संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 688, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके ध्यानसे उत्पन्न हुई अग्निमें मृगके प्रवेशका वर्णन * ६४१
जिसकी बुद्धि तत्त्वतकके संसार-भ्रमणसे खिन्न नहीं हुई थी, भ्रान्तिवश बहुत-से लोकोंमें भ्रमण करके उस ब्रह्माण्डमें किसी पर्वतकी कन्दरामें मृगयोनिमें उत्पन्न हुआ ।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! यदि ऐसी बात है तो यह बतलाइये कि वह किस दिशामें, किस मण्डलमें, किस पर्वतपर, किस वनमें मृगरूपसे स्थित है ? वहाँ वह क्या करता है ? शस्यश्यामला भूमिमें निवास करता हुआ कैसे दूब चरता है ? बुढ़ापेके समान शिथिल ज्ञानवाला वह अपने उस उत्कृष्ट विपश्चित्-जन्मका कब स्मरण करेगा ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! त्रिगर्तराजने जिस क्रीडामृगको तुम्हें भेंटरूपमें प्रदान किया है और जो तुम्हारे क्रीडामृगागार (अजायबघर) में विद्यमान है, उसीको तुम वह विपश्चित् समझो । तब श्रीरघुनाथजीकी आज्ञासे बालकोद्वारा लाया गया वह मनोहर मृग उस विशाल राजसभामें प्रविष्ट हुआ । फिर तो सभी सभासद् टकटकी लगाकर उसकी ओर देखने लगे । वह शरीरसे तगड़ा था और उसका चेहरा भी प्रसन्न था । वह अपने शरीरकी चित्तियोंसे तारारूपी बिन्दुओंसे युक्त आकाशकी विडम्बना कर रहा था, नील कमलरूपी नेत्रोंको बारंबार गिरानेसे सुन्दरी नायिकाओंके चञ्चल कटाक्षोंका तिरस्कार कर रहा था । उसके दर्शनके लिये लालायित हुई सभाका अनादर करनेवाले अपने मनोऽभिराम चकित कटाक्षोंसे खम्भोंमें जड़ी हुई मरकतमणिकी नीली कान्तिको तृण समझकर उसे खानेकी इच्छासे वह चञ्चलतापूर्वक इधर-उधर दौड़ लगा रहा था, क्षणभरमें अपने कान, नेत्र और गर्दनको ऊपर उठा लेता और फिर तुरंत ही नीचे कर लेता—यों अपनी चपलतासे सभासदोंको कौतूहलमें डाल रहा था । इस प्रकार राजा, मुनि और मन्त्रियोंसहित सभी लोग उस मृगको देखकर 'भगवान्की माया अनन्त है' यों कहते हुए बहुत देरतक आश्चर्यमें डूबे रहे । (सर्ग १२९)
श्रीवसिष्ठजीके ध्यानसे उत्पन्न हुई अग्निमें मृगके प्रवेशका तथा उसके विपश्चित्-देहकी प्राप्तिका वर्णन
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! तदनन्तर श्रीरामने वसिष्ठजीसे पूछा—'मुने ! किस उपायद्वारा प्राक्तन विपश्चित्-देहकी प्राप्ति होकर इस विपश्चित्के दुःखका अन्त होगा ?'
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रामभद्र ! जैसे आगमें डाल देनेसे सुवर्ण अपने निर्मल रूपको प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार इस विपश्चित्के लिये भी अग्नि ही शरण है । उसमें प्रवेश करनेसे यह मृग अपने पूर्व विपश्चित्-देहको प्राप्त हो जायगा । यह सब मै अभी करता हूँ और तुमलोगोंको कौतुक दिखलाता हूँ । यह मृग अभी तुमलोगोंके सामने आगमें प्रवेश करेगा ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! उत्तम विचारवाले मुनिवर श्रीवसिष्ठने वहाँ यों कहकर अपने कमण्डलुके जलसे विधिपूर्वक आचमन करके इन्धनरहित ज्वालापुञ्जरूप अग्निका ध्यान किया । उनके ध्यान करते ही सभाके मध्यभागसे अग्निकी लपटें लपलपाने लगीं । उन ज्वालाओंका आकार अङ्गारसे रहित था, उनमें इन्धनका भी सम्पर्क नहीं था; धूम और कज्जलका तो नाम-निशान नहीं था । वे निर्मल ज्वालाएँ धक्-धक् करके धधक रही थीं । उनकी परम मनोहर कान्ति फैल रही थी और वे स्वर्ण-मन्दिर-सी सुन्दर लग रही थीं । खिले हुए पलाशका-सा तो उनका आकार था और वे संध्याकालीन मेघकी-सी रंगवाली प्रकट हुई थीं । उस ज्वालासमूहको देखकर सभासद्गण तो दूर हट गये थे, परंतु पूर्वजन्मके भक्तिभावसे आदरसहित देखते हुए उस मृगको उनके दर्शनसे परम हर्ष हुआ । उस अग्निका अवलोकन करनेसे उस मृगका पाप क्षीण हो गया और उस अग्निमें