संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्रवेश करनेके लिये उसकी इच्छा जाग्रत् हो उठी। फिर तो वह तुरंत ही सिंहकी तरह उछलकर दूरतक पीछे हट गया। इसी बीचमें मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी ध्यानमग्न होकर विचार करने लगे और अपने दृष्टिपातोंसे मृगका पाप नष्ट करते हुए अग्निदेवसे यों बोले—
‘ऐश्वर्यशाली हव्यवाहन ! इस मनोहर मृगकी पूर्वजन्मकी भक्तिका स्मरण करके इसपर कृपा कीजिये और इसे विपश्चित् बना दीजिये।’ राजसभामें वसिष्ठ-मुनिके यों कहनेपर वह मृग दूरसे दौड़कर उसी प्रकार अग्निमें प्रवेश कर गया, जैसे वेगपूर्वक छोड़ा गया बाण अपने लक्ष्यमें प्रविष्ट हो जाता है। उस ज्वालासमूहमें प्रविष्ट हुए उस मृगका शरीर दर्पणमें प्रतिबिम्बकी भाँति संध्याकालीन मेघमें विश्रान्त हुआ-सा स्पष्ट दीख रहा था। तदनन्तर सभासदोंके देखते-देखते ही वह मृग ज्वालाओंके बीचमें मनुष्यके रूपको प्राप्त हो गया। ज्वालाओंके अंदर वह पुण्याकृति पुरुष दिखायी पड़ा। वह स्वर्ण-सा कान्तिमान् था। उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग कमनीय थे, जिनसे वह बड़ा ही सुन्दर लग रहा था।
तदुपरान्त वह ज्वाला-पुञ्ज वायुके झोंकेसे बुझे हुए दीपकके समान उस सभाके मध्यसे ऐसे अदृश्य हुआ, जैसे आकाशसे सायंकालके मेघ विलीन हो जाते हैं। फिर तो वहाँ देवालयकी दीवारोंके टूट जानेपर उसके मध्य स्थित देव-प्रतिमाके समान तथा परदेके अंदरसे बाहर निकले हुए नटकी तरह केवल वह पुरुष ही खड़ा रह गया। वह परम शान्त था। उसके गलेमें रुद्राक्षकी माला शोभा पा रही थी, कंधेपर स्वर्णमय यज्ञोपवीत लटक रहा था और शरीर अग्नितापसे निर्मल हुए वस्त्रोंसे आच्छादित था। इस प्रकार वह तुरंत ही उदित हुए चन्द्रमाके समान भला लग रहा था। सूर्यकी प्रभा-सरीखा वह परमोत्कृष्ट आभासे युक्त था। उसके शरीरकी कान्ति देखकर सभासदोंके मुखसे बरवस निकल पड़ा— ‘अहो ! कैसी अद्भुत भा (शोभा) है!’ इसलिये वह ‘भास’ नामसे विख्यात हुआ। तत्पश्चात् वह भास वहीं ध्यानमग्न होकर बैठ गया और मन-ही-मन अपने पूर्वजन्मोंके सम्पूर्ण वृत्तान्तोंका स्मरण करने लगा। उस समय सारे सभासद् आश्चर्यचकित होकर चुपचाप बैठे थे। तबतक भास दो ही घड़ीमें अपने सम्पूर्ण वृत्तान्तोंका स्मरण करके उन पूर्वजन्मोंकी स्मृतिसे लौट आया और उसका ध्यान भङ्ग हो गया। उसने उठकर क्रमशः सारी सभापर दृष्टिपात किया। फिर हर्षपूर्वक वसिष्ठजीके निकट जाकर उन्हें प्रणाम किया और यों कहने लगा— ‘ब्रह्मन् ! आप ज्ञान-सूर्यरूपी प्राण प्रदान करनेवाले हैं, आपको मेरा प्रणाम है।’ तब वसिष्ठजी भी उसके सिरपर हाथ फेरते हुए यो बोले—‘राजन् ! चिरकालके बाद आज तुम्हारी अविद्याका सर्वथा विनाश हो जाय।’ तदनन्तर जब वह ‘श्रीरामजीकी जय हो’ यो कहता हुआ उनके चरणोंमें प्रणाम कर रहा था, उसी समय राजा दशरथ अपने आसनसे कुछ उठकर उससे हँसते हुए-से बोले।
श्रीदशरथजीने कहा—भो राजन् ! आपका स्वागत है। आप अनेक जन्मरूपी संसारमें भ्रमण करनेसे थक गये हैं। अतः आइये, यहाँ इस आसनपर विराजिये और विश्राम कीजिये।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! महाराज दशरथके यो कहनेपर वह भास नामक विपश्चित् विश्वामित्र आदि सभी मुनियोंको प्रणाम करके आसनपर बैठ गया।
तब श्रीदशरथजी बोले—अहो ! खेद है, जैसे जंगली हाथी आलानमें बँधे रहनेके कारण दुःख भोगता है, उसी तरह इस विपश्चित्ने भी चिरकालतक अविद्याके वशीभूत होकर दुःखका अनुभव किया है। अहो ! अज्ञानसे उत्पन्न हुई दुर्दृष्टिकी कैसी विषम गति है ! यह आकाशमें ही अनेक सृष्टियोंके आडम्बर-भ्रमका