संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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शेष दो विपश्चितोंके वृत्तान्तका वर्णन तथा मृगरूपमें श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त हुए एक विपश्चित्का राजसभामें लाया जाना
श्रीरामजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! अब यह बतलाइये कि एक विपश्चित् तो भगवत्कृपासे मुक्त हो गया और दूसरा अभीतक अविद्यामें भ्रमण कर रहा है। शेष चन्द्रलोक और शाल्मलिद्वीपमें निरुद्ध हुए उन दोनों विपश्चितोंकी फिर क्या दशा हुई ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! उन दोनों विपश्चितोंमेंसे एक चिरकालसे अभ्यस्त हुई वासनाओंके वशीभूत होकर अनेक प्रकारके शरीरोंसे द्वीप-द्वीपान्तरोंमें भ्रमण करता हुआ उत्तर-दिग्वर्ती विपश्चित्की ही गतिको प्राप्त हुआ। उसीकी तरह परमाकाशरूपी खोखलेमें क्रमशः ब्रह्माण्डके आवरणोंका परित्याग करके लाखों सृष्टियोंको देखता हुआ वह आज भी उसी तरह स्थित है। उन दोनोंमेंसे जो दूसरा था, उसकी चन्द्रमाके निकट अपने शरीरको रखकर अभ्यास करनेके कारण चन्द्रमृगमें पूर्णतया आसक्ति हो गयी, जिससे वह प्रतिमास चन्द्रमा-के साथ भ्रमण करनेवाली देहोंसे युक्त हो गया । तदनन्तर उनका परित्याग करके वह पर्वतपर मृगरूपमें स्थित है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! चारों विपश्चितोंकी एक ही वासना थी, फिर वह उत्तम अधम फल प्रदान करनेवाली भिन्न-भिन्न कैसे हो गयी ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुवीर ! प्राणीकी भलीभाँति अभ्यस्त हुई वासना देश, काल और क्रियाके वशसे कोमल और अत्यन्त परिपाकवश दृढ़मूल होती है। उनमें जो कोमल है, वह अन्यरूपताको प्राप्त होती है, किंतु जो बद्धमूल है, उसमें शीघ्र अन्यरूपता नहीं होती। देश, काल और क्रिया आदिकी जो एकता है, वही वासनाकी एकता है। उन दोनोंमें भिन्नता आ जानेपर जो बलवती होती है, उसीकी विजय होती है । इस प्रकार वे विपश्चित् एक साथ उत्पन्न होकर शरीर-भेदसे चार रूपों-में हो गये । उनमेंसे आदिके दोको तो अविद्याने आकृष्ट कर लिया, एक वासनाके वशीभूत होकर मृग बन गया और एककी मुक्ति हो गयी ।
श्रीराम ! इस प्रकार उन विपश्चितोंका सारा वृत्तान्त मैंने स्पष्टरूपसे तुम्हें कह सुनाया। यह अविद्या कारण ब्रह्मकी भाँति अनन्त ही है; क्योंकि वह तद्रूप ही है। यों वे अज्ञानी विपश्चित् उस ब्रह्माण्ड-मण्डपके अंदर भटकते रहे, परंतु उन्हें अविद्याका ओर छोर नहीं मिला। यह अनन्तरूपा अविद्या ब्रह्मरूप ही है; क्योंकि वह ब्रह्ममयी है। इसीलिये जबतक इसका यथार्थ ज्ञान नहीं हो जाता, तभीतक इसकी सत्ता है; तत्त्वज्ञान हो जानेपर तो इसका अस्तित्व ही मिट जाता है। इसी कारण वे विपश्चित् परब्रह्माकाशमें अत्यन्त दूर पहुँचकर अविद्याद्वारा कल्पित कतिपय अन्य संसार-रूपोंमें भटकते रहे। उनमेंसे एक मुक्त हो गया, एक मृग बन गया। शेष दो अपने प्राक्तन प्रबल संस्कारके वशीभूत होकर आज भी कहीं भटक रहे हैं।
श्रीरामजीने पूछा—मुनिवर ! यह तो आपने हमारे लिये महान् आश्चर्यजनक वृत्तान्त सुनाया है । मेरे ऊपर आपकी विशेष अनुकम्पा है । अच्छा, अब यह बतलानेकी कृपा कीजिये कि वे विपश्चित् जिन लोकोंमें उत्पन्न हुए थे, वे यहाँसे कितनी दूर हैं और वे कितनी दूरीपर कैसे लोकोंमें भ्रमण कर रहे हैं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वे दोनों विपश्चित् जिन लोकोंमें स्थित हैं, वे लोक प्रयत्नपूर्वक विचार करनेपर भी मेरी बुद्धिके विषय नहीं हुए । हाँ, मृग-योनिको प्राप्त हुआ तीसरा विपश्चित् जिस लोकमें स्थित है, वह संसार सम्भवतः हमारी बुद्धिमें है। वह विपश्चित्,