संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * प्राणियोंकी उत्पत्तिके दो भेद * ६४३
दर्शन कराती है। यह कम आश्चर्यका विषय नहीं है, जो सर्वव्यापक आत्मामें ये कितने संसार फैले हुए हैं, जिनमें यह विपश्चित् चिरकालतक भ्रमण करता रहा। अहो ! अपने स्वाभावरूप विभवसे सम्पन्न इस चेतन आत्माके संकल्पकी, जो वस्तुतः शून्य है, कैसी अद्भुत महिमा है। यह शून्य होते हुए भी परमात्मघनरूपी आकाशके अंदर इस प्रकारके अनेकों जगत्के रूपमें प्रतीत होता है।
तदनन्तर श्रीविश्वामित्रजीके द्वारा पूछे जानेपर विपश्चित् भासने अपने देखे हुए विभिन्न दृश्यों, स्थानों, लोकों तथा प्राणियोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। (सर्ग १३०-१३५)
प्राणियोंकी उत्पत्तिके दो भेद, मच्छरके मृगयोनिसे छूटकर व्याधरूपसे उत्पन्न होनेपर उसे एक मुनिका ज्ञानोपदेश
उपर्युक्त प्रसङ्गमें ही विपश्चित् भासने आकाशसे एक विशाल शवके गिरनेकी कथा सुनायी। तदनन्तर अग्निदेवके साथ हुए अपने संवादकी चर्चा करते हुए भासने कहा कि मेरे पूछनेपर अग्निदेवताने शवका आदिसे अन्ततक पूरा वृत्तान्त मुझे सुनाया और यह कहा कि 'वह शव मच्छरकी योनिको प्राप्त हुआ था। उस अतिक्षुद्र शरीरवाले स्वेदज मच्छरकी आयु केवल दो ही दिनोंकी हुई। उसका शरीर इतना हल्का था कि वह फूँक मारनेसे ही उड़ जाता था।' इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजीके मनमें जिज्ञासा उत्पन्न हुई, तब उन्होंने श्रीवसिष्ठजीसे पूछा।
श्रीरामजीने पूछा—प्रभावशाली गुरुदेव ! इस जगत्में क्या समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति योनिसे ही होती है अथवा अन्य किसी प्रकारसे भी सम्भव है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति दो प्रकारसे होती है—एक ब्रह्ममय और दूसरी भ्रान्तिज। उन दोनोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वजन्मके अनुभवसे बद्धमूल हुए शरीरतादात्म्यके भ्रमवश प्राणियोंकी जो उत्पत्ति होती है, वह भ्रान्तिज कही जाती है; क्योंकि वह दृश्यके सङ्गसे होती है। नित्यमुक्त ब्रह्माको कभी भी जगद्-भ्रान्ति तो होती नहीं, फिर भी वह सृष्टिके आदिमें चतुर्विध जीवरूपसे जो स्वयं अपने संकल्पसे उत्पन्न होता है, उसका वह जन्म ब्रह्ममय कहा जाता है। वह योनिज नहीं होता। श्रीराम ! उस मच्छरने जगद्भ्रान्तिके वश जन्म धारण किया था। वह ब्रह्म-विवर्तसे नहीं उत्पन्न हुआ था। अब (अग्निके द्वारा कहा गया) उसका अगला वृत्तान्त विपश्चित्से सुनो।
(अग्निने आगे कहा—) उसने पृथ्वीपर ईखके झुरमुटों, हरी-हरी घासोंपर तथा मूँज-कास आदिके अंबारोंमें गूँजते हुए दूसरे मच्छरोंके साथ स्वयं भी गूँजते एवं क्रीड़ा करते हुए अपनी आयुका आधा दिन पूरा-का-पूरा भोग-विलास में व्यतीत कर दिया। फिर वह बाल-लीलावश अपनी एक मच्छरीके साथ हरी-हरी घासोंके मध्यभागरूपी हिंडोलेपर बहुत देरतक झूला झूलता रहा। झूलनेके परिश्रमसे थककर जब वह वहीं कहीं विश्राम कर रहा था, तबतक हरिणके खुराग्ररूपी पर्वतके गिरनेसे चकनाचूर हो गया। प्राणत्याग करते समय उसकी दृष्टि हरिणके मुखपर लगी थी, इसलिये पूर्व भावनाके अनुसार बाह्य और आभ्यन्तर इन्द्रियोंको ग्रहण करके वह मृगयोनिमें पैदा हुआ। वह हरिण वनमें घूम रहा था कि एक व्याधने उसे अपने धनुषद्वारा मार डाला। मरते समय उसकी दृष्टि व्याधके मुखपर लगी थी, इसलिये अगले जन्ममें वह व्याध होकर पैदा हुआ। वह व्याध अनेक वनोंमें घूमता-घामता किसी सुखद तपोवनमें जा पहुँचा। वहाँ वह विश्राम कर रहा था कि उसकी मुनिसे भेंट हो गयी। तब मुनि उसे ज्ञानोपदेश करने लगे—