड़ा हुआ काष्ठ क्षणभरमें ही अग्नि-रूप हो जाता है। फिर वह एक प्रधान देवता होकर उस लोकालोक पर्वतपर गया, जो भूमण्डलरूपी वृक्षका थाला-सा स्थित है।
रामभद्र ! उसका दिगन्तदर्शनरूपी पूर्वसंस्कार उसे पूर्णतया अभ्यस्त था ही, अतः वह उस उत्कृष्ट निश्चयसे प्रेरित होकर ज्यों ही आगे बढ़ा, त्यो ही उस लोकालोक-गिरिके शिखरसे अन्धकारमय गर्तमें जा गिरा। वहाँ उसने देखा कि पर्वत-शिखर-सरीखे विशालकाय मांसभक्षी पक्षी उसके उस देव-शरीरको नोच-नोचकर खा रहे हैं और पूर्वचिन्तित दिगन्तदर्शनके कार्यमें उसका मनोमय शरीर ही प्रसार कर रहा है; क्योंकि जहाँ उसकी मृत्यु हुई थी, वह प्रदेश परम पावन था। इसी कारण उस निर्मल हृदयवाले विपश्चित्को अपने सूक्ष्म शरीरमें आधिभौतिकताका बोध तो नहीं हुआ, परंतु मनके व्यापारसे रहित शान्त स्थितिरूप उत्तम बोधकी प्राप्ति नहीं हुई। उसे तो आतिवाहिक शरीरका ही विशेषरूपसे ज्ञान था, इसी कारण उसने अपने मनको आगे बढ़ते हुए देखा। आतिवाहिकके ज्ञानसे उसे गर्भवास-तुल्य अन्धकार दीख पड़ा। उस अन्धकारकी समाप्तिपर ब्रह्माण्डकटाहरूपी भूखण्ड दृष्टिगोचर हुआ, जो वज्र-सदृश सारवान्, स्वर्णमय और करोड़ों योजन विस्तारवाला हैं। उसके बाद उसे उस भूखण्डसे आठगुना विस्तारवाला जल मिला, जो ब्रह्माण्डकटाहकी भूमिके समान समुद्रकी पीठकी भाँति स्थित था। उसे पार करनेके बाद वह एक तेजयुक्त स्थानमें जा पहुँचा, जो प्रलयाग्निकी घनीभूत लपटोंके पिण्डीभूत कोटरके समान चमकीला था और जहाँ बहुत-से सूर्य अपना प्रकाश फैला रहे थे, जिससे वह अत्यन्त भीषण लग रहा था। उस तैजस आवरणमें वह दाह-शोक आदिसे रहित मनोमय देहसे विचरण कर रहा था। इतनेमें उसे ऐसा भान हुआ कि वह वायुरूप आवरणमें आ पहुँचा। उस समय उसे यह ज्ञात हुआ कि मेरा सूक्ष्म आत्मा ही ले जाया जा रहा है और वह चित्तमात्र आत्मा किस प्रकार ले जाया जा रहा है—यह भी मालूम हुआ। ऐसे ज्ञानके बलसे उस धीरात्माने उस वायुसागरको पार किया। उसके बाद वह उससे भी दसगुने विस्तृत शून्य स्थानमें जा पहुँचा। उसे लाँघकर वह असीम महान् आकाशमें प्रविष्ट हुआ। जिसमें सब कुछ विलीन होता है, जिससे सब कुछ आविर्भूत होता है तथा जो कुछ नहीं हैं और सब कुछ है, उस महान् आकाशमें मनोमय देहसे भ्रमण करता हुआ वह बहुत दूर चला गया। वहाँ उसने पृथ्वी, जल, तेज, वायु, तथा जगत् देखा। फिर संसारकी रचनाएँ, सृष्टियाँ और दिशाएँ दृष्टिगोचर हुईं। तत्पश्चात् पर्वत, आकाश, देवता-मनुष्य और पञ्चमहाभूतोंके अन्तमें घनीभूत आकाश दीख पड़ा। पुनः जगत्, दिशाएँ, आकाश और दूसरी अव्यवस्थित सृष्टियाँ परिलक्षित हुईं। यों दीर्घकालसे विहार करता हुआ वह आज भी वहाँ स्थित है। चिरकालसे अभ्यस्त हुए अपने जगत्-सत्यतारूप निश्चयसे वह विरत नहीं हो रहा है; क्योंकि अविद्याका अन्त तो है नहीं किंतु जब उसकी सत्यता जान ली जाती है, तब वह भी ब्रह्मरूप हो जाती है। वास्तवमें तो पूर्णात्मा ब्रह्ममें अविद्या है ही नहीं। यह दृश्य है, यह अविद्या है, यह तो उसकी कल्पना है। राघव ! वह विपश्चित् आज भी तत्त्वज्ञान न होनेके कारण उन पूर्वदृष्ट स्थानोंमें ही तथा उन्हींके सदृश अन्य सृष्टियों तथा वनखण्डोंमें अपनी वासनाकी उत्कटताके कारण चिरकालसे दूर-से-दूर बार-बार भ्रमण कर रहा है।
(सर्ग १२६-१२८)